Sunday, 2 December 2018

नवगीत- तुम जयघोष समझ बैठे



वेद ऋचाएं अपमानित कर,
कुल को शापित कर बैठे।
और सियारी हुआँ हुआँ को,
तुम जयघोष समझ बैठे।।
तुम जयघोष समझ बैठे।।

मेरा क्या मैं तो वैरागी,
हर दुख-सुख में, मैं प्रतिभागी।
धन-पद की भी चाह नहीं है,
नेह मिलन का मैं अनुरागी।
मैं अपनों सँग मस्त पड़ा था,
तुम बेहोश समझ बैठे।।
और सियारी हुआँ हुआँ को,
तुम जयघोष समझ बैठे।१।

माना हर मोती तुम लाये,
चाटुकार भी कुछ बुलवाये।
प्रेम तन्तु से हमने गूंथा,
तब मोती माला में आये।
मैं रिश्तों का गर्वित माथा,
तुम अफ़सोस समझ बैठे।।
और सियारी हुआँ हुआँ को,
तुम जयघोष समझ बैठे।२।

मन मन्दिर में तुम्हे बिठाकर,
तुम पर सारा नेह लुटाकर।
सोच रहा मैं आज अकिंचन,
क्या पाया है तुमको पाकर।
नकली नोटों के गठ्ठर को,
तुम अधिकोष समझ बैठे।
और सियारी हुआँ हुआँ को,
तुम जयघोष समझ बैठे।३।

चौसर तेरी प्यादे तेरे,
राहु केतु बन करते फेरे।
द्रोण, भीष्म औ विदुर मौन हैं,
पांडु पुत्र को कौरव घेरे।
शकुनी की चालें ना समझीं,
मेरा दोष समझ बैठे।
और सियारी हुआँ हुआँ को,
तुम जयघोष समझ बैठे।४।

डॉ पवन मिश्र

Sunday, 11 November 2018

ग़ज़ल- शाइरी कब तक



जमाने की रवायत में मेरी आवारगी कब तक।
ये फक्कड़पन रहे ,देखो रहे, ये शाइरी कब तक।।

तेरे दीदार को तरसी हैं आंखें रात भर मेरी।
मिलन की शबनमी बूँदें लिये तू आएगी कब तक।।

ज़मीं ज़र दे दिया फिर भी पड़ोसी वो नहीं सुधरा।
बहुत कमज़र्फ़ है देखो निभाये दुश्मनी कब तक।।

चुनावी साल में होते तमाशे ही तमाशे हैं।
चलेगी मुल्क में मेरे ख़ुदा ये मसखरी कब तक।।

दुशासन हँस रहा देखो, झपट कर थाम लो गर्दन।
कि कान्हा के भरोसे ही रहोगी द्रौपदी कब तक।।

जलाकर खुद को मैंने रौशनी देने की ठानी है।
कि अब है देखना आखिर रहेगी तीरगी कब तक।।

                                   ✍ *डॉ पवन मिश्र*

Saturday, 3 November 2018

कुण्डलिया- पीत पत्रकारिता



डाका, रेप, गिरहकटी, संसद का व्यभिचार।
इन सबसे ही आजकल, भरा रहे अख़बार।।
भरा रहे अखबार, दिखाए हमको दुनिया।
नहीं सुरक्षित आज, बिचारे मुन्ना-मुनिया।।
अखबारों का किन्तु, अर्थ ही असली आका।
कीमत ले हर बार, डालते सच पे डाका।१।

भारत के गणतंत्र के, ये हैं चौथे खम्भ।
लेकिन इनमें भर गया, जाने कैसा दम्भ।।
जाने कैसा दम्भ, समझते खुद को ज्ञानी।
अधजल गगरी लाय, छलकता जाए पानी।।
कहे पवन ये धूर्त, झूठ की लिखें इबारत।
तार तार सम्मान, ज़ख्म ढोता है भारत।२।

                               डॉ पवन मिश्र

Sunday, 9 September 2018

ग़ज़ल- तीरगी को रोशनी दरकार है



वो ही चेहरा वो हँसी दरकार है।
तीरगी में रोशनी दरकार है।।

बन के नश्तर याद तेरी चुभ रही।
अब तो मुझको बस तेरी दरकार है।।

अनमनी सी ढो रही है जिस्म बस।
ज़िंदगी को मौत की दरकार है।।

कोख में ही मारते हो बेटियां।
और कहते हो खुशी दरकार है।।

आदमी को आदमी ही मान लें।
बस सियासत से यही दरकार है।।

ऐ ख़ुदा तेरा करम, जो बख़्श दे।
क्या छुपी तुमसे कोई दरकार है।।

कब तलक तुकबन्दियाँ होंगी पवन ?
अब तो तुझसे शाइरी दरकार है।।

                     *डॉ पवन मिश्र*

Thursday, 23 August 2018

गीत- हे अटल तुम्हे नमन


(पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को समर्पित गीत)

हे विमल तुम्हे नमन, हे सरल तुम्हे नमन।
युग प्रणेता कर्मयोगि, हे अटल तुम्हे नमन।।

दल कमल के प्राण तुम,
प्रदीप्त नव विहान तुम।
पोखरण के शौर्य हो,
भारती की शान तुम।
कुचक्र के प्रभाव में,
विश्व के दबाव में।
डिगे नहीं झुके नहीं, हे अचल तुम्हे नमन।
युग प्रणेता कर्मयोगि, हे अटल तुम्हे नमन।।

विघ्न थे विकट मगर,
तुम सदा रहे निडर।
कारगिल पहाड़ियों से,
गूंजता है स्वर प्रखर।
भले ही लक्ष्य दूर था,
शत्रु मद में चूर था।
मगर कदम रुके नहीं, हे प्रबल तुम्हे नमन।
युग प्रणेता कर्मयोगि, हे अटल तुम्हे नमन।।

                                डॉ पवन मिश्र

Saturday, 11 August 2018

ग़ज़ल- उनकी खुशबू को लिये महकी हवा कब आएगी



उनकी खुशबू को लिये महकी हवा कब आएगी।
टूट कर बरसे जो वो काली घटा कब आएगी।।

दर्द हद से बढ़ रहा इसकी दवा कब आएगी।
ज़िंदगी है पूछती आख़िर क़ज़ा कब आएगी।।

आहटों में ढूंढता आवाजे-पा उनकी ही मैं।
ऐ खुदा दर पे मेरे उनकी सदा कब आएगी।।

सुब्ह से हूँ मयकदे में जाम सारे बे-नशा।
शाम ढलने को है साकी तू बता कब आएगी।।

शर्त हर मंजूर है दीदार को उनके मगर।
देखिये अब इश्क़ में उनकी रज़ा कब आएगी।।

ज़िंदगी की जंग जारी आखिरी सांसों के सँग।
अब भी गर आई न तू तो फिर भला कब आएगी।।

लाश में भी ढूंढ लेते वो सियासत की वजह।
रहनुमा को ऐ ख़ुदा शर्मो हया कब आएगी।।

                              ✍ डॉ पवन मिश्र
आवाजे- पा= पैर की आवाज


Sunday, 29 July 2018

बालगीत- काले बादल


काले बादल काले बादल,
मेरी छत पर आओ ना।
गर्मी बढ़ती जाती देखो,
पानी अब बरसाओ ना।

धूप बरसती आसमान से,
झुलसाती है हम सबको।
देखो गर्म हवा भी आकर,
तड़पाती है हम सबको।।
सुनो जुलाई बीत रही है,
अब तो तुम आ जाओ ना।
काले बादल काले बादल,
मेरी छत पर आओ ना।।

फाड़ फाड़ के कागज रक्खे,
हमने नाव बनाने को।
लेकिन नाली सड़कें सूखीं,
जाएं कहाँ चलाने को।।
आखिर क्यों तुम रूठ गए,
इतना तो बतलाओ ना।
काले बादल काले बादल,
मेरी छत पर आओ ना।।
      
✍ अक्षिता मिश्र व डॉ पवन मिश्र

अपनी बात- बड़ी बिटिया (अक्षिता मिश्र) कल कहने लगी कि पापा स्कूल मैगज़ीन के लिये कुछ लिखना है। बस फिर क्या बिटिया बताती गई, पापा लिखते गए। देखते ही देखते 10 मिनट में मेरी काव्य सृजन यात्रा का प्रथम बालगीत सम्मुख था।