Saturday, 7 September 2019

ग़ज़ल- शेर उनकी याद में हम वस्ल के लिखते रहे



शेर उनकी याद में हम वस्ल के लिखते रहे।
वो मगर बस फासलों पर फासले लिखते रहे।।

वो गए और हिचकियाँ भी आजकल आती नहीं।
एक हम हैं गीत बस उनके लिए लिखते रहे।।

नींद सबकी ले उड़ा वो आख़री हिचकी के सँग।
चैन से वो सो गया हम मरसिए लिखते रहे।।

भीड़ में चर्चा रही, तूफ़ान की, सैलाब की।
हम तो केवल कश्तियों के हौसले लिखते रहे।।

मंज़िले उन कोशिशों को ही अता होती यहां।
हौसलों से जो सफ़र के कायदे लिखते रहे।।

जिंदगी के फ़लसफ़े चल सीख लें उनसे पवन।
अश्क़ आंखों में छिपा जो कहकहे लिखते रहे।।

                              ✍ डॉ पवन मिश्र
वस्ल= मिलन
मरसिए= शोकगीत

Sunday, 14 July 2019

ग़ज़ल- इक पतंगे ने खुदकुशी कर ली


इक पतंगे ने खुदकुशी कर ली।
शम्अ से उसने आशिकी कर ली।।

उनकी तस्वीर को रहल पे रख।
हमने उनकी ही बन्दगी कर ली।।

उसको खुद में समा लिया मैंने।
रूह तक मैंने रौशनी कर ली।।

बस यही एक ज़ुर्म कर बैठा।
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली**।।

हमको मय की न ख्वाहिशें साक़ी।
तेरी आँखों से मयकशी कर ली।।

रौशनी किसके दर पे जाए अब।
जब चरागों ने तीरगी कर ली।।

जीस्त ने फ़लसफ़े सिखाये जो।
हमने उनसे ही शाइरी कर ली।।

            ✍ डॉ पवन मिश्र

रहल- लकड़ी का एक स्टैंड जिसपर धर्मग्रंथ रखे जाते हैं।

**मिसरा बशीर बद्र साहब का है

Saturday, 13 July 2019

मुक्तक- राधा का प्रेम


कृष्ण का साथ रनिवास कुछ ना लिया,
द्वारिका के महल का न तिनका लिया।
मांग में लालिमा भी न ली कृष्ण से,
राधिका ने मगर कृष्ण को पा लिया।१।

त्याग की मूर्ति थी त्याग उसने किया,
प्रेम का सब हलाहल स्वयं पी लिया।
प्रेम पथ के पथिक तो बहुत हैं मगर,
प्रीति की रीति को राधिका ने जिया।२।

पावनी गंग है एक आम्नाय है,
राधिका प्रेम का एक पर्याय है।
ग्रन्थ माना वृहद है मगर राधिका,
कृष्ण लीला का स्वर्णिम अध्याय है।३।
(आम्नाय= पवित्र प्रथा/रीति)

विश्व को जीवनी सभ्यता दे गए,
प्रेम की इक अनूठी कथा दे गए।
विरह में अश्रु भी मुस्कुराने लगे,
राधिका-कृष्ण ऐसी प्रथा दे गए।४।

                           ✍️ डॉ पवन मिश्र

Monday, 10 June 2019

लावणी छंद- गुड़िया (अलीगढ़ की घटना पर आधारित)

(अलीगढ़ के टप्पल से 30 मई 2019 को तीन वर्ष की बच्ची के अपहरण बाद हत्या और शरीर के क्षत विक्षत किये जाने की हृदयविदारक घटना के संदर्भ में)

तीन वर्ष की प्यारी गुड़िया, ठुमक ठुमक कर चलती थी।
मम्मी पापा की आंखों में, प्रखर ज्योति सी जलती थी।।
घर आंगन महकाती थी वो, नाजों से वो पलती थी।
लेकिन तीन वर्ष की गुड़िया, शैतानों को खलती थी।१।

नन्ही बुलबुल फुदक रही थी, आंगन में गलियारे में।
क्रूर बाज ने घात लगाकर, खींच लिया अँधियारे में।।
लील गई कड़वी निर्धनता, मीठी शक्कर की पुड़िया।
दस हजार की ख़ातिर देखो, स्वाहा लाखों की गुड़िया।२।

फूलों सी वो नाजुक बिटिया, कूड़ेघर में पड़ी रही।
वहशी हिंसक शैतानों के, साथ अंत तक अड़ी रही।।
और दरिंदे ने फिर उसको, गला घोंट कर मार दिया।
जाहिल ज़ाहिद मुझे बता तू, क्यूं ये अत्याचार किया ३?

रेत रहे थे तुम गर्दन जब, तुमने हाथ उखाड़ा था।
सच बतलाओ क्या अंतस ने, तुझको नही पुकारा था ?
कितना पत्थर दिल है तेरा, जो अश्कों से नहीं बहा ?
बोलो अंत समय क्या उसने, तुमको चाचा नहीं कहा ४?

दोष नहीं है मात्र तुम्हारा, जो तुमने यह कर्म किया।
दूषित है तालीम तुम्हारी, जिसने ऐसा मर्म दिया।।
दोषी है वो कोख कि जिसने, नरपिशाच का भरण किया।
दोष वीर्य की उन बूंदों का, जिसने तुमको जन्म दिया।५।

बचपन से ही जीवों के प्रति, निर्ममता का पाठ पढ़ा।
बकरे की फिर गर्दन रेती, सँग हिंसा के पला बढ़ा।।
भोजन में भी रक्त समाहित, गर्दन पैरों के टुकड़े।
तो कैसे महसूस करेगा, आंखों से बहते दुखड़े।६।

दूषित करने गांव-शहर को, छोड़ कबीले तुम आए।
मगर कबीलाई संस्कृति से, खुद को मुक्त न कर पाए।।
दोष तुम्हारे संस्कारों का, जिसको पा तुम पले बढ़े।
लानत उस समाज पर जिसने, तेरे जैसे दंश गढ़े।७।

इंसां कैसे कह दूं ये तो, गिद्धों से भी बदतर हैं।
इनके अपराधों के बदले, महज सलाखें कमतर हैं।।
इन हत्यारों के सँग कोई, नहीं रियायत की जाए।
चौराहे पे सरेआम ही, इनको फांसी दी जाए।८।
     
                                         ✍️ डॉ पवन मिश्र








Wednesday, 8 May 2019

ग़ज़ल- दर्द से थक हार कर जो लोग मयख़ाने गए


दर्द से थक हार कर जो लोग मयख़ाने गये।
लौट कर आये नही जितने भी दीवाने गये।।

रात भर पीता रहा मैं उनकी आंखों से शराब।
और मुझको ढूंढने को लोग मयख़ाने गये।।

इश्क दरिया आग का है जानते थे वो मगर।
शम्अ फिर भी चूमने बेख़ौफ़ परवाने गए।।

अब हमारे अलबमों में फोटुएं उनकी नहीं।
रफ़्ता रफ़्ता ज़ेह्न से भी सारे अफ़साने गए।।

कोशिशे जिनकी न मानीं हारकर चुप बैठना।
इस जहां में मंजिलों तक वो ही दीवाने गए।।

                                    ✍️ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 25 April 2019

ग़ज़ल- देखो ना


साहब की आई है सत्ता देखो ना।
रंग-ढंग और कपड़ा लत्ता देखो ना।।

दादी पापा भी पहले भरमाते थे।
अब पपुआ बांटेगा भत्ता देखो ना।।

गुरबत और सियासी चालों में फँसकर।
मरने को मजबूर है नत्था देखो ना।।

तुम बिन बगिया सूनी सूनी लगती है।
मुरझाया है पत्ता पत्ता देखो ना।।

मरघट पे बहती नदिया दिखलाती है।
मानव तन कागज़ का गत्ता देखो ना।।

छेड़ नहीं तू शांत पवन को ऐ नादां।
बर्रैया का है ये छत्ता देखो ना।।

                   ✍️ डॉ पवन मिश्र

Monday, 22 April 2019

नवगीत- आओ सब मतदान करें


लोकतंत्र का पर्व निराला,
संविधान का ये रखवाला।
दस्तक देकर हमें बुलाये,
देखो वेला बीत न जाये।
पुण्य यज्ञ यह आहुति मांगे,
इसका हम सम्मान करें।
आओ सब मतदान करें।१।

चाचा चाची निकलो घर से,
धूप मिले या पानी बरसे।
आंधी-तूफ़ां कुछ भी आए,
लेकिन लक्ष्य न डिगने पाए।
मतकेन्द्रों तक जाना ही है,
दूर सभी व्यवधान करें।
आओ सब मतदान करें।२।

आज अगर आलस के मारे,
मत देने से चूके प्यारे।
तो अयोग्य चुनकर आएगा,
दोष तुम्हारे सर जाएगा।
आने वाली पीढ़ी के हित,
चलो राष्ट्र निर्माण करें।
आओ सब मतदान करें।३।

अपना मत अपनी मर्जी से,
ना दबाव, ना ही अर्जी से।
जाति-धर्म से ऊपर उठकर,
राष्ट्रवाद सर्वोपरि रखकर।
लोकतंत्र की रक्षा के हित,
चलो सभी प्रस्थान करें।
आओ सब मतदान करें।४।

       ✍️ डॉ पवन मिश्र