Sunday, 12 July 2026

लेख- शिक्षे तुम्हारा नाश हो...

 

"शिक्षे! तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी"

(भारतीय शिक्षा-दर्शन, शिक्षक का आत्ममंथन और शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा का आह्वान)

                "सा विद्या या विमुक्तये।" भारतीय मनीषा ने शिक्षा को कभी केवल अक्षरज्ञान, सूचना-संग्रह अथवा जीविका अर्जित करने का साधन नहीं माना। उसके लिए शिक्षा मनुष्य की आंतरिक मुक्ति, आत्मविकास और सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम रही है। सभ्यता के इतिहास में अनेक शक्तियों ने मनुष्य के जीवन को प्रभावित किया है। सामर्थ्य ने साम्राज्य बनाए, अर्थ ने वैभव दिया और विज्ञान ने सुविधाओं के नए आयाम खोले; किंतु मनुष्य को वास्तव में मनुष्य बनाने का कार्य शिक्षा ने ही किया। उसी ने ज्ञान को विवेक से, शक्ति को मर्यादा से और बुद्धि को करुणा से जोड़ा।

                 भारतीय शिक्षा-दर्शन का मूल प्रश्न कभी यह नहीं रहा कि मनुष्य कितना जानता है; प्रश्न यह था कि वह कैसा बन रहा है। यहाँ ज्ञान का मूल्य उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि उससे विकसित होने वाले विवेक, विनय और आत्मबोध से आँका गया। शिक्षा का लक्ष्य बाह्य सफलता नहीं, अंतःकरण का परिष्कार था। इसलिए हमारे आचार्यों ने विद्या को साधन नहीं, साधना माना। तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली में गुरुकुल से विदा होते शिष्य को जो उपदेश दिया गया है, वह केवल दीक्षांत समारोह का औपचारिक संदेश नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा-दृष्टि का घोष है- "सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।" इन पंक्तियों में शिक्षा का संपूर्ण दर्शन समाहित है। यहाँ कहीं यह नहीं कहा गया कि अधिक धन अर्जित करो, उच्च पद प्राप्त करो या प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुँचो। गुरु जानता था कि जो सत्यनिष्ठ होगा, धर्माचरण करेगा और स्वाध्याय में निरंतर लगा रहेगा, उसके लिए जीवन की उपलब्धियाँ स्वाभाविक रूप से मार्ग प्रशस्त करेंगी। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका नहीं, जीवन का परिष्कार था। 

                 इसी कारण भारतीय परंपरा में शिक्षा मनुष्य को केवल दक्ष नहीं बनाती थी, बल्कि संवेदनशील भी बनाती थी। वह बुद्धि को प्रखर करती थी, पर उसे अहंकार का उपकरण नहीं बनने देती थी। वह प्रतिस्पर्धा की प्रेरणा देती थी, किंतु सहयोग और सह-अस्तित्व की चेतना भी जगाती थी। ज्ञान का अर्थ केवल अधिक जानना नहीं, बेहतर मनुष्य बनना था। किन्तु जब इस आदर्श की तुलना वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था से की जाती है, तो एक गहरी बेचैनी मन में उठती है। ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा का केंद्र धीरे-धीरे मनुष्य से हटकर बाज़ार की ओर खिसक गया है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में चरित्र-निर्माण की चर्चा कम होती जा रही है, जबकि करियर, पैकेज और प्रतिस्पर्धा का दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। शिक्षा का मूल्य अब इस आधार पर अधिक आँका जाने लगा है कि वह कितनी शीघ्र और कितनी लाभप्रद नौकरी दिला सकती है। इसी विडंबना ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जैसे विराट कवि को यह लिखने पर मजबूर किया कि "शिक्षे! तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी।" यह शिक्षा के विरोध का उद्घोष नहीं है। यह शिक्षा के तत्कालीन स्वरूप से उनके मन में उपजी पीड़ा की अभिव्यक्ति है । यह उस मानसिकता की आलोचना है जिसने शिक्षा को उसके व्यापक मानवीय उद्देश्य से अलग कर केवल रोजगार प्राप्ति का माध्यम बना दिया है। जब विद्यार्थी का मूल्य उसके चरित्र से अधिक उसके वेतन-पैकेज से आँका जाने लगे, जब विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा केवल प्लेसमेंट आँकड़ों से तय होने लगे और जब अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता केवल अपने पाल्य की नौकरी रह जाए, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से कितनी दूर चली आई है।

               रोजगार निस्संदेह आवश्यक है। शिक्षा जीवनोपयोगी भी होनी चाहिए। किंतु जब रोजगार ही शिक्षा का अंतिम और एकमात्र लक्ष्य बन जाए तब उसके सांस्कृतिक, नैतिक और मानवीय आयाम सिकुड़ने लगते हैं। साधन यदि साध्य का स्थान ले ले तो शिक्षा की आत्मा धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि शिक्षा रोजगार से जुड़ गई है। विडंबना यह है कि रोजगार ही शिक्षा का पर्याय बनता जा रहा है। अध्ययन का उद्देश्य ज्ञानार्जन नहीं, परीक्षा में सफलता रह गया है। परीक्षा का उद्देश्य सीखना नहीं, चयनित होना और चयन का उद्देश्य समाजोपयोगी जीवन नहीं, व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित होता जा रहा है। परिणामतः शिक्षा का पूरा तंत्र उपयोगितावाद की ऐसी परिधि में सिमट गया है, जहाँ चरित्र की अपेक्षा प्रमाणपत्र, जिज्ञासा की अपेक्षा अंक और विवेक की अपेक्षा कौशल अधिक महत्त्वपूर्ण समझे जाने लगे हैं।

               यहाँ एक मूलभूत प्रश्न यह उठता है कि क्या शिक्षा और प्रशिक्षण एक ही बात हैं? यदि उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को रोजगार के योग्य बनाना है तो वह प्रशिक्षण अवश्य है, पर शिक्षा नहीं। प्रशिक्षण जहाँ व्यक्ति को किसी कार्य में दक्ष बनाता है वहीं शिक्षा उसे उस दक्षता के नैतिक और सामाजिक उपयोग का विवेक प्रदान करती है। प्रशिक्षण हाथों को कुशल बनाता है, शिक्षा मनुष्य को उत्तरदायी बनाती है। भारतीय ज्ञान-परंपरा ने इस अंतर को बहुत पहले स्पष्ट कर दिया था। मुण्डक उपनिषद में 'परा' और 'अपरा' विद्या का विवेचन इसी सत्य की ओर संकेत करता है। अपरा विद्या मनुष्य को संसार के व्यवहार में समर्थ बनाती है, जबकि परा विद्या उसे अपने अस्तित्व और जीवन के उद्देश्य का बोध कराती है। दोनों में कोई विरोध नहीं है; वास्तविक शिक्षा तो तब पूर्ण होती है, जब दोनों का संतुलित समन्वय हो। आधुनिक शिक्षा ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रबंधन और संचार जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। यह उसकी बड़ी उपलब्धि है और इसका सम्मान होना चाहिए। किंतु यदि इस प्रगति के साथ नैतिक संवेदना, सामाजिक उत्तरदायित्व और आत्मानुशासन का विकास न हो तो ज्ञान अधूरा रह जाता है। बुद्धि का विस्तार तभी सार्थक है, जब उसके साथ विवेक भी विकसित हो। इसीलिए किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी अर्थव्यवस्था, तकनीकी प्रगति या भौतिक संसाधनों से निर्धारित नहीं होता। उसका वास्तविक स्वरूप उन मूल्यों से निर्मित होता है, जिन्हें उसकी शिक्षा-व्यवस्था अगली पीढ़ी तक पहुँचाती है। संसद कानून बना सकती है, न्यायालय न्याय दे सकते हैं और उद्योग समृद्धि ला सकते हैं परन्तु नागरिकों का चरित्र गढ़ने का दायित्व अंततः शिक्षा पर ही आता है।

                   आज आवश्यकता किसी नई शिक्षा-दर्शन की नहीं है। आवश्यकता उस मूल चेतना को पुनः जागृत करने की है, जिसने शिक्षा को मनुष्यत्व का पर्याय माना था। यदि शिक्षा केवल आर्थिक प्रगति का माध्यम बनकर रह जाएगी तो विकास का ढाँचा भले ही भव्य दिखाई दे, उसकी नैतिक नींव कमजोर होती जाएगी। यहीं से शिक्षक की भूमिका प्रारंभ होती है। किसी भी शिक्षा-व्यवस्था की सफलता केवल उसके पाठ्यक्रम, भवनों या तकनीकी संसाधनों पर निर्भर नहीं करती। इन सबको वास्तविक अर्थ देने वाला तत्व शिक्षक है। विद्यालय भवन दे सकता है, पाठ्यक्रम दिशा दे सकता है और परीक्षा मूल्यांकन कर सकती है किंतु विद्यार्थी के भीतर सीखने की प्रेरणा, जिज्ञासा और जीवन-दृष्टि जगाने का कार्य केवल शिक्षक ही कर सकता है। भारतीय संस्कृति में गुरु का सम्मान उसके पद के कारण नहीं, बल्कि उसके जीवन के कारण था। वह केवल ज्ञान का संप्रेषक नहीं, स्वयं ज्ञान का साधक था। उसके शब्दों की विश्वसनीयता उसके आचरण से उत्पन्न होती थी। इसलिए भारतीय परंपरा ने गुरु को देवतुल्य कहा। यह किसी व्यक्ति-पूजा का विधान नहीं, बल्कि उस उत्तरदायित्व की प्रतिष्ठा है जिसे समाज ने शिक्षक के कंधों पर रखा और ऋषियों ने कहा- 

"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"

                                                    इस श्लोक का आशय गुरु को अलौकिक सिद्ध करना नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि शिक्षक सृजन करता है, व्यक्तित्व का संरक्षण करता है और आवश्यक होने पर उसका परिष्कार भी करता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में शिक्षक का सबसे बड़ा अधिकार उसके पद से नहीं, उसके चरित्र और सतत् अध्ययन से सिद्ध होता था। इसी संदर्भ में तैत्तिरीय उपनिषद का यह निर्देश "स्वाध्यायान्मा प्रमदः।" यह केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, शिक्षकों के लिए भी समान रूप से लागू होता है। जो स्वयं सीखना छोड़ देता है, वह दूसरों में सीखने की प्रेरणा भी लंबे समय तक जीवित नहीं रख सकता। अध्यापन का वास्तविक अधिकार नियुक्ति-पत्र से नहीं, निरंतर स्वाध्याय और आत्मपरिष्कार से अर्जित होता है।

                   आज शिक्षा के सामने जो संकट दिखाई देता है, वह केवल पाठ्यक्रमों या नीतियों का संकट नहीं है। वह शिक्षक के बौद्धिक और नैतिक जीवन से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। जिस शिक्षा-व्यवस्था का आधार स्वाध्याय, चिंतन और संवाद हो, वहाँ यदि शिक्षक स्वयं अध्ययन से दूर होने लगे, तो विद्यार्थियों में ज्ञान-पिपासा कैसे जागृत होगी? जो दीपक स्वयं मद्धिम पड़ जाए, वह दूसरों के लिए आलोक का स्रोत नहीं बन सकता। परंतु इस प्रश्न को केवल शिक्षक की व्यक्तिगत कमजोरी मान लेना भी न्यायसंगत नहीं होगा। शिक्षा-जगत की वर्तमान परिस्थितियों ने उसके सामने ऐसी अनेक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। आज शिक्षक के हाथों में पुस्तकें कम और अभिलेख अधिक हैं। कक्षा की तैयारी से अधिक समय पोर्टलों, प्रतिवेदनों और प्रशासनिक औपचारिकताओं में व्यतीत हो जाता है। कभी सर्वेक्षण, कभी निर्वाचन, कभी जनगणना, कभी विभिन्न योजनाओं का सत्यापन। इन सबके बीच अध्यापन का मूल कार्य अनेक बार पीछे छूट जाता है। इससे हानि केवल शिक्षक की नहीं, शिक्षा की भी है। जिस समय शिक्षक विद्यार्थियों के भीतर प्रश्न, जिज्ञासा और विचार का अंकुर रोप सकता है, उसी समय वह प्रपत्रों और प्रक्रियाओं में उलझा रहता है। धीरे-धीरे उसका श्रम सृजनात्मक अध्यापन से हटकर यांत्रिक प्रशासनिक कार्यों में खपने लगता है। यह व्यवस्था की ऐसी विडंबना है, जिसका दुष्प्रभाव अंततः आने वाली पूरी पीढ़ी पर पड़ रहा है। किन्तु आत्ममंथन तभी सार्थक होता है, जब वह निष्पक्ष हो। यदि व्यवस्था की कमियों की चर्चा आवश्यक है, तो शिक्षक समाज के भीतर उत्पन्न हुई कुछ दुर्बलताओं को स्वीकार किया जाना भी उतना ही आवश्यक है। यह कहना न तो उचित होगा और न सत्य कि समस्त शिक्षक समाज अपने दायित्व से विमुख हो गया है। आज भी असंख्य शिक्षक सीमित संसाधनों और प्रतिकूल परिस्थितियों में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। उनके श्रम और समर्पण के कारण ही शिक्षा की आशा अभी जीवित है। फिर भी यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि शिक्षकों का एक वर्ग ऐसा भी है, जहाँ स्वाध्याय की परंपरा क्षीण हुई है, समय-पालन और कर्तव्यनिष्ठा शिथिल हुई है तथा अध्यापन को केवल सेवा का दायित्व मानकर निभाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह आलोचना किसी व्यक्ति या समुदाय की नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की है जो शिक्षा के मूल उद्देश्य को भीतर से दुर्बल कर रही है।

                    शिक्षक का विद्यार्थियों पर प्रभाव उसके पढ़ाए हुए पाठों से कहीं अधिक उसके जीवन से पड़ता है। विद्यार्थी प्रायः शिक्षक के शब्दों को ही नहीं, उसके व्यवहार, अनुशासन, भाषा, संवेदना और कार्यशैली को भी ग्रहण करते हैं। इसलिए समय पर विद्यालय पहुँचना केवल प्रशासनिक नियम का पालन नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को अनुशासन का मौन पाठ पढ़ाना है। विषय का निरंतर अध्ययन केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, अध्यापन की विश्वसनीयता का आधार है। विद्यार्थियों के प्रति आत्मीयता भावुकता नहीं, बल्कि शिक्षा का नैतिक दायित्व है। भारतीय गुरु-परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वहाँ उपदेश और आचरण के बीच दूरी नहीं थी। गुरु का जीवन ही उसका सबसे प्रभावशाली भाषण होता था। वह जितना अपने शब्दों से सिखाता था, उससे कहीं अधिक अपने आचरण से प्रेरित करता था। इसी कारण समाज ने उसे केवल अध्यापक नहीं, आचार्य कहा, वह जो स्वयं आचरण करके सिखाए।

                    स्वामी विवेकानन्द का प्रसिद्ध कथन था कि यदि उन्हें सौ चरित्रवान, निर्भीक और ऊर्जावान युवक मिल जाए, तो वे समाज की दशा और दिशा बदल सकते हैं। यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। किंतु ऐसे युवक किसी संयोग से नहीं बनते। उनका निर्माण परिवार में संस्कारों से, समाज में मूल्यों से और विद्यालय में शिक्षक के व्यक्तित्व से होता है। इसलिए शिक्षा-सुधार की चर्चा केवल नई नीतियों, आधुनिक तकनीक या संसाधनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी परिवर्तन का वास्तविक आधार शिक्षक का व्यक्तित्व ही होगा। यदि शिक्षक अपने भीतर स्वाध्याय की जिज्ञासा, सत्यनिष्ठा की दृढ़ता और विद्यार्थियों के प्रति आत्मीय उत्तरदायित्व को पुनः जागृत कर सके, तो शिक्षा का बड़ा परिवर्तन बिना किसी व्यापक अभियान के भी संभव है। अंततः शिक्षक को यह स्मरण रखना होगा कि उसकी नियुक्ति भले शासन या प्रशासन ने की है परन्तु उसकी प्रतिष्ठा समाज ही निर्धारित करता है। वेतन उसे सेवा के प्रतिफल के रूप में मिलता है, किंतु सम्मान उसके जीवन और आचरण से अर्जित होता है। सेवा-पुस्तिका उसके कार्यकाल का लेखा रख सकती है परन्तु इतिहास उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है। यही कारण है कि शिक्षक का प्रत्येक दिन केवल नौकरी का एक दिन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य में किया गया एक मौन निवेश होता है।

                  ईशावास्य उपनिषद् का उद्घोष- "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा" मात्र वैराग्य का संदेश नहीं, बल्कि संयम का शाश्वत सूत्र है। कठोपनिषद् में 'श्रेय' और 'प्रेय' का विवेचन हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य के सामने सदैव दो मार्ग होते हैं, एक तत्कालिक लाभ का और दूसरा दीर्घकालिक कल्याण का। आज शिक्षा के सामने बड़ा संकट यही है कि यहाँ प्रेय को ही श्रेय समझ लिया है। अल्पकालिक सफलता की चकाचौंध ने दीर्घकालिक चरित्र-निर्माण की साधना को धूमिल कर दिया है। यदि शिक्षा का लक्ष्य केवल त्वरित सफलता, रोजगार और आर्थिक उपयोगिता तक सीमित रह जाएगा तो वह दक्ष कर्मी तो तैयार कर सकती है, किंतु जागरूक नागरिक नहीं। राष्ट्र की दीर्घकालिक शक्ति केवल उसके नागरिकों के कौशल में नहीं, उनके चरित्र में निहित होती है। इसीलिए आज आवश्यकता केवल पाठ्यक्रमों के पुनरीक्षण या नई शिक्षा-नीतियों की नहीं, बल्कि शिक्षा के मूल दृष्टिकोण पर पुनर्विचार की है। विद्यालयों को पुनः ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहाँ जिज्ञासा का सम्मान हो, संवाद जीवित रहे और नैतिक संवेदनाएँ शिक्षा की स्वाभाविक धारा बनें। विश्वविद्यालय केवल उपाधियाँ प्रदान करने वाले संस्थान न रहें, बल्कि स्वतंत्र चिंतन और बौद्धिक साहस के केंद्र बनें। विज्ञान और तकनीक का विकास जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है कि उनके साथ मानवीय मूल्यों का भी संवर्धन हो। ज्ञान तभी पूर्ण होता है जब वह मनुष्य को अधिक सक्षम बनाने के साथ-साथ अधिक संवेदनशील भी बनाए। 

                 वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में यह परिवर्तन किसी एक वर्ग के प्रयास से संभव नहीं होगा। शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, समाज और शासन। सभी इस प्रक्रिया के समान भागीदार हैं। विद्यार्थी यदि अध्ययन को केवल परीक्षा की तैयारी मानेंगे, अभिभावक शिक्षा को केवल निवेश समझेंगे, शिक्षक उसे मात्र सेवा का दायित्व मानेंगे और शासन उसे केवल आँकड़ों में मापेगा तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सकेगा। शिक्षा एक साझा सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है, उसका उत्थान भी सामूहिक चेतना से ही संभव है। इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि किसी भी सभ्यता का वास्तविक वैभव उसकी इमारतों, आर्थिक सामर्थ्य या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं आँका जाता। उसकी पहचान उन मनुष्यों से होती है, जिन्हें उसकी शिक्षा-व्यवस्था तैयार करती है। जिन समाजों ने चरित्र की अपेक्षा चातुर्य, सत्य की अपेक्षा सुविधा और मूल्यों की अपेक्षा बाज़ार को अधिक महत्त्व दिया, वे कुछ समय के लिए समृद्ध अवश्य हुए परन्तु स्थायी आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके विपरीत जिन राष्ट्रों ने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन नहीं, व्यक्तित्व-निर्माण का माध्यम बनाया, वे इतिहास में दीर्घजीवी और प्रेरणास्रोत बने। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्ति- "शिक्षे! तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी।" इसी गहरी चिंता की अभिव्यक्ति है। यह शिक्षा के व्यावसायीकरण, उपयोगितावाद और आत्मविस्मृति के विरुद्ध उद्घोष है। यह उस मानसिकता के विसर्जन का आह्वान है जिसने ज्ञान के महासागर को वेतन की एक छोटी-सी धारा में सीमित कर दिया है। रोजगार आवश्यक है, किंतु यदि वही शिक्षा का अंतिम मानदंड बन जाए तो ज्ञान की व्यापकता और मनुष्यत्व की ऊँचाई दोनों ही संकुचित हो जाती हैं।

                  आज आवश्यकता उस शिक्षा को पुनः प्रतिष्ठित करने की है जो बुद्धि को विवेक, हृदय को करुणा और जीवन को उत्तरदायित्व से संपन्न करे। जहाँ विद्यालय नियुक्ति-पत्रों के उत्पादन-केंद्र नहीं, संस्कारों के सृजन-स्थल हों। जहाँ विश्वविद्यालय सूचना का भंडार भर न बनें, बल्कि विचार और विमर्श की जीवंत परंपरा के वाहक बनें और जहाँ शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला कर्मचारी नहीं, अपने व्यक्तित्व से प्रेरणा देने वाला गुरु बनने का सतत प्रयास करे। शिक्षा का भविष्य किसी एक नीति, योजना या शासनादेश से निर्धारित नहीं होगा। उसका भविष्य उन लाखों शिक्षकों के हाथों में है जो प्रतिदिन कक्षा में प्रवेश करते हैं, उन विद्यार्थियों में है जो सीखने की जिज्ञासा को जीवित रखते हैं और उस समाज के हाथों में है जो शिक्षा को केवल आर्थिक उन्नति का साधन नहीं, सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय चरित्र की आधारशिला मानता है। जब यह दृष्टि पुनः स्थापित होगी, तब शिक्षा नौकरी की दासी नहीं, राष्ट्रचेतना की अधिष्ठात्री बनेगी। वही दिन भारतीय शिक्षा-दर्शन की वास्तविक पुनर्प्रतिष्ठा का दिन होगा।

✍️ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 2 June 2026

ग़ज़ल- दिल के तारों को मिला दे साकिया ए साकिया

 दिल के तारों को मिला दे साकिया ए साकिया
बीच के पर्दे हटा दे साकिया ए साकिया

सब तुझे चश्मे मसीहा कह रहे हैं आजकल
मुझको भी थोड़ी शिफ़ा दे साकिया ए साकिया

कब तलक यूं मयकशी में यार उलझा मैं रहूं
जाम नजरों के पिला दे साकिया ए साकिया

रात की हर बात भूली लम्स-ए-लब ही याद बस
फिर लबों से लब मिला दे साकिया ए साकिया

भूल कर उलझन चुभन हर सो सकूं मैं पुरसुकूं
कुछ तो ऐसा गुनगुना दे साकिया ए साकिया

दर्द को दिल में छुपाना, मुस्कुराना, कत्म-ए-अश्क
मुझको भी ये सब सिखा दे साकिया ए साकिया

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 19 April 2026

लेख- सीता तत्व परिसंवाद एवं रामायण शक्ति तत्व उत्सव

 "सीता तत्व परिसंवाद एवं रामायण शक्ति तत्व उत्सव"

                                                                                 - डॉ पवन मिश्र, कानपुर (उ0प्र0)

आज की इस विचार गोष्ठी का विषय अत्यंत पुनीत और वंदनीय है। जब रामायण के श्लोकों में मानस के छंदों में माता सीता को खोजते हैं तो हमें केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक संपूर्ण दर्शन प्राप्त होता है। रामचरितमानस केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन जीने की संहिता है। इस संहिता का सबसे कोमल और सबसे सुदृढ़ पक्ष है—सीता तत्व।

            माता सीता धरती से प्रकट हुई हैं। जैसे धरती सब कुछ सहकर भी सबको जीवन देती है, वैसे ही सीता जी का पूरा जीवन सहिष्णुता का पर्याय है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के मंगलाचरण में ही स्पष्ट कर दिया है कि सीता जी केवल एक राजकुमारी या रानी नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली आदिशक्ति हैं:

"उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥"

      सीता तत्व वह शक्ति है जो 'राम' (ब्रह्म) को लोक-कल्याण हेतु सगुण रूप में सक्रिय करती है। मानस के बालकांड में जब जनकपुर की वीथियों में राम और सीता का मिलन होता है, तो वह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि ब्रह्म और माया का मिलन है। गोस्वामी जी कहते हैं:

"गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।"

सीता राम की अभिन्न शक्ति हैं। सीता त्याग और तितिक्षा की प्रतिमूर्ति हैं। राजभवन के समस्त सुखों को तिनके के समान त्याग कर वन की पथरीली राहों पर चलना, उनके अटूट पतिव्रत धर्म और संकल्प को दर्शाता है। जब श्री राम वन जाने लगते हैं, तो वे सीता जी को महल में रुकने के लिए अनेक तर्क देते हैं। वे कहते हैं कि वन का मार्ग अत्यंत कठिन है। तब सीता जी का जो उत्तर है, वह 'सीता तत्व' की सार्थकता सिद्ध करता है:

"जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसेहिं नाथ पुरुष बिनु नारी॥"

   यहाँ सीता जी स्पष्ट करती हैं कि राम के बिना सीता का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। यह 'अनन्यता' ही सीता तत्व का मूल है। सीता जी का व्यक्तित्व सुख और दुःख दोनों में समभाव रहने की प्रेरणा देता है। मां सीता संपूर्ण चराचर जगत की माता हैं। उनका वात्सल्य शबरी, जटायु और यहाँ तक कि लंका के अशोक वाटिका में त्रिजटा जैसी राक्षसी के प्रति भी झलकता है। वे करुणा की साक्षात मूर्ति हैं। सीता तत्व हमें सिखाता है कि सहनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि एक महान आत्मिक बल है।

"क्या सीता जी असहाय थीं?" 

"नहीं! जो त्रिलोकी के स्वामी राम को अपनी उंगली पर नचा सकती थीं, जो बचपन में शिव के धनुष को हाथ से उठाकर सफाई कर देती थीं, वे असहाय कैसे हो सकती हैं? उनका मौन और उनका दुख 'निर्बलता' नहीं, बल्कि 'लोक-मर्यादा' का निर्वाह था।"

माता सीता राम के संकल्प की सिद्धि हैं। उनके बिना राम का 'रामत्व' प्रकट नहीं होता। वे राम की 'अनुगामिनी' ही नहीं, बल्कि उनकी 'प्रेरणा' भी हैं। सीता तत्व हमें सिखाता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी अपनी निष्ठा कैसे बचाए रखें। यदि हम आज के युग में सीता तत्व को समझना चाहते हैं, तो हमें केवल उनके कष्टों को नहीं, बल्कि उस कष्ट के पीछे छिपे उनके आत्मबल को देखना होगा।

"सीता वह तत्व है जहाँ भक्ति, शक्ति में बदल जाती है और शक्ति, मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।"

"राम यदि मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, तो सीता उस मर्यादा की 'परिभाषा' हैं।"

"सीता तत्व का अर्थ है—अपने अस्तित्व को अपने इष्ट (ईश्वर/लक्ष्य) में पूरी तरह विलीन कर देना।"

आज के इस उपभोक्तावादी और कोलाहलपूर्ण युग में प्रश्न उठता है कि त्रेतायुग का 'सीता तत्व' आज हमारे लिए क्यों आवश्यक है? आज जब संबंध कांच की तरह दरक रहे हैं और धैर्य लुप्त होता जा रहा है, तब सीता जी का चरित्र हमें 'आंतरिक शक्ति' का मार्ग दिखाता है। 

आज के दौर में जहाँ स्त्री की पहचान अक्सर बाहरी रूप-रंग तक सीमित कर दी जाती है, वहाँ सीता तत्व सिखाता है कि स्त्री की असली शक्ति उसकी 'वैचारिक सुदृढ़ता' और 'चरित्र की आभा' में है। अशोक वाटिका में अकेले रहकर भी रावण जैसी वैश्विक शक्ति को चुनौती देना यह दर्शाता है कि यदि कोई अपने सत्य पर अडिग है, तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत डिगा नहीं सकती। आज की युवा पीढ़ी, जो अवसाद और अकेलेपन से जूझ रही है, वह सीता जी के 'धैर्य तत्व' से आत्मबल सीख सकती है।

"आज समाज को केवल अधिकारों की बात करने वाली चेतना ही नहीं, बल्कि कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों को संजोने वाले उस सीता तत्व की परम आवश्यकता है, जो बिखरते हुए परिवारों और समाज को अपनी करुणा से जोड़ सके।"

सीता तत्व' कल भी सत्य था और आज भी सत्य है, अनिवार्य है। गोस्वामी जी ने सीता जी के माध्यम से हमें वह सूत्र दिया है, जिससे एक साधारण मनुष्य भी अपनी संकल्प शक्ति के बल पर 'असाधारण' बन सकता है।

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि 'सीता तत्व' भारतीय संस्कृति का वह आधार स्तंभ है, जो हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा और शील को कैसे सुरक्षित रखा जाए। राम यदि 'आदर्श पुरुष' हैं, तो सीता 'आदर्श शक्ति' हैं। उनके बिना रामचरित अधूरा है।

आइए, इस गोष्ठी के माध्यम से हम उस पावन सीता तत्व को अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास करें।

धन्यवाद। जय सियाराम!






Sunday, 1 March 2026

ग़ज़ल- ये हम इक़रार करते हैं सरे बाज़ार करते हैं

 ये हम इक़रार करते हैं सरे बाज़ार करते हैं
तुम्ही से प्यार करते हैं तुम्ही से प्यार करते हैं

मुहब्बत है अगर इक आग का दरिया तो होने दो
हमारे साथ आओ आज दरिया पार करते हैं

बहुत चैन-ओ-सुकूं से रहना वहना हो गया साहब
चलो अब इश्क़ में ये ज़िंदगी बेज़ार करते हैं

जरूरत हो हमारी तुम तुम्हारे बिन नहीं जीवन
तुम्हारे साथ अपने स्वप्न हम साकार करते हैं 

चमन में खाद पानी पा जो बढ़ती जा रहीं प्रतिदिन
चलो उन जंगली बेलों का कुछ उपचार करते हैं

पवन क्या लोग दुनिया में कभी ये सोचते होंगे
किसी के साथ आख़िर क्यों बुरा व्यवहार करते हैं

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 4 January 2026

ग़ज़ल- जिसे समझे थे हम हासिल हमारा

जिसे समझे थे हम हासिल हमारा
वही इक दिन बना कातिल हमारा

हमारा क़त्ल और हम ही हैं मुज़रिम
बहुत शातिर है वो कातिल हमारा

हमारी बाम पर नज़रें टिकी हैं
कहाँ गुम है महे कामिल हमारा

ये आंखें खोजती हैं बस तुम्हे ही
तुम्हारी राह तकता दिल हमारा 

हमारी कश्तियाँ मझधार में हैं
न जाने है कहाँ साहिल हमारा

नहीं बाज़ीगरी लफ़्ज़ों की केवल
ग़ज़ल में दर्द भी शामिल हमारा

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 5 October 2025

स्नेह सम्मिलन- ७

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।

राम-लखन का रस्ता देखें, ज्यों शबरी के बेर।।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।


एक वर्ष के बाद आई है, नेह-मिलन की वेला।

संगम तट पर खूब सजेगा वाणीजन का मेला।।

लोकगीत की धुन पर सारे नाचेंगे-झूमेंगे।

बाटी-चोखा, खीर-कचौड़ी स्वाद सभी चक्खेंगे।।

जल्दी से अब टिकट करा लो हो न जाये देर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

पहली बार किशनपुर वाले भूल गए क्या वो पल,

एकडला के गन्नों का रस वो यमुना का कल-कल।

याद नहीं क्या प्रथम मिलन की नेह भरी वो बतिया,

जौ मकई की सोंधी रोटी वो अमरूद की बगिया।।

वाणी के उस प्रथम मंच से खूब दहाड़े शेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

दूजी बार गए ददरा अब्दुल हमीद के गांव,

अबकी बार थी अमराई और उसकी ठंडी छाँव।

चटक धूप में सभी मगन थे नेह की चादर ताने,

ढोल मंजीरे से उल्लासित कजरी के दीवाने।।

उमड़ घुमड़ कर वही भाव फिर हमें रहा है टेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

उसके बाद सभी वाणीजन पहुंचे थे इक मरुथर,

कुछ ने पकड़ी ट्रेन हावड़ा कुछ ने थामी मरुधर।

ग्राम उदासर ने अद्भुत सत्कार किया था सबका,

राजस्थानी भोजन था और था वाणी का तबका।।

अद्भुत मंच सजा था उस दिन नगर था बीकानेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

याद करो वो चौथी बारी, गंगा तट का रंग

बाबा भोले की नगरी में हुआ था जब हुड़दंग।

कतकी मेला के पहले ही मिले थे जब दीवाने,

शमा जलाने स्नेह मिलन की आए थे परवाने।।

ढोल-मँजीरा हरमोनियम को, बैठे थे सब घेर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

पंचम न्यौता हरियाणा से, मिला था वानीजन को।

शहर भिवानी में जाकर ही, तृप्ति मिली थी मन को।।

लोकगीत की धुन पर सारे नाचे थे झूमे थे।

ज्वार बाजरा ग्वार फली हर थाली में घूमे थे।।

छोटी काशी के कवियों सँग वाणी के थे शेर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

छठवां मौका सबने पाया, चित्रकूट नगरी में।

स्नेह समर्पण मानो जैसे, भरा था हर गगरी में।।

गीतों की रसवर्षा में जब भीझे थे वानीजन।

साथ घूमने की मस्ती में, वाणी का अपनापन।।

गीत ग़ज़ल की शुभ संध्या में डूबे शब्द-कुबेर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

राम-लखन का रस्ता देखें, ज्यों शबरी के बेर।।


                                  ✍ डॉ पवन मिश्

Monday, 15 September 2025

ग़ज़ल- वो हमारे स्नेह का अपमान करते रह गए

वो हमारे स्नेह का अपमान करते रह गए
स्वार्थवश सम्बंध का नुकसान करते रह गए

आपने सम्बंध के अनुबंध को समझा नहीं
एक हम जो हर कहे का मान करते रह गए

भूमि धन सबकुछ दिया हमने पड़ोसी मानकर
वो हमारा किंतु बस नुकसान करते रह गए

आपको सत्ता मिली थी राष्ट्र के उत्थान हित
आप केवल स्वयं का उत्थान करते रह गए

लोकस्वर भरता रहा बस राजपथ पर सिसकियां
और चारण राज्य का गुणगान करते रह गए

वंचितों की सुध कभी सत्ता को होगी क्या पवन
जो महज लाइन में लग मतदान करते रह गए


✍️ डॉ पवन मिश्र