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Tuesday, 18 April 2017

मदिरा सवैया छन्द- रूपवती सखि प्राणप्रिये


रूपवती सखि प्राणप्रिये,
निज रूप अनूप दिखाय रही।

ओंठन से छलका मदिरा,
हिय को हर बार रिझाय रही।

बैठि सरोवर तीर प्रिये,
बस नैनन बान चलाय रही।

नैन मिले जब नैनन से,
तब लाजन क्यूँ सकुचाय रही।

                 ✍ डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 7 भगण (२११×७)+१ गुरू, सामान्यतः 10,12 वर्णों पर यति।

Tuesday, 5 January 2016

मदिरा सवैया- दूर गए मनमोहन तो


दूर गए मनमोहन तो, अब नैनन चैन कहाँ रहिये।
पीर बसी हिय गोपिन के, अब कौन उपाय प्रभो कहिये।।
नाथ अनाथ बनाय चले, कर जोरि कहे हमरी सुनिये।
भक्त करें बिनती तुमसे, अब तो बृज धाम चले चलिये।।

आकुल व्याकुल लोग सभी, खग कूजत ना अब कानन में।
रोअत आँखिन, धूमिल से तन, कान्ति नहीं अब आनन में।।
खार हुआ जमुना जल भी, बहु पीर भरी दुखिया जन में।
हे चितचोर हृदेश सुनो, अब धीर भरो सबके मन में।।

                                           - डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 7 भगण (२११×७)+१ गुरू, सामान्यतः 10,12 वर्णों पर यति।