"सीता तत्व परिसंवाद एवं रामायण शक्ति तत्व उत्सव"
- डॉ पवन मिश्र, कानपुर (उ0प्र0)
आज की इस विचार गोष्ठी का विषय अत्यंत पुनीत और वंदनीय है। जब रामायण के श्लोकों में मानस के छंदों में माता सीता को खोजते हैं तो हमें केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक संपूर्ण दर्शन प्राप्त होता है। रामचरितमानस केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन जीने की संहिता है। इस संहिता का सबसे कोमल और सबसे सुदृढ़ पक्ष है—सीता तत्व।
माता सीता धरती से प्रकट हुई हैं। जैसे धरती सब कुछ सहकर भी सबको जीवन देती है, वैसे ही सीता जी का पूरा जीवन सहिष्णुता का पर्याय है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के मंगलाचरण में ही स्पष्ट कर दिया है कि सीता जी केवल एक राजकुमारी या रानी नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली आदिशक्ति हैं:
"उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥"
सीता तत्व वह शक्ति है जो 'राम' (ब्रह्म) को लोक-कल्याण हेतु सगुण रूप में सक्रिय करती है। मानस के बालकांड में जब जनकपुर की वीथियों में राम और सीता का मिलन होता है, तो वह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि ब्रह्म और माया का मिलन है। गोस्वामी जी कहते हैं:
"गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।"
सीता राम की अभिन्न शक्ति हैं। सीता त्याग और तितिक्षा की प्रतिमूर्ति हैं। राजभवन के समस्त सुखों को तिनके के समान त्याग कर वन की पथरीली राहों पर चलना, उनके अटूट पतिव्रत धर्म और संकल्प को दर्शाता है। जब श्री राम वन जाने लगते हैं, तो वे सीता जी को महल में रुकने के लिए अनेक तर्क देते हैं। वे कहते हैं कि वन का मार्ग अत्यंत कठिन है। तब सीता जी का जो उत्तर है, वह 'सीता तत्व' की सार्थकता सिद्ध करता है:
"जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसेहिं नाथ पुरुष बिनु नारी॥"
यहाँ सीता जी स्पष्ट करती हैं कि राम के बिना सीता का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। यह 'अनन्यता' ही सीता तत्व का मूल है। सीता जी का व्यक्तित्व सुख और दुःख दोनों में समभाव रहने की प्रेरणा देता है। मां सीता संपूर्ण चराचर जगत की माता हैं। उनका वात्सल्य शबरी, जटायु और यहाँ तक कि लंका के अशोक वाटिका में त्रिजटा जैसी राक्षसी के प्रति भी झलकता है। वे करुणा की साक्षात मूर्ति हैं। सीता तत्व हमें सिखाता है कि सहनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि एक महान आत्मिक बल है।
"क्या सीता जी असहाय थीं?"
"नहीं! जो त्रिलोकी के स्वामी राम को अपनी उंगली पर नचा सकती थीं, जो बचपन में शिव के धनुष को हाथ से उठाकर सफाई कर देती थीं, वे असहाय कैसे हो सकती हैं? उनका मौन और उनका दुख 'निर्बलता' नहीं, बल्कि 'लोक-मर्यादा' का निर्वाह था।"
माता सीता राम के संकल्प की सिद्धि हैं। उनके बिना राम का 'रामत्व' प्रकट नहीं होता। वे राम की 'अनुगामिनी' ही नहीं, बल्कि उनकी 'प्रेरणा' भी हैं। सीता तत्व हमें सिखाता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी अपनी निष्ठा कैसे बचाए रखें। यदि हम आज के युग में सीता तत्व को समझना चाहते हैं, तो हमें केवल उनके कष्टों को नहीं, बल्कि उस कष्ट के पीछे छिपे उनके आत्मबल को देखना होगा।
"सीता वह तत्व है जहाँ भक्ति, शक्ति में बदल जाती है और शक्ति, मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।"
"राम यदि मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, तो सीता उस मर्यादा की 'परिभाषा' हैं।"
"सीता तत्व का अर्थ है—अपने अस्तित्व को अपने इष्ट (ईश्वर/लक्ष्य) में पूरी तरह विलीन कर देना।"
आज के इस उपभोक्तावादी और कोलाहलपूर्ण युग में प्रश्न उठता है कि त्रेतायुग का 'सीता तत्व' आज हमारे लिए क्यों आवश्यक है? आज जब संबंध कांच की तरह दरक रहे हैं और धैर्य लुप्त होता जा रहा है, तब सीता जी का चरित्र हमें 'आंतरिक शक्ति' का मार्ग दिखाता है।
आज के दौर में जहाँ स्त्री की पहचान अक्सर बाहरी रूप-रंग तक सीमित कर दी जाती है, वहाँ सीता तत्व सिखाता है कि स्त्री की असली शक्ति उसकी 'वैचारिक सुदृढ़ता' और 'चरित्र की आभा' में है। अशोक वाटिका में अकेले रहकर भी रावण जैसी वैश्विक शक्ति को चुनौती देना यह दर्शाता है कि यदि कोई अपने सत्य पर अडिग है, तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत डिगा नहीं सकती। आज की युवा पीढ़ी, जो अवसाद और अकेलेपन से जूझ रही है, वह सीता जी के 'धैर्य तत्व' से आत्मबल सीख सकती है।
"आज समाज को केवल अधिकारों की बात करने वाली चेतना ही नहीं, बल्कि कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों को संजोने वाले उस सीता तत्व की परम आवश्यकता है, जो बिखरते हुए परिवारों और समाज को अपनी करुणा से जोड़ सके।"
सीता तत्व' कल भी सत्य था और आज भी सत्य है, अनिवार्य है। गोस्वामी जी ने सीता जी के माध्यम से हमें वह सूत्र दिया है, जिससे एक साधारण मनुष्य भी अपनी संकल्प शक्ति के बल पर 'असाधारण' बन सकता है।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि 'सीता तत्व' भारतीय संस्कृति का वह आधार स्तंभ है, जो हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा और शील को कैसे सुरक्षित रखा जाए। राम यदि 'आदर्श पुरुष' हैं, तो सीता 'आदर्श शक्ति' हैं। उनके बिना रामचरित अधूरा है।
आइए, इस गोष्ठी के माध्यम से हम उस पावन सीता तत्व को अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास करें।
धन्यवाद। जय सियाराम!