Sunday, 19 April 2026

लेख- सीता तत्व परिसंवाद एवं रामायण शक्ति तत्व उत्सव

 "सीता तत्व परिसंवाद एवं रामायण शक्ति तत्व उत्सव"

                                                                                 - डॉ पवन मिश्र, कानपुर (उ0प्र0)

आज की इस विचार गोष्ठी का विषय अत्यंत पुनीत और वंदनीय है। जब रामायण के श्लोकों में मानस के छंदों में माता सीता को खोजते हैं तो हमें केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक संपूर्ण दर्शन प्राप्त होता है। रामचरितमानस केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन जीने की संहिता है। इस संहिता का सबसे कोमल और सबसे सुदृढ़ पक्ष है—सीता तत्व।

            माता सीता धरती से प्रकट हुई हैं। जैसे धरती सब कुछ सहकर भी सबको जीवन देती है, वैसे ही सीता जी का पूरा जीवन सहिष्णुता का पर्याय है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के मंगलाचरण में ही स्पष्ट कर दिया है कि सीता जी केवल एक राजकुमारी या रानी नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली आदिशक्ति हैं:

"उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥"

      सीता तत्व वह शक्ति है जो 'राम' (ब्रह्म) को लोक-कल्याण हेतु सगुण रूप में सक्रिय करती है। मानस के बालकांड में जब जनकपुर की वीथियों में राम और सीता का मिलन होता है, तो वह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि ब्रह्म और माया का मिलन है। गोस्वामी जी कहते हैं:

"गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।"

सीता राम की अभिन्न शक्ति हैं। सीता त्याग और तितिक्षा की प्रतिमूर्ति हैं। राजभवन के समस्त सुखों को तिनके के समान त्याग कर वन की पथरीली राहों पर चलना, उनके अटूट पतिव्रत धर्म और संकल्प को दर्शाता है। जब श्री राम वन जाने लगते हैं, तो वे सीता जी को महल में रुकने के लिए अनेक तर्क देते हैं। वे कहते हैं कि वन का मार्ग अत्यंत कठिन है। तब सीता जी का जो उत्तर है, वह 'सीता तत्व' की सार्थकता सिद्ध करता है:

"जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसेहिं नाथ पुरुष बिनु नारी॥"

   यहाँ सीता जी स्पष्ट करती हैं कि राम के बिना सीता का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। यह 'अनन्यता' ही सीता तत्व का मूल है। सीता जी का व्यक्तित्व सुख और दुःख दोनों में समभाव रहने की प्रेरणा देता है। मां सीता संपूर्ण चराचर जगत की माता हैं। उनका वात्सल्य शबरी, जटायु और यहाँ तक कि लंका के अशोक वाटिका में त्रिजटा जैसी राक्षसी के प्रति भी झलकता है। वे करुणा की साक्षात मूर्ति हैं। सीता तत्व हमें सिखाता है कि सहनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि एक महान आत्मिक बल है।

"क्या सीता जी असहाय थीं?" 

"नहीं! जो त्रिलोकी के स्वामी राम को अपनी उंगली पर नचा सकती थीं, जो बचपन में शिव के धनुष को हाथ से उठाकर सफाई कर देती थीं, वे असहाय कैसे हो सकती हैं? उनका मौन और उनका दुख 'निर्बलता' नहीं, बल्कि 'लोक-मर्यादा' का निर्वाह था।"

माता सीता राम के संकल्प की सिद्धि हैं। उनके बिना राम का 'रामत्व' प्रकट नहीं होता। वे राम की 'अनुगामिनी' ही नहीं, बल्कि उनकी 'प्रेरणा' भी हैं। सीता तत्व हमें सिखाता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी अपनी निष्ठा कैसे बचाए रखें। यदि हम आज के युग में सीता तत्व को समझना चाहते हैं, तो हमें केवल उनके कष्टों को नहीं, बल्कि उस कष्ट के पीछे छिपे उनके आत्मबल को देखना होगा।

"सीता वह तत्व है जहाँ भक्ति, शक्ति में बदल जाती है और शक्ति, मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।"

"राम यदि मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, तो सीता उस मर्यादा की 'परिभाषा' हैं।"

"सीता तत्व का अर्थ है—अपने अस्तित्व को अपने इष्ट (ईश्वर/लक्ष्य) में पूरी तरह विलीन कर देना।"

आज के इस उपभोक्तावादी और कोलाहलपूर्ण युग में प्रश्न उठता है कि त्रेतायुग का 'सीता तत्व' आज हमारे लिए क्यों आवश्यक है? आज जब संबंध कांच की तरह दरक रहे हैं और धैर्य लुप्त होता जा रहा है, तब सीता जी का चरित्र हमें 'आंतरिक शक्ति' का मार्ग दिखाता है। 

आज के दौर में जहाँ स्त्री की पहचान अक्सर बाहरी रूप-रंग तक सीमित कर दी जाती है, वहाँ सीता तत्व सिखाता है कि स्त्री की असली शक्ति उसकी 'वैचारिक सुदृढ़ता' और 'चरित्र की आभा' में है। अशोक वाटिका में अकेले रहकर भी रावण जैसी वैश्विक शक्ति को चुनौती देना यह दर्शाता है कि यदि कोई अपने सत्य पर अडिग है, तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत डिगा नहीं सकती। आज की युवा पीढ़ी, जो अवसाद और अकेलेपन से जूझ रही है, वह सीता जी के 'धैर्य तत्व' से आत्मबल सीख सकती है।

"आज समाज को केवल अधिकारों की बात करने वाली चेतना ही नहीं, बल्कि कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों को संजोने वाले उस सीता तत्व की परम आवश्यकता है, जो बिखरते हुए परिवारों और समाज को अपनी करुणा से जोड़ सके।"

सीता तत्व' कल भी सत्य था और आज भी सत्य है, अनिवार्य है। गोस्वामी जी ने सीता जी के माध्यम से हमें वह सूत्र दिया है, जिससे एक साधारण मनुष्य भी अपनी संकल्प शक्ति के बल पर 'असाधारण' बन सकता है।

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि 'सीता तत्व' भारतीय संस्कृति का वह आधार स्तंभ है, जो हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा और शील को कैसे सुरक्षित रखा जाए। राम यदि 'आदर्श पुरुष' हैं, तो सीता 'आदर्श शक्ति' हैं। उनके बिना रामचरित अधूरा है।

आइए, इस गोष्ठी के माध्यम से हम उस पावन सीता तत्व को अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास करें।

धन्यवाद। जय सियाराम!






Sunday, 1 March 2026

ग़ज़ल- ये हम इक़रार करते हैं सरे बाज़ार करते हैं

 ये हम इक़रार करते हैं सरे बाज़ार करते हैं
तुम्ही से प्यार करते हैं तुम्ही से प्यार करते हैं

मुहब्बत है अगर इक आग का दरिया तो होने दो
हमारे साथ आओ आज दरिया पार करते हैं

बहुत चैन-ओ-सुकूं से रहना वहना हो गया साहब
चलो अब इश्क़ में ये ज़िंदगी बेज़ार करते हैं

जरूरत हो हमारी तुम तुम्हारे बिन नहीं जीवन
तुम्हारे साथ अपने स्वप्न हम साकार करते हैं 

चमन में खाद पानी पा जो बढ़ती जा रहीं प्रतिदिन
चलो उन जंगली बेलों का कुछ उपचार करते हैं

पवन क्या लोग दुनिया में कभी ये सोचते होंगे
किसी के साथ आख़िर क्यों बुरा व्यवहार करते हैं

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 4 January 2026

ग़ज़ल- जिसे समझे थे हम हासिल हमारा

जिसे समझे थे हम हासिल हमारा
वही इक दिन बना कातिल हमारा

हमारा क़त्ल और हम ही हैं मुज़रिम
बहुत शातिर है वो कातिल हमारा

हमारी बाम पर नज़रें टिकी हैं
कहाँ गुम है महे कामिल हमारा

ये आंखें खोजती हैं बस तुम्हे ही
तुम्हारी राह तकता दिल हमारा 

हमारी कश्तियाँ मझधार में हैं
न जाने है कहाँ साहिल हमारा

नहीं बाज़ीगरी लफ़्ज़ों की केवल
ग़ज़ल में दर्द भी शामिल हमारा

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 5 October 2025

स्नेह सम्मिलन- ७

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।

राम-लखन का रस्ता देखें, ज्यों शबरी के बेर।।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।


एक वर्ष के बाद आई है, नेह-मिलन की वेला।

संगम तट पर खूब सजेगा वाणीजन का मेला।।

लोकगीत की धुन पर सारे नाचेंगे-झूमेंगे।

बाटी-चोखा, खीर-कचौड़ी स्वाद सभी चक्खेंगे।।

जल्दी से अब टिकट करा लो हो न जाये देर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

पहली बार किशनपुर वाले भूल गए क्या वो पल,

एकडला के गन्नों का रस वो यमुना का कल-कल।

याद नहीं क्या प्रथम मिलन की नेह भरी वो बतिया,

जौ मकई की सोंधी रोटी वो अमरूद की बगिया।।

वाणी के उस प्रथम मंच से खूब दहाड़े शेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

दूजी बार गए ददरा अब्दुल हमीद के गांव,

अबकी बार थी अमराई और उसकी ठंडी छाँव।

चटक धूप में सभी मगन थे नेह की चादर ताने,

ढोल मंजीरे से उल्लासित कजरी के दीवाने।।

उमड़ घुमड़ कर वही भाव फिर हमें रहा है टेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

उसके बाद सभी वाणीजन पहुंचे थे इक मरुथर,

कुछ ने पकड़ी ट्रेन हावड़ा कुछ ने थामी मरुधर।

ग्राम उदासर ने अद्भुत सत्कार किया था सबका,

राजस्थानी भोजन था और था वाणी का तबका।।

अद्भुत मंच सजा था उस दिन नगर था बीकानेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

याद करो वो चौथी बारी, गंगा तट का रंग

बाबा भोले की नगरी में हुआ था जब हुड़दंग।

कतकी मेला के पहले ही मिले थे जब दीवाने,

शमा जलाने स्नेह मिलन की आए थे परवाने।।

ढोल-मँजीरा हरमोनियम को, बैठे थे सब घेर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

पंचम न्यौता हरियाणा से, मिला था वानीजन को।

शहर भिवानी में जाकर ही, तृप्ति मिली थी मन को।।

लोकगीत की धुन पर सारे नाचे थे झूमे थे।

ज्वार बाजरा ग्वार फली हर थाली में घूमे थे।।

छोटी काशी के कवियों सँग वाणी के थे शेर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

छठवां मौका सबने पाया, चित्रकूट नगरी में।

स्नेह समर्पण मानो जैसे, भरा था हर गगरी में।।

गीतों की रसवर्षा में जब भीझे थे वानीजन।

साथ घूमने की मस्ती में, वाणी का अपनापन।।

गीत ग़ज़ल की शुभ संध्या में डूबे शब्द-कुबेर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, मार्ग रहा है हेर।।

राम-लखन का रस्ता देखें, ज्यों शबरी के बेर।।


                                  ✍ डॉ पवन मिश्

Monday, 15 September 2025

ग़ज़ल- वो हमारे स्नेह का अपमान करते रह गए

वो हमारे स्नेह का अपमान करते रह गए
स्वार्थवश सम्बंध का नुकसान करते रह गए

आपने सम्बंध के अनुबंध को समझा नहीं
एक हम जो हर कहे का मान करते रह गए

भूमि धन सबकुछ दिया हमने पड़ोसी मानकर
वो हमारा किंतु बस नुकसान करते रह गए

आपको सत्ता मिली थी राष्ट्र के उत्थान हित
आप केवल स्वयं का उत्थान करते रह गए

लोकस्वर भरता रहा बस राजपथ पर सिसकियां
और चारण राज्य का गुणगान करते रह गए

वंचितों की सुध कभी सत्ता को होगी क्या पवन
जो महज लाइन में लग मतदान करते रह गए


✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 17 August 2025

ग़ज़ल- अपने बच्चों के लिये दुनिया सजा कर जाऊंगा

अपने बच्चों के लिये दुनिया सजा कर जाऊंगा
यह ज़मीं शादाब हो खुद को खपा कर जाऊंगा

ज़िंदगी की दौड़ में चलते ही रहना है मुझे
बाप हूँ मैं फ़र्ज़ अपने सब निभा कर जाऊंगा

बाद मेरे ये ज़माना याद मुझको रख सके
कम से कम इक शेर ऐसा मैं सुना कर जाऊंगा

लोग कहते चांद आता है तुम्हारे बाम पर
आज उसकी चांदनी में मैं नहा कर जाऊंगा

इश्क़ गर कोई ख़ता है तो अकेले तुम नहीं
एक दिन मैं भी कोई ऐसी ख़ता कर जाऊंगा

ज़िंदगी में आपसे बढ़कर नहीं है ख़ास कुछ
जाते जाते आपको सबकुछ बता कर जाऊंगा

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 20 July 2025

ग़ज़ल- फिजाओं में गुलों के रंग-ओ-बू में

फ़िज़ाओं में गुलों के रंग-ओ-बू में
उसे ही ढूंढता हूँ कू-ब-कू में

जिसे परवा नहीं मेरी तनिक भी
वही शामिल है मेरी आरजू में

छुड़ाकर हाथ उसने राह बदली
मैं तो अब भी फँसा हूँ गू-मगू में

जो तुम हो तो बहारें रक्स करतीं
नहीं तो बू नहीं है मुश्कबू में

सियासतदां अभी पुरनींद में हैं
कसर बाकी है शायद हाव-हू में

वतन की साख पर जब बात आए
उबाल आना जरूरी है लहू में

✍️ डॉ पवन मिश्र

कू-ब-कू= इस गली-उस गली, सर्वत्र
गू-मगू= असमंजस
रक्स= नृत्य
मुश्कबू= कस्तूरी की गंध
हाव-हू= शोर-शराबा