Sunday, 9 September 2018

ग़ज़ल- तीरगी को रोशनी दरकार है



वो ही चेहरा वो हँसी दरकार है।
तीरगी में रोशनी दरकार है।।

बन के नश्तर याद तेरी चुभ रही।
अब तो मुझको बस तेरी दरकार है।।

अनमनी सी ढो रही है जिस्म बस।
ज़िंदगी को मौत की दरकार है।।

कोख में ही मारते हो बेटियां।
और कहते हो खुशी दरकार है।।

आदमी को आदमी ही मान लें।
बस सियासत से यही दरकार है।।

ऐ ख़ुदा तेरा करम, जो बख़्श दे।
क्या छुपी तुमसे कोई दरकार है।।

कब तलक तुकबन्दियाँ होंगी पवन ?
अब तो तुझसे शाइरी दरकार है।।

                     *डॉ पवन मिश्र*

Thursday, 23 August 2018

गीत- हे अटल तुम्हे नमन


(पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को समर्पित गीत)

हे विमल तुम्हे नमन, हे सरल तुम्हे नमन।
युग प्रणेता कर्मयोगि, हे अटल तुम्हे नमन।।

दल कमल के प्राण तुम,
प्रदीप्त नव विहान तुम।
पोखरण के शौर्य हो,
भारती की शान तुम।
कुचक्र के प्रभाव में,
विश्व के दबाव में।
डिगे नहीं झुके नहीं, हे अचल तुम्हे नमन।
युग प्रणेता कर्मयोगि, हे अटल तुम्हे नमन।।

विघ्न थे विकट मगर,
तुम सदा रहे निडर।
कारगिल पहाड़ियों से,
गूंजता है स्वर प्रखर।
भले ही लक्ष्य दूर था,
शत्रु मद में चूर था।
मगर कदम रुके नहीं, हे प्रबल तुम्हे नमन।
युग प्रणेता कर्मयोगि, हे अटल तुम्हे नमन।।

                                डॉ पवन मिश्र

Saturday, 11 August 2018

ग़ज़ल- उनकी खुशबू को लिये महकी हवा कब आएगी



उनकी खुशबू को लिये महकी हवा कब आएगी।
टूट कर बरसे जो वो काली घटा कब आएगी।।

दर्द हद से बढ़ रहा इसकी दवा कब आएगी।
ज़िंदगी है पूछती आख़िर क़ज़ा कब आएगी।।

आहटों में ढूंढता आवाजे-पा उनकी ही मैं।
ऐ खुदा दर पे मेरे उनकी सदा कब आएगी।।

सुब्ह से हूँ मयकदे में जाम सारे बे-नशा।
शाम ढलने को है साकी तू बता कब आएगी।।

शर्त हर मंजूर है दीदार को उनके मगर।
देखिये अब इश्क़ में उनकी रज़ा कब आएगी।।

ज़िंदगी की जंग जारी आखिरी सांसों के सँग।
अब भी गर आई न तू तो फिर भला कब आएगी।।

लाश में भी ढूंढ लेते वो सियासत की वजह।
रहनुमा को ऐ ख़ुदा शर्मो हया कब आएगी।।

                              ✍ डॉ पवन मिश्र
आवाजे- पा= पैर की आवाज


Sunday, 29 July 2018

बालगीत- काले बादल


काले बादल काले बादल,
मेरी छत पर आओ ना।
गर्मी बढ़ती जाती देखो,
पानी अब बरसाओ ना।

धूप बरसती आसमान से,
झुलसाती है हम सबको।
देखो गर्म हवा भी आकर,
तड़पाती है हम सबको।।
सुनो जुलाई बीत रही है,
अब तो तुम आ जाओ ना।
काले बादल काले बादल,
मेरी छत पर आओ ना।।

फाड़ फाड़ के कागज रक्खे,
हमने नाव बनाने को।
लेकिन नाली सड़कें सूखीं,
जाएं कहाँ चलाने को।।
आखिर क्यों तुम रूठ गए,
इतना तो बतलाओ ना।
काले बादल काले बादल,
मेरी छत पर आओ ना।।
      
✍ अक्षिता मिश्र व डॉ पवन मिश्र

अपनी बात- बड़ी बिटिया (अक्षिता मिश्र) कल कहने लगी कि पापा स्कूल मैगज़ीन के लिये कुछ लिखना है। बस फिर क्या बिटिया बताती गई, पापा लिखते गए। देखते ही देखते 10 मिनट में मेरी काव्य सृजन यात्रा का प्रथम बालगीत सम्मुख था। 

Tuesday, 12 June 2018

ताटंक छन्द - कविता और मंच



कलमकार कुछ मंच सजाते, फूहड़ सतही बातों से।
झुलस रही है कविता जिनके, तेजाबी आघातों से।।
बनी द्रौपदी सिसक रही है, मंचो पर हिंदी भाषा।
लील रही साहित्य-सृजन को, धन वैभव की प्रत्याशा।।

पैसों की खन खन ध्वनि सुनकर, काव्य गढ़े नित जाते हैं।
और विदूषक मंचों पर चढ़, लोगों को भरमाते हैं।।
भावों की फूहड़ता से जब, शब्द सजाये जाते हैं।
तब रचनाओं की लाशों पर, मंच बनाये जाते हैं।।

कैसे कह दूँ दुर्योधन ही, चीरहरण का दोषी था।
मौन साध जो भी बैठा था, उस कुकृत्य का पोषी था।।
पन्त निराला जयशंकर हो, तुम्ही सुभद्रा की थाती।
मान घटेगा हिंदी का तो, कैसे फूलेगी छाती।।

मैं दिनकर के पथ का चारण, अपना धर्म निभाऊंगा।
शपथ मुझे हिंदी भाषा की, इसका मान बढ़ाऊंगा।।
मां वाणी का सेवक हूँ मैं, कलम बेच ना पाऊँगा।
भूखा मर जाऊंगा लेकिन, भाँड़ नहीं बन जाऊँगा।।

                                       डॉ पवन मिश्र

Sunday, 10 June 2018

ग़ज़ल- कई दिन से



मैं हूँ खुद से ख़फ़ा कई दिन से।
सिलसिला चल रहा कई दिन से।।

मेरे कमरे में आइना था इक।
वो भी है लापता कई दिन से।।

दिल ये बेजार इश्क़ से है अब।
सिसकियाँ ले रहा कई दिन से।।

कुछ गलतफहमियां हुईं शायद।
बढ़ रहा फ़ासला कई दिन से।।

ज़ह्र, नफरत, घुटन लिए सँग में।
चल रही है हवा कई दिन से।।

मुन्तज़िर है पवन चले आओ।
तक रहा रास्ता कई दिन से।।

          ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 6 June 2018

गीत- पूर्णिमा की रात



पूर्णिमा की रात देखो आ गई।
चांदनी चहुँ ओर नभ पर छा गई।।

रोज अपने हौसलों से कुछ कदम,
चांदनी को साथ लेकर वो चला।
तम की गहरी कालिमा को लील कर,
वो उजाले के लिये खुद ही जला।।
बिन थके चलता रहा लड़ता रहा,
चांद की यह बात मुझको भा गई।
पूर्णिमा की रात देखो आ गई।।

लग रहा मानों जलधि भी व्यग्र है,
ज्वार बन लहरें यही बतला रहीं।
नभ समेटे अपनी बांहों में यहां,
रश्मियां तारों की भी मुस्का रहीं।।
कवि अकिंचन को भी देखो चांदनी,
रूप नव इक काव्य का दिखला गई।
पूर्णिमा की रात देखो आ गई,
चांदनी चहुँ ओर नभ पर छा गई।।
                  
                 डॉ पवन मिश्र