Sunday, 10 March 2019

ग़ज़ल- ज़ुबां कुछ भी नही कहती मगर वो जान लेते हैं



ज़ुबां कुछ भी नही कहती मगर वो जान लेते हैं।
हमारे दिल की बेताबी को वो पहचान लेते हैं।।

बताओ किस तरह उनकी मुहब्बत का करूँ चर्चा।
मुझे ही प्यार करते हैं मेरी ही जान लेते हैं।।

अजब दुनिया मुहब्बत की अजब दस्तूर हैं इसके।
दिवाने दिल मुहब्बत को खुदा ही मान लेते हैं।।

जरा सी आग दिखलाकर डराओगे हमें कैसे ?
निगल जाते हैं सूरज भी अगर हम ठान लेते हैं।।

दगा क्या है वफ़ा क्या है उसी ने तो बताया है।
हम अपनी पीठ पर ख़ंजर का ये एहसान लेते हैं।।
                                     
                                   ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 3 February 2019

ग़ज़ल- कज़ा से चंद सांसें मांगती है



कज़ा से चंद सांसें मांगती है।
अजब से मोड़ पर ये जिंदगी है।।

खुदा हर शय के भीतर है अगर तो।
भटकता दर ब दर क्यूँ आदमी है।।

फ़रिश्ता चढ़ गया सूली पे हँसकर।
सदाकत की उसे कीमत मिली है।।

ख़ुदा रखना सलामत बागबां को।
गुलों ने आज ये फरियाद की है।।

अलग आदाब हैं महफ़िल में तेरी।
मुझे उलझन सी अब होने लगी है।।

ये खंज़र पीठ में पैवस्त है जो।
किसी अपने की ही साजिश हुई है।।

                   ✍ *डॉ पवन मिश्र*

सदाकत= सच्चाई
आदाब= तौर-तरीके

ग़ज़ल- मेरे कमरे में भी इक चांदनी है



तेरे दीदार की लत हो गई है।
नहीं बुझती ये कैसी तिश्नगी है।।

उजालों से नहाता आजकल हूँ।
मेरे कमरे में भी इक चाँदनी है।।

तुम्ही तुम बस नजर आते हो मुझको।
खुदाया कैसी ये जादूगरी है।।

बहुत दुश्वार है राहे मुहब्बत।
मगर ये आशिकी जिद पे अड़ी है।।

नही दिखती कोई सूरत शिफ़ा की।
खुदा ये आशिकी जब से हुई है।।

किसी दीवाने का कमरा है शायद।
यहां की ख़ामुशी भी चीखती है।।

मुहब्बत ने यही बख़्शा पवन को।
तुम्हारी याद है और शाइरी है।।

              ✍ *डॉ पवन मिश्र*

शिफ़ा= रोगमुक्ति

Monday, 21 January 2019

दोहे- अवसरवादी राजनैतिक गठजोड़ के संदर्भ में



सत्ता की ही भूख है, सत्ता की ही प्यास।
कुत्ते सब जुटने लगे, हड्डी की ले आस।१।

मौसेरे भाई मिले, होने लगे करार।
हुवाँ हुवाँ करने लगे, मिलकर सभी सियार।२।

चोरों की बारात में, बुआ भतीजा साथ।
अवसरवादी भेड़िये, मिला रहे हैं हाथ ।३।

राजनीति के मंच पर, नंगा करता नाच।
भीड़ बजाए तालियां, खुश हो अर्थ पिशाच।४।

दल से दल मिलने लगे, दलदल हुआ विराट।
सबने मिलकर खड़ी की, लोकतंत्र की खाट।५।

                                ✍ डॉ पवन मिश्र


Monday, 14 January 2019

दोहे- उत्तर प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य पर



बैंगन को भी मात दे, राजनीति का ढंग।
लाल मिला नीला मिला, बना बैंगनी रंग।१।

राजनीति के व्योम में, मियां मुलायम अस्त।
बुआ भतीजा मिल गए, चचा पड़ गए पस्त।२।

गलबहियां करने लगे, जो बैठे थे रूठ।
अवसरवादी स्वांग है, सच मानो या झूठ।३।

कल तक साथी हाथ के, हाथी पकड़े आज।
राजनीति के खेल में, गहरे होते राज।४।

कुत्सित इनकी सोच है, कुत्सित इनके कृत्य।
आगे आगे देखिये, होंगें कितने नृत्य।५।

                          ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 13 January 2019

ग़ज़ल- बारहा इश्क़ में करार न कर



बारहा इश्क़ में करार न कर।
ऐसी गलती तू बार बार न कर।।

लाखों गम इश्क़ के अलावा हैं।
ज़िन्दगी और बेक़रार न कर।।

है मुहब्बत अगर तो आएगा।
ऐ मेरे दिल तू इंतजार न कर।।

दिल मेरा रेशमी गलीचे सा।
इसको धोखे से तार तार न कर।।

हद जरूरी बहुत है रिश्तों में।
हद के आगे किसी से प्यार न कर।।

ज़ख्म आंसू सबक़ मुहब्बत के।
दर्द का ऐसा कारोबार न कर।।

माना कड़वा हूँ, नीम हूँ लेकिन।
मुझको ऐसे तो दरकिनार न कर।।

ख़ाक होकर ही ये पवन समझा।
हुस्न वालों पे जाँ निसार न कर।।

              ✍ *डॉ पवन मिश्र*

बारहा= अक्सर, बारम्बार

Sunday, 16 December 2018

ग़ज़ल- बन के जुगनू जगमगाना चाहिये



तीरगी में गर उजाला चाहिये।
बन के जुगनू जगमगाना चाहिये।।

गर ये चाहत है, किनारा चाहिये।
हौसलों को आजमाना चाहिये।।

पेचो ख़म माना बहुत हैं इश्क़ में।
फिर भी सबको इश्क़ होना चाहिये।।

जब दीवारें बोलने घर की लगें।
दोस्तों को घर बुलाना चाहिये।।

दो कदम क्या, चार चल कर आऊंगा।
पर तुम्हे भी ये सलीका चाहिये।।

सख़्त हाथों से नही रिश्ते बनें।
ज़रकशी जैसा सलीका चाहिये।।

टूटकर वो भी मिलेगा धूल में।
ख़ार को भी ये समझना चाहिये।।

आज भी रोटी की ही जद्दोजहद ?
रहनुमा को डूब मरना चाहिये।।

गर्द जिनके जम गई किरदार पर।
आइना उनको दिखाना चाहिये।।

कब तलक यूँ शेर जोड़ोगे मियां।
अब ग़ज़ल में वज़्न आना चाहिये।।

                ✍ *डॉ पवन मिश्र*
तीरगी= अंधेरा
पेचो ख़म= कठिनाइयाँ
ज़रकशी= सोने-चांदी के तारों से होने वाला काम
ख़ार= काँटा