Friday, 8 January 2021

ग़ज़ल- मंज़िल तक बस वो ही जाने वाले थे


मंजिल तक बस वो ही जाने वाले थे

जिन पैरों में मोटे-मोटे छाले थे


आसमान भी उसकी ख़ातिर छोटा था

उम्मीदों के पंछी जिसने पाले थे


संसद के गलियारों में जाकर देखा

उजले कपड़े वाले दिल के काले थे


कैसे रखते बात गरीबों के हक की?

मुँह पे उनके चांदी वाले ताले थे


लौट पड़े चुपचाप उन्हीं की जानिब सब

ज़ख्मों से जो हमने तीर निकाले थे


मौत ज़हर से ही तो मेरी होनी थी

आस्तीन में सांप बहुत से पाले थे


                    ✍️ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 5 January 2021

ग़ज़ल- अपने होठों पे प्यास रहने दो


अपने होठों पे प्यास रहने दो

मीठे दरिया की आस रहने दो


मेरे साकी को पास रहने दो

हाथ में इक गिलास रहने दो


दर्द के सब असास रहने दो

बस यहीं आस-पास रहने दो


कुछ तो ख़ौफ़-ओ-हिरास रहने दो

टूटे दिल को उदास रहने दो


बेमज़ा हर खुशी बिना उनके

अब मुझे ग़म-शनास रहने दो


क्यूं कसैला बना रहे रिश्ता

थोड़ी सी तो मिठास रहने दो


हर किसी से करो न जिक्र मेरा

ख़ास रिश्ते को ख़ास रहने दो


बदहवासी में जी रहा हूँ मैं

उनको भी बे-हवास रहने दो


तीरगी से छिड़ी है जंग मेरी

हर दिया पास पास रहने दो


             ✍️ डॉ पवन मिश्र

असास= सामान

हिरास= निराशा

ग़म-शनास= दुःख को जानने वाला

बे-हवास= चेतना शून्य

तीरगी= अंधकार

Saturday, 21 November 2020

ग़ज़ल- ये नहीं के हम ही सकुचाये बहुत

 

ये नहीं के हम ही सकुचाये बहुत

वो भी हमको देख शरमाये बहुत


थम गए लब रू-ब-रू जब वो मिले

बात फिर नजरों ने की हाए बहुत


आरिज़-ओ-लब तक जब आये अश्क़ तो

उस घड़ी फिर याद तुम आये बहुत


हिचकियों ने मानों मरहम दे दिया

दर्द भूले ज़ख़्म, मुस्काये बहुत


ज़िंदगी भर ख़ार ही ढोये मगर

फूल मेरी कब्र पे आये बहुत


जब भी उसने साजिशन जुमले गढ़े

लोग उसकी बातों में आये बहुत


काफ़िले में यूँ तो थे साथी कई

रास लेकिन तुम हमें आये बहुत


                 ✍️ डॉ पवन मिश्र

Monday, 5 October 2020

ग़ज़ल- चंदन जैसे शीतल हो क्या


चंदन जैसे शीतल हो क्या
या पावन गंगाजल हो क्या

कब तक छाँव रखोगे मुझपर
मेरी माँ का आँचल हो क्या

नगर-नगर फिरते रहते हो
आवारा इक बादल हो क्या

प्रेम जिसे कहती है दुनिया
तुम भी उससे घायल हो क्या

दुनिया से टकराओगे तुम?
मेरे जैसे पागल हो क्या??

सांसों को महका जाते हो
पुरवाई हो? संदल हो क्या??

             ✍️ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 1 October 2020

मुक्तक- हाथरस में घटी विभत्स घटना के सम्बंध में

 हाथरस में बालिका संग बलात्कार के बाद उसकी नृशंस हत्या और प्रशासन की भूमिका से उपजा मुक्तक...


बहुत उम्मीद थी तुमसे मगर क्या चल रहा साहेब ?

दिखावा है महज या फिर तुम्हें भी खल रहा साहेब ??

वहाँ जो रौशनी सी दिख रही है दूर खेतों में,

जरा तुम गौर से देखो वहाँ कुछ जल रहा साहेब।।

        

                                         ✍️ डॉ पवन मिश्र

                                     

          


Tuesday, 8 September 2020

ग़ज़ल- तेरा चहरा कमाल है साक़ी

 

तेरा चहरा कमाल है साक़ी

दूधिया इक हिलाल है साक़ी


एक तुझसे सवाल है साक़ी

दिल में कैसा मलाल है साक़ी


गर नशे का सबब ये मय है तो

फिर तिरा क्या कमाल है साक़ी


है सभी को ख़याल-ए-मैनोशी

मुझको तेरा ख़याल है साक़ी


चांद तारे चराग और जुगनू

सबमें तेरा जमाल है साक़ी


अपने दिल की कहूँ तुझे मैं क्या

तेरे जैसा ही हाल है साक़ी


रोज इक दर्द है नया मिलता

दर्द का ही ये साल है साक़ी


अब तो आकर सुकून दे जाओ

मेरा जीना मुहाल है साक़ी


                ✍️ डॉ पवन मिश्र


हिलाल= चांद

जमाल= खूबसूरती

ख़याल-ए-मैनोशी= शराब पीने का ख़याल


Sunday, 6 September 2020

ग़ज़ल- ढल गया जब शबाब से पानी


ढल गया जब शबाब से पानी

क्यूँ बहा तब नकाब से पानी


वक्त रहते अगर सँभल जाते

फिर न ढलता गुराब से पानी


इक छलावा है इश्क़ की दुनिया

कौन लाया सराब से पानी ??


तेरी आँखों में क्यूँ छलक आया?

आज मेरे जवाब से पानी


ये जो मोती रुके हैं पलकों पे

क्यूं है तेरे हिसाब से पानी?


उसकी रहमत पे शक नहीं करना

सबको देता हिसाब से पानी 


उसकी ग़ज़लों में कौन शामिल है?

बह रहा क्यूँ किताब से पानी 


ख़ार के साथ की सजा है ये

रिस रहा है गुलाब से पानी 


कोशिशें बन्द होंगी तब मेरी

जब मिलेगा तुराब से पानी


उसका आना पवन लगे है यूँ

जैसे बरसे सहाब से पानी


             ✍️ डॉ पवन मिश्र


गुराब= मान-सम्मान

सराब= मृगतृष्णा

तुराब= जमीन

सहाब= बादल