Sunday, 1 March 2026

ग़ज़ल- ये हम इक़रार करते हैं सरे बाज़ार करते हैं

 ये हम इक़रार करते हैं सरे बाज़ार करते हैं
तुम्ही से प्यार करते हैं तुम्ही से प्यार करते हैं

मुहब्बत है अगर इक आग का दरिया तो होने दो
हमारे साथ आओ आज दरिया पार करते हैं

बहुत चैन-ओ-सुकूं से रहना वहना हो गया साहब
चलो अब इश्क़ में ये ज़िंदगी बेज़ार करते हैं

जरूरत हो हमारी तुम तुम्हारे बिन नहीं जीवन
तुम्हारे साथ अपने स्वप्न हम साकार करते हैं 

चमन में खाद पानी पा जो बढ़ती जा रहीं प्रतिदिन
चलो उन जंगली बेलों का कुछ उपचार करते हैं

पवन क्या लोग दुनिया में कभी ये सोचते होंगे
किसी के साथ आख़िर क्यों बुरा व्यवहार करते हैं

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 4 January 2026

ग़ज़ल- जिसे समझे थे हम हासिल हमारा

जिसे समझे थे हम हासिल हमारा
वही इक दिन बना कातिल हमारा

हमारा क़त्ल और हम ही हैं मुज़रिम
बहुत शातिर है वो कातिल हमारा

हमारी बाम पर नज़रें टिकी हैं
कहाँ गुम है महे कामिल हमारा

ये आंखें खोजती हैं बस तुम्हे ही
तुम्हारी राह तकता दिल हमारा 

हमारी कश्तियाँ मझधार में हैं
न जाने है कहाँ साहिल हमारा

नहीं बाज़ीगरी लफ़्ज़ों की केवल
ग़ज़ल में दर्द भी शामिल हमारा

✍️ डॉ पवन मिश्र