Saturday, 15 October 2022

स्नेह सम्मिलन-४

 स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, रहा है काशी हेर।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, रहा है काशी हेर।।


वर्षों की तड़पन है प्यारों खूब जमेगा रंग,

बाबा भोले की नगरी में होना है हुड़दंग।

कतकी मेला के पहले ही मिलना है दीवानों,

शमा जली है स्नेह मिलन की आ जाओ परवानों।।

जल्दी से अब टिकट करा लो हो न जाये देर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, रहा है काशी हेर।।


पहली बार किशनपुर वाले भूल गए क्या वो पल,

एकडला के गन्नों का रस वो यमुना का कल-कल।

याद नहीं क्या प्रथम मिलन की नेह भरी वो बतिया,

जौ मकई की सोंधी रोटी वो अमरूद की बगिया।।

वाणी के उस प्रथम मंच से खूब दहाड़े शेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, रहा है काशी हेर।।


दूजी बार गए ददरा अब्दुल हमीद के गांव,

अबकी बार थी अमराई और उसकी ठंडी छाँव।

चटक धूप में सभी मगन थे नेह की चादर ताने,

ढोल मंजीरे से उल्लासित कजरी के दीवाने।।

उमड़ घुमड़ कर वही भाव फिर हमें रहा है टेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, रहा है काशी हेर।।


उसके बाद सभी वाणीजन पहुंचे थे इक मरुथर,

कुछ ने पकड़ी ट्रेन हावड़ा कुछ ने थामी मरुधर।

ग्राम उदासर ने अद्भुत सत्कार किया था सबका,

राजस्थानी भोजन था और था वाणी का तबका।।

अद्भुत मंच सजा था उस दिन नगर था बीकानेर,

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, रहा है काशी हेर।।

स्नेह सम्मिलन तुम्हे पुकारे, रहा है काशी हेर।।


                                  ✍ डॉ पवन मिश्र


Sunday, 14 August 2022

गीत- यह भारतवर्ष महान मेरा

 यह भारतवर्ष महान मेरा,

अनमोल छटा ज्यों इंद्रधनुष।

भूखण्ड नहीं यह मात्र कोई,

है देवतुल्य यह राष्ट्रपुरुष।।


मस्तक हिम शिखरों का आलय,

स्वर्गानुभूति सा मेघालय।

कटि के जंगल हैं हरे-भरे,

पद के नीचे सागर लहरे।

पर्वत श्रेणी नदियों का जाल,

गंगा यमुना सरयू विशाल।

मैदानी हरित प्रदेश यहाँ,

अनगिन भाषा और भेष यहाँ।

तिनके तिनके में ब्रह्म अंश,

वेदों की गति वंशानुवंश।

सभ्यता सनातन चिर महान,

प्रस्तर-प्रस्तर देता प्रमान।

सम्यक विचार सम्यक सुदृष्टि,

माने कुटुम्ब हम सकल सृष्टि।

शिव-शिखा छोड़कर भारत में,

सुरसरि धोती हर पाप कलुष।

है देवतुल्य यह राष्ट्रपुरुष।।


इसकी गोदी में राम पले,

घुटनों के बल श्रीकृष्ण चले।

यह तप माता अनसुइया का,

गार्गी का सीता मइया का।

गौतम नानक की बानी है,

यह हरिश्चन्द्र सा दानी है।

मानस गीता रामायण है,

यह स्वयं रूप नारायण है।

इसकी पद रज को पाने को,

सृष्टा भी आतुर आने को।

वामन वराह और परशुराम,

धन्वन्तरि का यह पुण्य धाम।

हो भैरव या वृषभावतार,

दुर्वासा या अंजनि कुमार।

इस देवभूमि पर कोटि देव,

अवतरित हुए धर रूप मनुष।

है देवतुल्य यह राष्ट्रपुरुष।।


यह वीर शिवा का शौर्य गान,

राणाप्रताप का स्वाभिमान।

राणा सांगा के घावों में,

कुम्भा के अतुलित भावों में।

आल्हा-ऊदल की प्रखर शक्ति,

रानी लक्ष्मी की देश भक्ति।

जल गई आन हित धू-धू कर,

ये वीर पद्मिनी का जौहर।

यह विष्णुगुप्त की शिक्षा में,

सागर सी धैर्य परीक्षा में।

अशफ़ाक भगत सावरकर हों,

बिस्मिल सुभाष या शेखर हों।

गांधी पटेल गोखले तिलक,

जो मृत्यु बाद भी रहे चमक।

सुंदर इस भारत बगिया में,

अनगिन ऐसे हैं वीर तरुश।

है देवतुल्य यह राष्ट्रपुरुष।।


          ✍️ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 3 February 2022

ग़ज़ल- ख़ुदा जाने

 

२१२२ १२१२ २२
क्यूं हुआ हादसा, ख़ुदा जाने
चाहता क्या ख़ुदा, ख़ुदा जाने

एक चेहरे पे रुक गईं नजरें
इश्क़ है या ख़ता, ख़ुदा जाने

चल दिये राह-ए-इश्क़ पर लेकिन
देखें होता है क्या, ख़ुदा जाने

कश्तियाँ बह रहीं अकेले ही
है कहाँ नाख़ुदा, ख़ुदा जाने

हिज़्र के ज़ख़्म कब तलक पालूं
कब मिलेगी शिफ़ा, ख़ुदा जाने

               ✍️ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 28 March 2021

ग़ज़ल- धीरे धीरे तीरगी मिट जाएगी


मेरी हर इक तिश्नगी मिट जाएगी

वो मिलें तो बेकली मिट जाएगी


वो फ़क़त हाथों में ले लें हाथ ये

जीस्त से नाराज़गी मिट जाएगी


बाम पर आ जाएं बस वो इक दफा

कालिमा इस रात की मिट जाएगी


गुफ़्तगू की नाव लेकर आइये

फ़ासलों की हर नदी मिट जाएगी


वो न होंगे ज़िंदगी में जब मेरी

सच कहूं तो हर खुशी मिट जाएगी


उनके सारे ख़त जला आया हूँ आज

धीरे धीरे याद भी मिट जाएगी


हर दिये को हौसला कुछ दीजिये

धीरे धीरे तीरगी मिट जाएगी


आंख का पानी न मरने दीजिये

वरना फिर ये ज़िंदगी मिट जाएगी


बागबां ही ख़ार गर बोने लगे

बाग की हर इक कली मिट जाएगी


                  ✍️ डॉ पवन मिश्र

तिश्नगी= प्यास

जीस्त= जीवन

तीरगी= अंधेरा

ख़ार= कांटा

Sunday, 28 February 2021

ग़ज़ल-कब मैंने ये कहा कि मिरा हू-ब-हू करें

 221 2121 1221 212


कब मैंने ये कहा कि मिरा हू-ब-हू करें

लेकिन जो दिल में बात है वो रू-ब-रू करें


आओ कि एक दूसरे से गुफ़्तगू करें

दोनों के दिल ही चाक हैं मिलकर रफ़ू करें


चारो तरफ चमन में चलो रंग-ओ-बू करें

जिस मोड़ पर रुके थे वहीं से शुरू करें


पत्थर का ही अगर है हमारा खुदा भी तो

हम क्यूं पढ़ें नमाज़ बता क्यूं वज़ू करें


कुछ आप भी तो मेरी खबर लीजिये पवन

कब तक तलाश हम ही फ़क़त कू-ब-कू करें


                         ✍️ डॉ पवन मिश्र




Saturday, 30 January 2021

मुक्तक- जवानी

(शक्ति छंद आधारित मुक्तक)


अगर इंकलाबी कहानी नहीं,

लहू में तुम्हारे रवानी नहीं।

डराती अगर हो पराजय तुम्हें,

सुनो मित्र वो फिर जवानी नहीं।।


चलो यार माना बहुत खार हैं,

चमन जल रहा कोटि अंगार हैं।

मगर ये जवानी मिली किसलिए,

यही तो जवानी के श्रृंगार हैं।।


✍️ डॉ पवन मिश्र


Sunday, 24 January 2021

ग़ज़ल- आएंगे दिन ये याद अबीरो गुलाल के


आएंगे दिन ये याद अबीरो गुलाल के

चिठ्ठी के, गुल के, मखमली रेशम रुमाल के


दिल से जुड़ा है इसलिये चुभने का ख़ौफ़ है

रिश्ता ये कांच जैसा है रखना सँभाल के


क्या क्या लिखूं ग़ज़ल में बताए मुझे कोई

किस्से तमाम हैं तेरे हुस्नो जमाल के


कैसे यकीं दिलाएं तुम्हें चाहतों का हम

कह दो तो रख दें यार कलेजा निकाल के


पहलू में आके अब तो अता कर सुकूं मुझे

कब तक ये दिन बिताऊं मैं रंजो मलाल के


थोड़ा सा बाजुओं पे करो ऐतबार अब

कब तक करोगे फैसले सिक्के उछाल के


                               ✍️ डॉ पवन मिश्र