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Wednesday, 20 January 2016

दुर्मिल सवैया- मति में सबके बस स्वार्थ भरा


मति में सबके बस स्वार्थ भरा।
यह देश चला किस ओर अहो।।

कलियाँ खुद मालिन नोच रहा।
फिर कौन चुने अब कंट कहो।।

नत माथ यही विनती प्रभु जी।
तम की गहरी अब रात न हो।।

अब ज्ञान सरोवर रूप बना।
सबके हिय में करतार बहो।।

                 -डॉ पवन मिश्र

Thursday, 7 January 2016

दुर्मिल सवैया- छल दम्भ बढ़ा

   
छल दम्भ बढ़ा जग में इतना।
निज स्वार्थ बिना अब स्नेह नहीं।।

सब भाग रहे धन वैभव को।
परमारथ को अब देह नहीं।।

मनुपुत्र सभी मद चूर हुए।
मिलता अब कोय सनेह नहीं।।

हर अंतस डूब रहा तम में।
मनदीपक में अब नेह नहीं।।

             डॉ पवन मिश्र

शिल्प- आठ सगण (११२×8)




Tuesday, 15 December 2015

दुर्मिल सवैया- सुन कृष्ण पुकार यही तुमसे


सुन कृष्ण पुकार यही तुमसे।
इस जीवन के सब कष्ट हरो।।

पथ सूझ रहा न किसी जन को।
मन में सबके उजियार भरो।।

मति ह्रास भई जग में सबकी।
भव सागर से तुम पार करो।।

कर जोरि करूँ विनती तुमसे।
वसुदेव सुनो अब आन परो।।

              -डॉ पवन मिश्र

Friday, 11 December 2015

दुर्मिल सवैया- तुम जान सको यदि मान सको


तुम जान सको यदि मान सको।
अभिमान व्यथा सब व्यर्थ प्रिये।।

इक मन्त्र सुनो इस जीवन का।
दुःख को सुख को सम मान प्रिये।।

सब की सुनना मति से करना।
यह भान सदा रखना तु प्रिये।।

जग की यह रीति पुरातन है।
दुख रूदन को अब त्याग प्रिये।।

              -डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 112 मात्राओं की आठ आवृत्ति

Monday, 9 November 2015

दुर्मिल सवैया- हर बार हमी कहते तुमसे


हर बार हमी कहते तुमसे।
कुछ तो तुम भी दिन रात कहो।।

प्रिय मान सको कहना यदि तो।
निज अश्रु त्यजो अभिमान करो।।

यह जीवन प्रेम समर्पण है।
बस प्रीत क रीत निभाय चलो।।

इस जीवन का सपना तुम ही।
कवि मैं हमरी कविता तुम हो।।

               -डॉ पवन मिश्र

दुर्मिल सवैया-112 मात्राओं की आठ आवृत्ति

Thursday, 29 October 2015

दुर्मिल सवैया- हर बात खरी कहिये सबसे


हर बात खरी कहिये सबसे,
मन की गठरी हलकी रखिये।

सुख हो दुख हो क्षण भंगुर हैं,
हर प्रात यही जपते रहिये।।

सब आतुर हैं धन वैभव को,
यह भंगुर है खुद से कहिये।।

भव सागर से तरना गर हो,
हरि नाम जपा करते रहिये।।

                 - डॉ पवन मिश्र

दुर्मिल सवैया छंद- आठ सगण अर्थात् 112×8 मात्रा युक्त सममात्रिक छन्द

Tuesday, 22 September 2015

दुर्मिल सवैया- निज स्वार्थ तजो


निज स्वार्थ तजो यह ध्यान रहे।
यह धर्म सनातन भान रहे।।

इक सत्य यही बस अंतस में।
निज देश कला पर मान रहे।।

कटुता सबकी मिट जाय प्रभो
मनु हैं इसका अभिमान रहे।।

करबद्ध निवेदन है इतना।
यह भारत देश महान रहे।।

               -डॉ पवन मिश्र

दुर्मिल सवैया छंद- आठ सगण अर्थात् 112×8 मात्रा युक्त सममात्रिक छन्द