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Saturday, 30 January 2021

मुक्तक- जवानी

(शक्ति छंद आधारित मुक्तक)


अगर इंकलाबी कहानी नहीं,

लहू में तुम्हारे रवानी नहीं।

डराती अगर हो पराजय तुम्हें,

सुनो मित्र वो फिर जवानी नहीं।।


चलो यार माना बहुत खार हैं,

चमन जल रहा कोटि अंगार हैं।

मगर ये जवानी मिली किसलिए,

यही तो जवानी के श्रृंगार हैं।।


✍️ डॉ पवन मिश्र


Thursday, 1 October 2020

मुक्तक- हाथरस में घटी विभत्स घटना के सम्बंध में

 हाथरस में बालिका संग बलात्कार के बाद उसकी नृशंस हत्या और प्रशासन की भूमिका से उपजा मुक्तक...


बहुत उम्मीद थी तुमसे मगर क्या चल रहा साहेब ?

दिखावा है महज या फिर तुम्हें भी खल रहा साहेब ??

वहाँ जो रौशनी सी दिख रही है दूर खेतों में,

जरा तुम गौर से देखो वहाँ कुछ जल रहा साहेब।।

        

                                         ✍️ डॉ पवन मिश्र

                                     

          


Saturday, 13 July 2019

मुक्तक- राधा का प्रेम


कृष्ण का साथ रनिवास कुछ ना लिया,
द्वारिका के महल का न तिनका लिया।
मांग में लालिमा भी न ली कृष्ण से,
राधिका ने मगर कृष्ण को पा लिया।१।

त्याग की मूर्ति थी त्याग उसने किया,
प्रेम का सब हलाहल स्वयं पी लिया।
प्रेम पथ के पथिक तो बहुत हैं मगर,
प्रीति की रीति को राधिका ने जिया।२।

पावनी गंग है एक आम्नाय है,
राधिका प्रेम का एक पर्याय है।
ग्रन्थ माना वृहद है मगर राधिका,
कृष्ण लीला का स्वर्णिम अध्याय है।३।
(आम्नाय= पवित्र प्रथा/रीति)

विश्व को जीवनी सभ्यता दे गए,
प्रेम की इक अनूठी कथा दे गए।
विरह में अश्रु भी मुस्कुराने लगे,
राधिका-कृष्ण ऐसी प्रथा दे गए।४।

                           ✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 18 March 2018

जवानी- शक्ति छन्द आधारित मुक्तक


अगर इंकलाबी कहानी नहीं,
लहू में तुम्हारे रवानी नहीं।
डराती अगर हो पराजय तुम्हें,
सुनो मित्र वो फिर जवानी नहीं।१।


चलो यार माना बहुत ख़ार हैं,
चमन जल रहा कोटि अंगार हैं।
मगर ये जवानी मिली किसलिए,
तरुण के यही शुभ्र श्रृंगार हैं।२।

        ✍ डॉ पवन मिश्र

Friday, 26 January 2018

मुक्तक- वन्दे मातरम


प्राण है विहान है ये गान वन्दे मातरम,
मान है महान है ये गान वन्दे मातरम।
मातु भारती की पुण्य साधना का मंत्र ये,
आन बान शान है ये गान वन्दे मातरम।१।

भीरुता का दाह है ये गान वन्दे मातरम,
शौर्य का गवाह है ये गान वन्दे मातरम।
सुप्त देश भावना से जम चुकी शिराओं में,
रक्त का प्रवाह है ये गान वन्दे मातरम।२।

                              ✍ डॉ पवन मिश्र

Friday, 1 September 2017

मुक्तक


परशुराम की पुण्य धरा को वंदन है
हे वीर प्रसूता गाजीपुर अभिनन्दन है
सौ सौ बार लगा लूँ इसको माथे पर
अब्दुल हमीद की यह मिट्टी तो चंदन है

जाने कहाँ से वो मेरे करीब आ गया
लेकर हज़ार ख़्वाब वो हबीब आ गया
मंज़िल भी दिख रही थी राहे इश्क़ में मगर
कम्बख़्त बीच में मेरा नसीब आ गया

कली कमसिन को काँटों से बचा लाई,
वो मुझको हर अँधेरों से बचा लाई।
समंदर तो बहुत मगरूर था लेकिन,
मेरी माँ हर थपेड़ों से बचा लाई।।

✍डॉ पवन मिश्र

Thursday, 16 February 2017

मुक्तक- कहीं जीवन मरुस्थल सा


कहीं जीवन मरुस्थल सा, कहीं शबनम बरसती है,
कहीं प्रियतम की हैं बाहें, कहीं तन्हाई डसती है।
कहीं तो कृष्ण आकर रुक्मणी की मांग भर देता,
मगर तड़पे कहीं राधा, कहीं मीरा तरसती है।।

Tuesday, 26 April 2016

मुक्तक


कर लो कोशिश मगर याद मैं आऊंगा,
प्रीत की शबनमी बूँदें धर जाऊंगा।
चाहे कर लेना तुम लाख इन्कार पर,
आँख से बह के लब तक पहुँच जाऊँगा।।

इस जहाँ से भी आगे नगर एक है,
मिलना ही है हमें जब डगर एक है।
इश्क की राह में उस जगह आ गए,
ज़िस्म हैं दो सही जाँ मगर एक है।।

प्रीत के रीत की वाहिका तुम बनो,
पुन्य ये यज्ञ है साधिका तुम बनो।
डोर विश्वास की न ये टूटे कभी,
कृष्ण बन जाऊँगा राधिका तुम बनो।।


             ✍डॉ पवन मिश्र

Saturday, 20 February 2016

मुक्तक


इस हृदय ने वरण कर लिया है तुम्हे।
श्वास विश्वास सब दे दिया है तुम्हे।
प्रीत पे मेरी बस तुम भरोसा रखो,
कृष्ण की राधिका सा जिया है तुम्हे।१।

शांत एकांत वन में ना विचरण करो।
हे प्रिये हे सखे थोड़ा धीरज धरो।
प्रेम की रौशनी से छंटेगा धुँआ,
स्नेह का नेह जीवन में अब तुम भरो।२।

पुष्प आशाओं के कुछ महक जाने दो।
आज थोड़ा हमें तुम बहक जाने दो।
मैं हूँ चातक बनो स्वाति की बूंद तुम,
सूखे अधरों पे अमृत छलक जाने दो।३।

                        - डॉ पवन मिश्र






Tuesday, 15 December 2015

मुक्तक


वो मेरी है मैं उसका हूँ यही एहसास है दिल में।
वो हरपल साथ हो मेरे यही इक आस है दिल में।।
अभी हैं बंदिशे तुम पर जमाने के रिवाज़ों की।
क्षितिज के पार मिलना है यही विश्वास है दिल में।।

न तो तन्हाइयां डसती न ही अँगड़ाइयां रोती।
कभी आलम न ये आता अगर तुम पास में होती।।
सिमट जाता तेरे आगोश में लेकर मैं सारे गम।
मिटा के सारे गम मेरे नई खुशियों को तुम बोती।।

मैं तुमको याद करने के बहाने ढूँढ लेता हूँ।
पुराने एलबम को ही मैं अक्सर चूम लेता हूँ।।
गुजरता है शहर का डाकिया मेरी गली से जब ।
कोई पूछे या न पूछे मैं उसको पूछ लेता हूँ।।

मेरे जीवन की बगिया में फूलों सा महकना तुम।
घटा घनघोर जब छाये तो बिजुरी सा चमकना तुम।।
यही है कामना तुमसे मेरे प्रियतम मेरे हमदम।
मैं वँशी कृष्ण की लाऊँ तो राधा सा मचलना तुम।।

                                  -डॉ पवन मिश्र