Wednesday, 10 July 2024

लेख- डिजिटल उपस्थिति और शिक्षक विरोध

डिजिटल उपस्थिति और शिक्षक विरोध-


वर्तमान में बेसिक शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश के द्वारा शिक्षकों की उपस्थिति हेतु जारी किए गए एक फरमान की सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक बहुत चर्चा है। विषय शिक्षकों की डिजिटल उपस्थिति का है। एक तरफ शिक्षक इस आदेश को अव्यवहारिक बताते हुए विरोध में लामबंद हैं तो दूसरी तरफ प्रशासन स्वयं को सही साबित करने में लगा है। मीडिया और जन सामान्य का एक तबका इसे शिक्षकों की हठधर्मिता से जोड़कर देख रहा है, प्रचारित किया जा रहा है कि शिक्षक समय से विद्यालय नहीं आते इसीलिये डिजिटल उपस्थिति का विरोध कर रहे हैं। 

          एक शिक्षक होने के नाते इस लेख के माध्यम से मैं शिक्षकों के पक्ष को बिंदुवार स्प्ष्ट करने का प्रयास रहा हूँ। यहाँ यह समझना अति आवश्यक है आखिर शिक्षक क्यों इस आदेश को अव्यवहारिक कह रहे हैं ?

1) पहला और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि जिस वेब पोर्टल के माध्यम से शिक्षकों की डिजिटल उपस्थिति की  बात हो रही है वह तकनीकी रूप से बेहद पंगु है। उसी पोर्टल के माध्यम से गत कई वर्षों से छात्रों के नामांकन आदि की प्रक्रिया शिक्षकों द्वारा की जा रही है। ढेरों उदाहरण देखने को मिलते हैं कि अमुक छात्र का नामांकन आज पोर्टल पर कर दिया गया लेकिन कई दिनों तक वह प्रदर्शित नहीं होता। आप नामांकन दो बार कीजिये, तीन बार कीजिये लेकिन परिणाम वही, 'ढाक के तीन पात।' हालांकि कई बार दो-तीन दिन में नाम पटल पर दिखने भी लगते हैं। यही हाल उस ऐप का भी है जिसके जरिये शासन/प्रशासन बेसिक शिक्षा को डिजिटल भारत की दौड़ का हिस्सा बनाना चाहता है। ऐप के मुख्य पृष्ठ पर घूमता चक्र आपके धैर्य की परीक्षा लेता रहता है। शासन द्वारा उपलब्ध कराए गए टेबलेट की गुणवत्ता का अंदाजा भी लेख के पाठक आसानी से लगा सकते हैं। कुछ शिक्षकों ने तो यहां तक बताया है कि ऐप के द्वारा लोकेशन का आकलन भी ठीक प्रकार से नहीं हो रहा है। अब यहीं से शिक्षकों के विरोध का मुख्य बिंदु जन्मता है कि इस पंगु तकनीक के माध्यम से प्रतिदिन शिक्षकों की उपस्थिति की सटीक जानकारी कैसे ली जा सकती है ? सुदूर ग्रामीण क्षेत्र का शिक्षक अपनी दैनिक उपस्थिति के लिये जर्जर नेटवर्क और पंगु पोर्टल/ऐप पर क्यों आश्रित रहें?

2) यह स्प्ष्ट करने की आवश्यकता नहीं है कि एक शिक्षक, समाज निर्माण का कितना महत्वपूर्ण अंग होता है? लेकिन उसी शिक्षक के प्रति वर्तमान में प्रशासन का आचरण पूर्णतया अविश्वास आधारित है। मानो यह मान लिया गया है कि शिक्षक कामचोर है जो न तो समय से विद्यालय आता है न ही वह शिक्षण कार्य करता है। दण्ड आधारित नीतियों का निर्माण करने वाले नीति नियंताओं को लगता है कि वो डंडे से विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था को मानकों के अनुरूप कर लेंगे। न तो यहां विश्वासयुक्त सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाए जाने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास किये गए न ही शिक्षकों की बुनियादी समस्यायों पर विचार। 

बेसिक शिक्षा परिषद के शिक्षक अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन मात्र 14 आकस्मिक अवकाशों से करते हैं। यह विडंबना ही है कि स्वयं के विवाह का विषय हो या अपने पुत्र/पुत्रियों का, किसी आकस्मिक दुखद परिस्थितियों की बात हो या परिवारीजन के मृत्योपरांत होने वाले धार्मिक कर्मकांड (तेरहवीं आदि), उत्तर प्रदेश का एक बेसिक शिक्षक इन सारे दायित्वों को नियम विरुद्ध जाकर चिकित्सकीय अवकाश लेकर ही पूर्ण कर पाता है क्योंकि उसे आकस्मिक अवकाश के अतिरिक्त कोई अन्य अवकाश देय ही नहीं है। क्या कभी अवकाश सम्बन्धी इन बुनियादी समस्याओं पर शासन ने विचार किया ? क्या आवश्यक नहीं कि प्रशासन द्वारा शिक्षकों की डिजिटल उपस्थिति की बात इन समस्याओं के निदान के बाद की जाती ? जबकि शिक्षकों से इतर राज्य कर्मचारियों को अन्य प्रकार के अवकाश भी देय हैं। 

3) डिजिटल उपस्थिति जैसा अव्यवहारिक आदेश देने वाला प्रशासन क्या उत्तर प्रदेश के अन्य राज्य कर्मचारियों की भांति बेसिक शिक्षा के शिक्षकों और उनके आश्रितों को चिकित्सकीय सुविधाएं मुहैया कराने हेतु जिम्मेदार नहीं है ? इस बुनियादी सुविधा पर कोई सार्थक पहल शासन/प्रशासन की तरफ से क्यों नहीं होती ?

4) पोलियो उन्मूलन, परिवार सर्वेक्षण, मतदाता पुनरीक्षण, मध्यान्ह भोजन व्यवस्था जैसे ढेरों गैर शैक्षणिक कार्य विद्यालय अवधि के अतिरिक्त तथा अवकाश के दिनों में कराना क्या शिक्षकों का शोषण नही है ? 

              मैं स्पष्टतः कह रहा हूँ कि कोई भी शिक्षक डिजिटाइलेशन के विरोध में नहीं है। विभाग द्वारा प्रदत्त ढेरों ऐसे कार्यों का निष्पादन भूतकाल से उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षक करते आए हैं। क्या प्रशासन के लिये यह बिंदु विचारणीय नहीं है कि जो शिक्षक गत कई वर्षों से निजी संसाधनों का प्रयोग कर विभाग की विभिन्न डिजिटल योजनाओं को गति देने में रत है, वही शिक्षक अब विभाग द्वारा टेबलेट और सिम उपलब्ध कराए जाने के बाद भी अपनी डिजिटल उपस्थिति के लिए सहमत क्यों नहीं हो पा रहा? डिजिटल उपस्थिति को लेकर हमारा मत है कि जब तक आपकी तकनीकि मानक के अनुरूप पुष्ट न हो इसे हमारी दैनिक उपस्थिति, हमारी सेवा और वेतन से कैसे सम्बद्ध किया जा सकता है ? शिक्षकों की डिजिटल उपस्थिति हेतु प्रयोग की जाने वाली तकनीकि की आधारभूत संरचना को मानकों की कसौटी पर कसे बिना उसे व्यापक रूप से आप कैसे लागू कर सकते हैं ? विचार कीजिये कि यदि किसी तकनीकि कारण से किसी शिक्षक की उपस्थिति किसी दिन ऐप पर अंकित होने से रह जाए तो पूरे दिन वो किस मनोदशा से विद्यालय में रहेगा ? क्या वो पूरे मनोयोग से शिक्षण कार्य कर पाएगा ? इस तरह का मानसिक दबाव एक शिक्षक पर लाद कर क्या शिक्षा के विभिन्न आयाम पूर्ण हो सकेंगे ? जबकि उस दिन की अनुपस्थिति में उस अमुक शिक्षक का कोई दोष नहीं...

यहां यह स्प्ष्ट करना भी आवश्यक है कि शिक्षकों की अवकाश सम्बन्धी बुनियादी समस्यायों और उनके पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति हेतु राज्य कमर्चारियों की भांति अन्य बुनियादी सुविधाओं की बात कर शिक्षकों के बीच विश्वास का वातावरण बना निःसन्देह ढेरों निर्दिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। लेकिन एक शिक्षक को मात्र कामचोर और समयचोर मानकर जब तक नीतियां बनती रहेंगी, वो अव्यवहारिक ही रहेंगी। एक शिक्षक को महज वेतनभोगी कर्मचारी या सरकारी नौकरी करने वाले नौकर के रूप में देखने से न तो उस शिक्षक के प्रति न्याय होगा और न ही यह समाज के हित में होगा। इसीलिये सभी नीति नियंताओं से करबद्ध आग्रह है कि शिक्षकों के साथ शिक्षक जैसे सम्मानित पद के गरिमानुकूल व्यवहार किये जाने की आवश्यकता है। 'वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः' की सूक्ति को जीने वाले शिक्षक समाज के टूट रहे आत्मविश्वास को शक्ति प्रदान किये जाने की आवश्यकता है। डंडे से शिक्षकों को नियंत्रित किये जाने की मनोदशा से बाहर आने की आवश्यकता है। इसलिये नीति नियंताओं को आत्मचिंतन करना होगा, सकारात्मक माहौल बनाना होगा। तभी शिक्षा का, शिक्षार्थियों का और इस प्रदेश का विकास सम्भव हो सकेगा।


✍️ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 16 April 2024

बाल कविताएं

 1)
मेरी प्यारी प्यारी अम्मा
जग में सबसे न्यारी अम्मा
मुझ पर सारा प्यार लुटाती
लड्डू पेड़ा मुझे खिलाती
रोज कहानी मुझे सुनाती
लोरी गाकर मुझे सुलाती
2)
रंग बिरंगी तितली रानी
मुझको लगती बड़ी सुहानी
दिन भर फूलों पर मंडराती
मानो उनसे रंग चुराती
इसको देखूं तो ललचाऊँ
मन करता है सँग उड़ जाऊं
3)
सुबह सुबह मेरी खिड़की पर
हर दिन है आती गौरैया 
फुदक-फुदक कर घर आंगन में
खुशियां बिखराती गौरैया
चावल के दाने चुग चुग कर
फुर से उड़ जाती गौरैया
4)
जगमग जगमग दीपों वाली
दीवाली की रात निराली
बंटी झूमे बबली झूमे
जैसे जैसे चरखी घूमे
खील बताशे गट्टे खाते
सारे बच्चे धूम मचाते
5)
सुबह सवेरे सूरज चाचू
हमें जगाने आते हैं
अपनी किरणों से धरती का
हर कोना चमकाते हैं
रोज सवेरे जल्दी आकर
सबमें जोश जगाते हैं
अंधेरे से हर दम लड़ना
सीख यही सिखलाते हैं
6)
चंदा मामा मुझे बताओ
दूर गगन क्यों बसते हो
किससे तुमको डर लगता जो
दिन भर छुपकर रहते हो
मेरी इतनी बात मान लो
मुझको गले लगा जाओ
तारों की टोली को लेकर
मेरी छत पर आ जाओ
7)
पथ चाहे हो दुर्गम लेकिन
नदिया बहती रहती है
कल-कल कल-कल करते करते
हँस कर संकट सहती है
चलते जाओ चलते जाओ
बात यही बस कहती है
8)
काले बादल काले बादल
मेरी छत पर आओ ना
गर्मी बढ़ती जाती देखो
पानी अब बरसाओ ना
सुनो जुलाई बीत रही है
अब तो तुम आ जाओ ना
आखिर क्यों रूठे हो हमसे
इतना तो बतलाओ ना
9)
चलें घूमने हम सब मेला
देखेंगे जादू का खेला
ऊंचे ऊंचे झूले होंगे
गुब्बारे भी फूले होंगे
ठंडी कुल्फी, गरम जलेबी
खुश है बंटी, खुश है बेबी
10)
सुबह ईश का ध्यान धरें हम
केवल अच्छे काम करें हम
सबसे मीठी वाणी बोलें
रिश्तों में मीठापन घोलें
सच का साथ कभी ना छोड़ें
दिल से दिल का रिश्ता जोड़ें
11)
अपना प्यारा भारत देश 
सबसे न्यारा भारत देश
हम सब इसकी हैं संतान
सदा रखेंगे इसका मान
सकल विश्व में है पहचान
जय जय भारत देश महान

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 7 April 2024

ग़ज़ल- कीजिए रोशन उमीदी का चराग़

कीजिये रोशन उमीदी का चराग़
हौसलों का, ख़ुशनसीबी का चराग़

कोशिशों का तेल पाकर ही सदा
जगमगाता कामयाबी का चराग़

तीरगी में ही रहा सारा अवध
राम आए तो जला घी का चराग़

आँख तो इज़हार करती है मगर
होंठ पे रक्खा खमोशी का चराग़

हश्र तक मैं मुन्तज़िर उनका रहा
फिर बुझा मेरी यक़ीनी का चराग़

मुफ़लिसी का दर्द क्या समझेगा वो
घर में जिसके है अमीरी का चराग़

ऐ पवन कोशिश यही करनी तुझे
बुझ न पाए कोई नेकी का चराग़

✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 17 March 2024

ग़ज़ल- तुम्हारे घर जो बरकत आ रही है

तुम्हारे घर जो बरकत आ रही है
वो बेटी की बदौलत आ रही है

तुम्हारे साथ का शायद असर है
बदन में कुछ हरारत आ रही है

छुआ जबसे है तुमने यार मुझको
रकीबों की शिकायत आ रही है

सुकूँ से नींद लेना चाहता हूँ
मगर उनको शरारत आ रही है

बना है जो मेरी नींदों का दुश्मन
उसी से बू-ए-रिफ़ाक़त आ रही है

चुनावी साल है तो रहनुमा को
गरीबों पर मुहब्बत आ रही है

✍️ डॉ पवन मिश्र

बू-ए-रिफ़ाक़त- दोस्ती की महक

Sunday, 3 March 2024

ग़ज़ल- हर घड़ी अन्याय का प्रतिकार होना चाहिये

हर घड़ी अन्याय का प्रतिकार होना चाहिये
क्रूरता के वक्ष पर चढ़ वार होना चाहिये

मूक दर्शक बन के कब तक देखना विस्तार को
जंगली बेलों का अब उपचार होना चाहिये

झूठ के विज्ञापनों का शोर कब तक हम सुनें
सत्य के संवाद का अख़बार होना चाहिये

यदि हो वाणीपुत्र तो फिर राग दरबारी तजो
लेखनी में आपकी अंगार होना चाहिये

थक गया हूँ लड़ते लड़ते ज़िंदगी की जंग मैं
इस लड़ाई में भी इक इतवार होना चाहिये

मात्र मेरी भावना से बन नहीं पाएगी बात
आपकी आंखों में भी तो प्यार होना चाहिये

लिबलिबा व्यक्तित्व लेकर जी रहे तो व्यर्थ है
रीढ़ की हड्डी पे कुछ तो भार होना चाहिए

✍️ डॉ पवन मिश्र

Saturday, 24 February 2024

ग़ज़ल- प्रतीक्षा है तुम्हारे आगमन की

ये रातें अब नहीं कटतीं तपन की
प्रतीक्षा है तुम्हारे आगमन की

अधर को चाह है अधरों की तेरे
नयन को रूप-रस के आचमन की

मिलन ही प्रेम का है सत्य अंतिम
नही है बाध्यता जीवन-मरण की

दिखेगा आप के भीतर ही स्रष्टा
मिलेगी दृष्टि जब अंतर्नयन की

कभी समझे नहीं रामत्व क्या है
कथाएं कह रहे बस वनगमन की

बुराई ही दिखे जिनको चतुर्दिक
जरूरत है उन्हें स्व-आकलन की

कदाचित भूल जाएं लोग मुझको
तुम्हे तो याद आएगी पवन की ??

✍️ डॉ पवन मिश्र





ग़ज़ल- अगर हो सोच ही जब अतिक्रमण की

अगर हो सोच ही जब अतिक्रमण की
कहाँ फिर बात होगी आचरण की

कलुष अंतःकरण में बढ़ रहा है
मगर चिन्ता उन्हें बस आवरण की

गहन निद्रा में सब डूबे हुए हैं
मशालें कौन थामे जागरण की

रहेगा लोभ का रावण जहां भी
बनेगी योजना सीता हरण की

विचारों के लिये लड़ना ही होगा
कठिन वेला है मित्रों संक्रमण की

कई ढांचे कथाएं कह रहे हैं
हमारी अस्मिता पर आक्रमण की

✍️ डॉ पवन मिश्र