Sunday, 4 January 2026

ग़ज़ल- जिसे समझे थे हम हासिल हमारा

जिसे समझे थे हम हासिल हमारा
वही इक दिन बना कातिल हमारा

हमारा क़त्ल और हम ही हैं मुज़रिम
बहुत शातिर है वो कातिल हमारा

हमारी बाम पर नज़रें टिकी हैं
कहाँ गुम है महे कामिल हमारा

ये आंखें खोजती हैं बस तुम्हे ही
तुम्हारी राह तकता दिल हमारा 

हमारी कश्तियाँ मझधार में हैं
न जाने है कहाँ साहिल हमारा

नहीं बाज़ीगरी लफ़्ज़ों की केवल
ग़ज़ल में दर्द भी शामिल हमारा

✍️ डॉ पवन मिश्र

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