Saturday, 11 March 2017

दोहे- जोगीरा सा रा रा रा


इस होली में का कहें, जियरा का हम हाल।
भगवा हुइगा देश सब, क्या नीला क्या लाल।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

नमो नमो मनई रटें, अईस नाम में दम।
पूरा यू पी हिल गवा, मानो फटा हो बम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

चचा भतीजा सब सफा, बुआ खड़ी पगुराय।
का से का ई हुइ गवा, कछू समझ नहि आय।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

पप्पू जीव अजीब है, ओकिर किस्मत फूट।
टीपू का लई डारिस, गयी सायकिल टूट।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

हाथी गोबर कर दिहिस, हैण्डपम्प भी जाम।
कहे भैंसिया देख लो, ईवीयम के काम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

तपती दुपहरिया मिटी, आयी महकी शाम।
सब बोलो दिल खोल के, जय जय जय श्री राम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

                                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 8 March 2017

ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ


नवजीवन की आशा हूँ।
दीप शिखा सा जलता हूँ।।

रक्त स्वेद सम्मिश्रण से।
लक्ष्य सुहाने गढ़ता हूँ।।

अंतस ज्योति जली जबसे।
अपनी धुन में रहता हूँ।।

जीवन के दुर्गम पथ पर।
अनथक चलता रहता हूँ।।

प्रभु पे है विश्वास अटल।
बाधाओं से लड़ता हूँ।।

घोर तिमिर के मस्तक पर।
अरुणोदय की आभा हूँ।।

भावों का सम्प्रेषण मैं।
शंखनाद हूँ कविता हूँ।।

      ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 5 March 2017

ग़ज़ल- किससे कहूँ ?


दर्द हद से बढ़ रहा है, आँख नम, किससे कहूँ ?
अपने ही जब ढा रहे, मुझ पे सितम, किससे कहूँ ?

आइना भी हो गया बेज़ार मुझसे अब यहाँ।
सुनने वाला कौन है मैं अपना ग़म किससे कहूँ ?*

चंद सिक्कों की चमक में ठूँठ जैसी हो गयी।
हे विधाता मौन जब कवि की कलम, किससे कहूँ ?

माना मंज़िल मुंतज़िर अब भी खड़ी है राह में।
छोड़ दें गर हौसला अपने कदम, किससे कहूँ ?

घोसलें तो मैं सजा दूँ फिर से सूनी शाख़ पे।
पर परिन्दे ही न माने तो सनम किससे कहूँ ?

देश का अभिमान थे, सम्मान थे जो रहनुमा।
उनके चमचे अब करें नाकों में दम, किससे कहूँ ?

अम्न लाने की थी जिम्मेदारियां जिनपे पवन।
वो सियासतदार ही जब बेरहम, किससे कहूँ ?

                                   ✍ डॉ पवन मिश्र

* समर कबीर साहब, उज्जैन का मिसरा

Monday, 27 February 2017

ताटंक छन्द- आजाद

तम की काली रात लीलने, जो बिजली सा कौंधा था।
दम्भी अंग्रेजों को जिसने, मरते दम तक रौंदा था।।
लेकिन वो भी समझ न पाया, घात लगाए था भेदी।
क्रांति यज्ञ में आखिर उसने, आहुति प्राणों की दे दी।१।

भारत माँ का लाल अनोखा, अपनी धुन का मस्ताना।
वह आजाद सिंह शावक वह, आजादी का दीवाना।।
नमन उसे है आज हृदय से, नत है सम्मुख ये माथा।
भारत की धरती सदियों तक, गायेगी उसकी गाथा।२।
                             
                                              ✍डॉ पवन मिश्र
  

Sunday, 26 February 2017

ग़ज़ल- सिखा रहा चुनाव ये


मुफ़लिसों के चूल्हे भी जला रहा चुनाव ये।
बस्तियों में आग भी लगा रहा चुनाव ये।।

तिश्नगी में तख़्त के बदल रहे समीकरण।
दो ध्रुवों को देख लो मिला रहा चुनाव ये।।

अर्श वाले आ गये हैं वोट लेने फर्श पर।
गैरफ़ानी कुछ नहीं बता रहा चुनाव ये।।

मुन्कसिर वो हो गए जो चूर थे गुरूर में।
जाने क्या क्या और भी सिखा रहा चुनाव ये।।

अब गलेगी दाल यूँ न जातियों के नाम पर।
रहनुमा को आइना दिखा रहा चुनाव ये।।

                                   - डॉ पवन मिश्र

मुफ़लिस= गरीब          गैरफ़ानी= शाश्वत
मुन्कसिर= नम्र             रहनुमा= नेता

Saturday, 18 February 2017

ग़ज़ल- हमसे कितना प्यार करोगे


आँखों से ही वार करोगे।
या खुलकर इज़हार करोगे।।

अपने हुस्न के जलवों से तुम।
कितनों को बीमार करोगे।।

कोई तो हद, यार बता दो।
हमसे कितना प्यार करोगे।।

तरस रही है बगिया तुम बिन।
कब इसको गुलज़ार करोगे।।

स्वप्न अधूरे जो मेरे हैं।
तुम ही तो साकार करोगे।।

सारे शिक़वे यार भुला दो।
आख़िर कब तक रार करोगे।।

झूठे वादों के दम पर तुम।
कब तक ये व्यापार करोगे।।

            ✍ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 16 February 2017

मुक्तक- कहीं जीवन मरुस्थल सा


कहीं जीवन मरुस्थल सा, कहीं शबनम बरसती है,
कहीं प्रियतम की हैं बाहें, कहीं तन्हाई डसती है।
कहीं तो कृष्ण आकर रुक्मणी की मांग भर देता,
मगर तड़पे कहीं राधा, कहीं मीरा तरसती है।।