Monday, 8 May 2023

ग़ज़ल- अभी मंजिल कहाँ ? रस्ता बहुत है

अभी मंज़िल कहाँ ? रस्ता बहुत है
अभी आगाज़ है, चलना बहुत है

फ़कत पतवार थामा है अभी तो
थपेड़ों से अभी लड़ना बहुत है

खुदी पर है नहीं जिसको भरोसा
मुसीबत देखकर रोता बहुत है

समझ पाया नहीं ऐ इश्क़ तुझको
तेरा किरदार पेचीदा बहुत है

निभेगा किस तरह बोलो ये रिश्ता
हमारे दरमियां पर्दा बहुत है

चलो झूठा दिलासा ही सही पर
कभी तो बोल दो चाहा बहुत है

छुपा लेता हूँ अश्कों को मगर सुन
तेरा जाना मुझे चुभता बहुत है

सफ़र के अंत में जाना पवन ने
मिला कुछ भी नहीं खोया बहुत है

                  ✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 23 April 2023

गीत- गर्मी और किसान

गीत-


चैत्र माह बीता है लेकिन मानो जैसे जेठ आ गया

बदरा दुबके डर के मारे प्रखर सूर्य चहुँओर छा गया

खेत किनारे बैठा हरिया, जाने क्या-क्या सोच रहा है

बीच-बीच में गमछे से वो बहा पसीना पोछ रहा है।

खेत किनारे बैठा हरिया, जाने क्या-क्या सोच रहा है।।


भीषण गर्मी तन झुलसाए दुपहरिया भी है धूप भरी

सूर्य किरण से ताप ग्रहण कर गेहूं बाली हुई सुनहरी

तन जलता है हरिया का पर मन हर्षित है खेत देखकर

फिर भी कुछ तो है ऐसा जो भीतर-भीतर नोंच रहा है

खेत किनारे बैठा हरिया, जाने क्या-क्या सोच रहा है


अम्बर से है आग बरसती सूख रहे सब ताल-तलैया

पशु-पक्षी भी व्याकुल फिरते ठौर कहीं ना मिलता भैया

लेकिन हरिया कैसे कह दे ? हे ईश्वर बरसाओ पानी

पकी फसल तैयार खड़ी वह मन ही मन संकोच रहा है

खेत किनारे बैठा हरिया, जाने क्या-क्या सोच रहा है


लेकिन आखिर इतनी गर्मी ? किसकी गलती, कौन बताए ?

गांवों में भी शहर घुस गया कंकरीट के जंगल छाए

मौसम के ताने-बाने को आखिर किसने क्षय कर डाला ?

ढेरों ऐसे प्रश्न लिये वो उत्तर खुद में खोज रहा है

खेत किनारे बैठा हरिया, जाने क्या-क्या सोच रहा है


तभी अचानक दूर गगन में काले काले घन गहराए 

हरिया का हिय कांप उठा फिर बारिश आयी ओले आए

पशु पक्षी तो नाच रहे पर कलप रही है फसल बिचारी

भीतर तक वो टूट गया अब बहते आंसू पोछ रहा है

खेत किनारे बैठा हरिया, जाने क्या-क्या सोच रहा है।।

बीच-बीच में गमछे से अब बहते आंसू पोछ रहा है।।


                                      ✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 12 February 2023

ग़ज़ल- विचारों को युवा गर जाफ़रानी कर नहीं पाया

विचारों को युवा गर जाफ़रानी कर नहीं पाया

तो समझो फिर जवानी को जवानी कर नहीं पाया


वो इक दफ़्तर का बाबू चाय-पानी कर नहीं पाया

अधूरी फाइलों पर मेहरबानी कर नहीं पाया


कई हल थे इशारों में जो कातिब ने किए दिन भर

वो फरियादी मगर कुछ तर्जुमानी कर नहीं पाया


खपा डाला बदन अपना, पसीने से बहुत सींचा

मगर मुफ़लिस बिचारा खेत धानी कर नहीं पाया


रदीफ़-ओ-काफ़िया-ओ-बह्र शायद जोड़ लेता हूँ

मगर लगता है अब तक शेर-ख़्वानी कर नहीं पाया


✍️ डॉ पवन मिश्र


जाफ़रानी= केसरिया

कातिब= लिपिक, क्लर्क

तर्जुमानी= अनुवाद

मुफ़लिस= गरीब

शेर-ख़्वानी= शेर कहना

ग़ज़ल- तुम्हारे नाम मैं अपनी जवानी कर नहीं पाया

तुम्हारे नाम मैं अपनी जवानी कर नहीं पाया

मैं मीरा की तरह खुद को दीवानी कर नहीं पाया


वो मेरी ख़ामुशी की तर्जुमानी कर नहीं पाया

बहुत मजबूर मैं भी था ज़बानी कर नहीं पाया


यही अफ़सोस मुझको उम्र भर होगा मेरी जानां

तुम्हारी राह में मैं गुल-फ़िशानी कर नहीं पाया


बड़ी खुशियां थीं दामन में मगर कुछ दिन ही बस ठहरीं

सलीके से मैं शायद मेज़बानी कर नहीं पाया


नये रिश्ते नई बातों में ही उलझा रहा केवल

वो मुझ सँग बैठकर बातें पुरानी कर नहीं पाया


कभी तो लौट कर आएगा वो फिर से पनाहों में

इसी उम्मीद से नक़्ल-ए-मकानी कर नहीं पाया


यही अफ़सोस मुझको उम्र भर होगा मेरी जानां

हमारे वाक़ये को मैं कहानी कर नहीं पाया


✍️ डॉ पवन मिश्र


तर्जुमानी= अनुवाद

गुल-फ़िशानी= फूल बिखराना

नक़्ल-ए-मकानी= कहीं और बस जाना/चले जाना


Monday, 23 January 2023

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिवस पर

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिवस पर (मनहरण घनाक्षरी)


मां भारती के पुत्र को, धैर्य के समुद्र को।

क्रांतिकारियों के आशुतोष को नमन है।

रण से जो भगा नहीं, क्षण भर डरा नहीं।

ऐसे सिंह शावक के, जोश को नमन है।

एक-एक जोड़कर, जिसने असंख्य किये।

जय हिन्द के उस, घोष को नमन है।

वीरगति पाने वाले, जग में छा जाने वाले।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को नमन है।।


✍️ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 17 January 2023

ग़ज़ल- जीना अब दुश्वार हुआ है

जीना अब दुश्वार हुआ है
सब कहते हैं प्यार हुआ है

शक-ओ-शुब्हा की बात नहीं अब
आंखों से इकरार हुआ है

उनके पैरों की दस्तक से
हर ज़र्रा गुलज़ार हुआ है

इश्क़, इबादत, नेकी अब तो
लोगों का व्यापार हुआ है

राजनीति के दाँव-पेंच से
लोकतंत्र लाचार हुआ है

शादी लायक छुटकी भी अब
होरी फिर लाचार हुआ है

     ✍️ डॉ पवन मिश्र

Friday, 13 January 2023

ग़ज़ल- आओ फिर से बात करें

 कब तक बैठें दोनों गुमसुम आओ फिर से बात करें

हो जाएं इक दूजे में गुम आओ फिर से बात करें


कोई और नहीं आएगा रिसते घावों को भरने

किसका रस्ता देखें हम तुम आओ फिर से बात करें


अँधियारे ने पांव पसारा राहें दिखती हैं काली

उन राहों में भर दें अंजुम आओ फिर से बात करें


खामोशी की चादर ओढ़े इक दूजे को देख रहे

कब तक झेलें यार तलातुम आओ फिर से बात करें


कितनी बातें होती थीं तब छोटी-छोटी रातों में

दुहरायें वो दौर-ए-तकल्लुम आओ फिर से बात करें


✍️ डॉ पवन मिश्र


अंजुम- सितारे

तलातुम- बेचैनी

दौर-ए-तकल्लुम- वार्तालाप का दौर