Sunday, 17 September 2017

ग़ज़ल- मुहब्बत का इरादा क्यूँ करें हम


वही गलती दुबारा क्यूँ करें हम।
मुहब्बत का इरादा क्यूँ करें हम।।

जिन्हें पर्वा नहीं कोई हमारी।
उन्हें आख़िर पुकारा क्यूँ करें हम।।

यकीं हो गर तुम्हे हमपे तो आओ।
वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम**।।

तेरी तस्वीर रख ली है रहल पे।
मुहब्बत इससे ज़्यादा क्यूँ करें हम।।

नहीं दिल से अगर उठती सदायें।
नवाज़िश का दिखावा क्यूँ करें हम।।

कज़ा के सामने देगी दगा वो।
भरोसा जिंदगी का क्यूँ करें हम।।

                    ✍ डॉ पवन मिश्र

रहल= लकड़ी का आधार जिसपर रखकर धर्मग्रन्थ पढ़ते हैं
सदायें= आवाजें
नवाज़िश= मेहरबानी, दया
कज़ा= मौत
**जॉन औलिया साहब का मिसरा

Friday, 1 September 2017

अतुकान्त- स्वयम्भू जगदीश


हे मनुपुत्र !
माना तुम समर्थ हो,
अति समर्थ
पौध रोपी है तुमने
झाड़-झंखाड़ भी उगाए
नरमुण्ड एकत्र कर
भीड़ को जन्मा है तुमने
जयकारों से गुंजित हैं दिशाएं
आकाश भी, वाणी भी
स्वयं को बताने लगे जगदीश
ऊँची शिला पर बैठ
देने लगे ज्ञान
नीचे बैठी भीड़ को
मैं-मैं करते करते
भूल गए हमें
बेशक
उस भीड़ में मैं भी हूँ
लेकिन हे स्वयम्भू जगदीश
तुम्हारी भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ।
क्या हुआ ? चुभ गया तुम्हे ?
लेकिन क्यों ?
ऊँची शिला पर
बैठे हो बस
जगदीश नहीं हो तुम
मनुपुत्र हो, मनुपुत्र।

✍ डॉ पवन मिश्र

मुक्तक


परशुराम की पुण्य धरा को वंदन है
हे वीर प्रसूता गाजीपुर अभिनन्दन है
सौ सौ बार लगा लूँ इसको माथे पर
अब्दुल हमीद की यह मिट्टी तो चंदन है

जाने कहाँ से वो मेरे करीब आ गया
लेकर हज़ार ख़्वाब वो हबीब आ गया
मंज़िल भी दिख रही थी राहे इश्क़ में मगर
कम्बख़्त बीच में मेरा नसीब आ गया

कली कमसिन को काँटों से बचा लाई,
वो मुझको हर अँधेरों से बचा लाई।
समंदर तो बहुत मगरूर था लेकिन,
मेरी माँ हर थपेड़ों से बचा लाई।।

✍डॉ पवन मिश्र

Saturday, 26 August 2017

आल्हा/वीर छन्द- रँगे सियार


अर्थमोह की इस आंधी में,
देखो कैसी चली बयार।
धर्म लबादा ओढ़े कितने,
घूम रहे हैं रँगे सियार।१।

भोले-भालों को छलते ये,
किया देश का बंटाधार।
अपनी झोली भरने को ही,
करें धर्म का ये व्यापार।२।

श्रद्धा की फसलें बस बोते,
नहीं दूसरा इनको काम।
धन वैभव के मद में रहते,
पैसा ही बस अल्लाराम।३।

कोई धारे कंठी माला,
कोई हाथ लिये कुरआन।
छद्मवेश में कुछ फादर तो,
ईसा से ही है अनजान।४।

राजनीति की शह पाकर ये,
भस्मासुर होते तैयार।
न्यायपालिका भी बेदम है,
इनके आगे नत सरकार।५।

टोपी, माला, क्रॉस पहन के,
धर्म चलाएं ठेकेदार।
इनसे मुक्ति दिला दो ईश्वर,
भारत माता करे पुकार।६।

                ✍ डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 16,15 मात्राभार पर यति तथा पदांत में गुरु लघु की अनिवार्यता।


Monday, 21 August 2017

नवगीत- तब राष्ट्र का निर्माण हो

एकात्म मानववाद की,
परिकल्पना का मान हो।
अंग्रेजियत की भीड़ में,
हिंदी का जब सम्मान हो।
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

वंचितों की भीड़ में जो,
अंत में बेबस खड़ा है।
वस्त्र वंचित देह भीतर,
भूख लेकर जो पड़ा है।।
बजबजाती नालियों से,
रात दिन जो जूझता है।
अश्रुपूरित नैन में जो,
स्वप्न लेकर घूमता है।।
उस मनुज का उत्थान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

चीथड़ों से तन लपेटे,
वक्ष पे नवजात बाँधे।
अनवरत जो चल रही है,
पीठ पर संसार साधे।।
जीवन थपेड़ों से यहाँ,
किंचित नहीं भयभीत जो।
नित कंटकों से लड़ रही,
साहस के गाती गीत जो।।
उस नार का सम्मान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

        ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 20 August 2017

ग़ज़ल- अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं


चलो तूफान से लड़ने का कुछ जज़्बा दिखाते हैं।
कि अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं।।

मेरे जुगनू के आगे क्या तेरी औकात है सूरज।
ये तब भी रोशनी देता अँधेरे जब चिढ़ाते हैं।।

नहीं परवाह मौजों की न तूफानों से घबराहट।
समंदर चीर कर यारों सफ़ीने हम चलाते हैं।।

न चल पाओगे मेरे साथ तुम इस राह पर हमदम।
*मुझे तो आजकल बेदारियों में ख़्वाब आते हैं।।*

फ़लक का चांद भी बेदम नजर आता है तब मुझको।
झुका कर वो कभी जब भी नज़र फिर से उठाते हैं।।

मेरे हाथों में आईना है ख़ंजर तो नहीं कोई।
भला फिर लोग क्यूँ इतना पवन से खौफ़ खाते हैं।।

                                  ✍ डॉ पवन मिश्र

*अहमद नदीम कासिमी साहब का मिसरा

Sunday, 6 August 2017

ग़ज़ल- मैं नहीं हूँ


तू ही तू दिख रहा है मैं नहीं हूँ।
ये सब कुछ ही तेरा है मैं नहीं हूँ।।

मेरे आईने में जो आजकल है।
यकीं मानो खुदा है मैं नहीं हूँ।।

उसी का ही कोई होगा करिश्मा।
*जो मुझमें बोलता है मैं नहीं हूँ*।।

चुरा कर दिल मेरा देखो जरा तो।
वो सबको बोलता है मैं नहीं हूँ।।

सुना लाखों हैं तेरी भीड़ में अब।
मुझे इतना पता है मैं नहीं हूँ।।

गलतफहमी उसे शायद कोई है।
जिसे वो ढूंढता है मैं नहीं हूँ।।

फ़दामत से उसे मंजिल मिली पर।
अकेला ही खड़ा है मैं नहीं हूँ।।

कचोटे है तुझे जो रात दिन वो।
तेरे दिल की सदा है मैं नहीं हूँ।।

           ✍ डॉ पवन मिश्र

फ़दामत= अन्याय, अनीति

*कबीर वारिस साहब का मिसरा