Sunday, 30 August 2020

ग़ज़ल- अबकी दिसम्बर में


बजी शहनाई तो टूटा भरम अबकी दिसम्बर में

बहुत रोई मेरी आँखें सनम अबकी दिसम्बर में


बहुत बेरंग, बेहिस और ठंडे हो गए रिश्ते

ये कैसा है तिरा मुझ पे सितम अबकी दिसम्बर में


लड़कपन छोड़ कर संजीदगी से पेश आओ तुम

हुए चालीस के तुम भी सनम अब की दिसंबर में


रदीफ़ो काफ़िया मिलते नहीं बेज़ार हैं मिसरे

बताओ क्या लिखे मेरी कलम अबकी दिसम्बर में


कुहासे की घनी चादर उमीदों का है सूरज गुम

खुदाया कर जरा कुछ तो करम अबकी दिसम्बर में


असर मेरी मुहब्बत का हुआ कुछ इस कदर उन पर

मेरी ज़ानिब चले उनके कदम अबकी दिसम्बर में


गुजरते साल की टीसें भुलाकर ख़्वाब-ए-नौ देखें

चलो खाते हैं हम ये ही क़सम अबकी दिसम्बर में


                                        ✍️ डॉ पवन मिश्र


बेहिस= असंवेदनशील

ख़्वाब-ए-नौ= नये ख़्वाब, नव स्वप्न

Sunday, 2 August 2020

ग़ज़ल- इस चमन का हर नज़ारा और है


इस चमन का हर नज़ारा और है।
मुस्कुराना पर तुम्हारा और है।।

चांदनी शब का सितारा और है।
यार तेरा गोशवारा और है।।

मखमली तकिया भी रक्खा है मगर।
तेरे काँधे का सहारा और है।।

कुछ न बोले बस झुका दी है नज़र।
अबकी आँखों का इशारा और है।।

ज़िंदगी में जबसे आई हो मेरी।
सच कहूँ हर सू नज़ारा और है।।

ज़र ज़मीं रुतबा तुम्हीं रक्खो हुज़ूर।
हम दिवानों का असारा और है।।

टूटकर जिनके लिए बिखरा था मैं।
उनकी रातों का सितारा और है।।

तुम जो चाहो तो ठहर जाओ यहीं।
मेरी कश्ती का किनारा और है।

बंदिशों में घिर गये हो यार तुम।
रास्ता अब तो तुम्हारा और है।।

ख़ुद के भीतर देखता हूँ आजकल।
दीद में मेरी नज़ारा और है।।

                         ✍️ डॉ पवन मिश्र

गोशवारा= कान का कुंडल
हर सू= हर तरफ
असारा= बंधन

Sunday, 19 July 2020

ग़ज़ल- दर्द-ओ-ग़म का ठौर-ठिकाना लगता है


दर्द-ओ-ग़म का ठौर-ठिकाना लगता है।
दिल का ज़ख्मों से याराना लगता है।।

जो भी मिलता है बेगाना लगता है।
आईना जाना-पहचाना लगता है।।

नजरें तो पल भर में मिलती हैं लेकिन।
कहते कहते एक जमाना लगता है।।

मेरे जीवन में तेरा होना हमदम।
सच बोलूं तो इक अफ़साना लगता है।।

हर दस्तक इक हूक उठाती है दिल में।
दरवाजे पर दोस्त पुराना लगता है।।

मुस्कानों में दर्द छुपाते हो तुम भी।
तेरा मेरा एक घराना लगता है।।

                         ✍️ डॉ पवन मिश्र

Saturday, 18 July 2020

गीत- हम शब्दों के जादूगर हैं


हम शब्दों के जादूगर हैं, जादू करने आये हैं।
निष्ठुर हिय हित प्रेम पुष्प की, पौध संग में लाये हैं।।
हम शब्दों के जादूगर हैं, जादू करने आये हैं।।

पलकों की सूखी कोरों को हम चाहें तो नम कर दें।
शब्दों के मरहम से मन की पीड़ाओं को कम कर दें।।
तपते मरुथल पर हमने रिमझिम सावन बरसाये हैं।
हम शब्दों के जादूगर हैं, जादू करने आये हैं।१।

छलक पड़े आँसू तो उनको पल भर में मोती कर दें।
जीवन का नैराश्य मिटाकर आशाओं से हम भर दें।।
अँधियारे से लड़ने देखो कितने जुगनू लाये हैं।
हम शब्दों के जादूगर हैं, जादू करने आये हैं।२।

भौरों का गुंजार सुनाया कांटो का प्रतिकार किया।
एकाकी विरहन को हमने शब्दों का संसार दिया।।
हमने ही तो गीत मिलन के इन कण्ठों से गाये हैं।
हम शब्दों के जादूगर हैं, जादू करने आये हैं।३।
 
                                       ✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 28 June 2020

ग़ज़ल- मैं वंचित की बात करूंगा


महबूबा पर गीत लिखो तुम चाहे चांद सितारों पर।
मैं वंचित की बात करूंगा, लिक्खूंगा सरकारों पर।।

लोकतंत्र का भार टिका है झूठे और मक्कारों पर।
मंडी में बिक जाने वाले रँगे-पुते अखबारों पर।।

नेताओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले।
बोलो तुमने कितनी बारी सर फोड़ा दीवारों पर??

कल तक गाली देते थे जो पानी पी पी वेदों को।
वेदशक्ति अब बेच रहे हैं नजर टिकी बाजारों पर।।

आपस में कर लीं गलबहियां देखो सारे चोरों ने।
जिम्मेदारी अब ज्यादा है घर के चौकीदारों पर।।

सागर की नादां लहरों को शायद अब ये भान नहीं।
मझधारों ने दम तोड़ा है लकड़ी की पतवारों पर।।

बगिया में सुंदर फूलों हित नियम बदलने ही होंगे।
कब तक जाया होगी मिहनत केवल खर-पतवारों पर।।

राहे इश्क़ बहुत पेंचीदा, हर पग मुश्किल है लेकिन।
आओ थोड़ा चलकर देखें दोधारी तलवारों पर।।

✍️ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 4 June 2020

ग़ज़ल- ख्वाहिशों में कैद है


ख्वाहिशों में कैद है वो बेड़ियों में कैद है।
आदमी खुद की बनाई उलझनों में कैद है।।

राह की मुश्किल का हल तो हौसलों में कैद है।
और मंज़िल का पता तो कोशिशों में कैद है।।

मुन्तज़िर चातक झुलसता तिश्नगी की आग में।
और चातक की मुहब्बत सीपियों में कैद है।।

शह्र में मजदूर नें चादर जुटा ली है मगर।
गांव में होरी अभी भी मुश्किलों में कैद है।।

लोकशाही में सभी के अपने-अपने झुंड हैं।
सुब्ह का अख़बार भी पूर्वाग्रहों में कैद है।।

सिगरटों का है धुँआ और शोर ढपली का बहुत।
क्रांति का नवरूप है ये तख्तियों में कैद है।

गीत गज़लो छंद की रसधार अब कैसे बहे?
मंच पर साहित्य ही जब चुटकुलों में कैद है।।

                                   ✍️ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 14 May 2020

ताटंक छंद


कुंठा है या दोष उम्र का, या मदिरा की माया है।
राष्ट्रवाद की परिभाषा जो, अब तक समझ न पाया है।
सौ करोड़ इंसानों को पशु, आखिर क्यों बतलाया है।
दृष्टिदोष है या शैतानी, सिर पर कोई साया है।।

                                       ✍ डॉ पवन मिश्र