Tuesday, 17 October 2017

ग़ज़ल- वो ताजिर है, तिजारत ढूँढ लेता है


वो ताजिर है, तिज़ारत ढूँढ लेता है।
वो मतलब की सियासत ढूँढ लेता है।।
ताजिर= व्यापारी     तिजारत= व्यापार

जली झुग्गी की बिखरी राख में देखो।
वो वोटों की अमानत ढूँढ लेता है।।

बड़ा शातिर है देखो रहनुमा यारों।
वो लाशों में सियासत ढूँढ लेता है।।

लगा दे लाख पहरे ये जमाना पर।
जवां दिल अपनी आफ़त ढूँढ लेता है।।

ज़रा सी ज़िन्दगी में आदमी देखो।
बिना मतलब अदावत ढूँढ लेता है।।

खुदा की रहमतों पे है यकीं जिसको।
वबा में भी वो राहत ढूँढ लेता है।।
वबा= महामारी

                ✍ डॉ पवन मिश्र

ग़ज़ल- ये समझ लो जो हुआ अच्छा हुआ


क्या कहें किससे कहें कैसा हुआ।
ये समझ लो जो हुआ अच्छा हुआ।।

कौन सुन पायेगा अब मेरी सदा।
जब खुदा ही आज वो बहरा हुआ।।
सदा= आवाज

लाख वो इनकार करता है मगर।
अश्क़ में इक अक्स है उभरा हुआ।।

चाँद उतरा है या वो हैं बाम पर ?
आज मेरे दिल को फिर धोखा हुआ।।
बाम= छत

गर कज़ा ही है सदाकत जीस्त की।
जी रहा क्यूँ आदमी सहमा हुआ।।
कज़ा= मृत्यु,  सदाकत=सत्य,   जीस्त=जीवन

तीरगी को मुँह चिढ़ाने में पवन।
जुगनुओं से पूछ लो क्या क्या हुआ।।
तीरगी= अंधेरा
                  ✍ डॉ पवन मिश्र

Monday, 16 October 2017

ग़ज़ल- गुलों को सदा खार ने ही छला है


जमाने का दस्तूर ये ही रहा है।
गुलों को सदा खार ने ही छला है।।
खार= कांटा

बहुत कीमती है ये मोती सँभालो।
पलक पे जो आके तुम्हारी रुका है।।

जमाना क्या समझेगा अपनी मुहब्बत।
ये तुझको पता है ये मुझको पता है।।

खुदा से मिलेगा वो इंसान कैसे।
ज़माने की राहों में जो गुमशुदा है।।

उसी को सलामी है देती ये दुनिया।
यहाँ शख़्स तप के जो कुंदन बना है।।

मुकद्दर में जो था मिला है पवन को।
नहीं जिंदगी से कोई भी गिला है।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 15 October 2017

ग़ज़ल- तुम आ गए हो तो कोई जवाब दे जाओ


नहीं जो आब मिले तो सराब दे जाओ।
तुम आ गए हो तो कोई जवाब दे जाओ।।
आब= पानी    सराब= मृगतृष्णा

अभी न बात करो ज़ख्म की न आंसू की।
सुहाग रात है कोई गुलाब दे जाओ।।

बहुत अजीब हैं दस्तूर तेरी महफ़िल के।
मुझे भी रहना है कोई नक़ाब दे जाओ।।

कई दफ़ा वो मुझे अजनबी से लगते हैं।
समझ सकूँ उन्हें ऐसी किताब दे जाओ।।

अगर है जाना तुम्हे तो करो इनायत ये।
यहां जो खोया जो पाया हिसाब दे जाओ।।

ये माहताब भी ढलका हुआ सा लगता है।
*उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ*।।
माहताब= चन्द्रमा

कहाँ छुपी मेरी मंजिल किधर हैं राहें गुम।
ये तीरगी है घनी, आफ़ताब दे जाओ।।
तीरगी= अंधेरा    आफ़ताब=सूरज

जो लड़खड़ा के गिरूंगा तो थाम लेंगे वो।
सुनो हुजूर पवन को शराब दे जाओ।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

**बशीर बद्र साहब का मिसरा

Saturday, 14 October 2017

ग़ज़ल- अधूरी ख्वाहिशों का बोझ


अधूरी ख्वाहिशों का बोझ मेरे दिल पे है अब तक।
कि समझेगा वो बातें कब जो ठहरी हैं मेरे लब तक।।

मनाकर हार बैठे हैं लो अब तकदीर पर छोड़ा।
चलो अब देखते हैं आप रूठोगे भला कब तक।।

खुदा कब तक न आएगा हमारे सामने देखें।
कि हम भी दर न छोड़ेंगे दिखेगा वो नहीं जब तक।।

इबादत तब मेरी होगी मुकम्मल इस ज़माने में।
पहुंच जाएँगी जब दिल की सदायें मेरे उस रब तक।।

तुम्हे जाना है तो जाओ रहेगी याद इस दिल में।
रहेंगी मुन्तज़िर आँखे हमारी आखिरी शब तक।।

रगों में खून जब तक और धड़कन दिल की बाकी है।
भरोसा हौसलों का ही करेगा ये पवन तब तक।।

                                    ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 11 October 2017

ग़ज़ल- तुम्हारे बिन कहीं मधुबन नहीं है


तुम्हारे बिन कहीं मधुबन नहीं है।
घटायें हैं मगर सावन नहीं है।।

गए हो छोड़कर जिस दिन से हमको।
ये दिल तो है मगर धड़कन नहीं है।।

गलतफहमी उसी को हो गयी कुछ।
मेरी उससे कोई अनबन नहीं है।।

सुकूँ की नींद आ जाये हमे बस।
सिवा इसके कोई उलझन नहीं है।।

अभी तो दूर है मंज़िल हमारी।
युँ थकने के लिये जीवन नहीं है।।

सपोलों दूर रहना इस पवन से।
तेरी खाला का ये चन्दन नहीं है।।

                 ✍ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 5 October 2017

यात्रा वृत्तांत- पोखरा (नेपाल) यात्रा

पोखरा (नेपाल) यात्रा- ए लक्जिरियस एन्ड एडवेंचरस ट्रिप
-प्रथम दिवस-
अचानक ही कुछ परम मित्रों संग इस दशहरे अपनी ही गाड़ी से पोखरा (नेपाल) घूमने का प्लान बना। तय कार्यक्रम के अनुसार सुबह 7.30 बजे कानपुर से रवाना हुए। *गूगल मैप* की सहायता से तय हुआ कि *कानपुर-लखनऊ-फैजाबाद-बस्ती-कैम्पियर गंज- फरेंदा होते हुए सोनौली बॉर्डर* पार करेंगे। आप सब भी इसी मार्ग का प्रयोग करें। गोरखपुर जाने की आवश्यकता नहीं है।
इस यात्रा को *डॉक्टर्स ट्रिप* का नाम दिया हमलोगों ने। मल्लब हम सब के सब डॉक्टर उपाधि धारक थे।
पहले आपको अपने सहयात्री/मित्रों का संक्षिप्त परिचय देता चलूं। आगे के संस्मरण में आसानी रहेगी।
सबसे पहले *डॉ उमंग गोयल जी*, आप कर्वी (चित्रकूट) में एक उच्च कोटि के विद्यालय का प्रबंधन और संचालन देखते हैं। विशुद्ध खोजी यायावर हैं। ड्राइविंग में आपका कोई सानी नहीं है। ड्राइवर के होते हुए भी स्वयं ही गाड़ी चलाते हैं। पूरी यात्रा में स्वयं ही गाड़ी चलाई।
दूसरे *डॉ विवेक यादव जी*, आप गणित विषय के प्राध्यापक हैं। कानपुर के जाने माने इंजीनियरिंग प्रतिष्ठानों में शिक्षण कार्य का अनुभव है आपको। एडवेन्चरस टूर और फ्रोटोग्राफी इनके शौक हैं।
तीसरे थे *डॉ शरद अवस्थी (डॉक्टर साहब)*। आप एक अनुभवी दन्त चिकित्सक हैं। कानपुर व फतेहपुर में अपनी सेवाएं देते हैं। मस्त मौला स्वभाव के हमारे डॉक्टर साहब। पंचो की राय को अपनी राय मानने वाले डॉक्टर साहब। यात्रा में इनके होने की भी एक अलग कहानी है। आप दो दिवसीय मेडिकल सेमिनार के लिये गोरखपुर गए थे। हमलोगों ने सेमिनार खत्म होते ही वहीं से आपको उठा लिया। बेचारे इत्ते सीधे की ज्यादा प्रतिरोध भी न कर सके।
इनके अलावा आनन्द भाई साथ थे। कहने को तो ड्राइवर लेकिन पूरी यात्रा में परछाई की तरह साथ रहे।
डॉक्टर साहब को रास्ते में से उठाते हुए हम सब दोपहर लगभग 3 बजे सोनौली-भैरहवाँ बॉर्डर पहुंचे।
मेरी बुआ जी चूंकि भैरहवाँ (नेपाल) में ही रहती हैं और मेरे दो भतीजे और दो भांजे नेपाल पुलिस में कार्यरत हैं इसलिये हमारे लिये किसी समस्या के होने की सम्भावना शून्य थी।
बॉर्डर पर पहुंचते ही कुछ देर में मेरे *बड़े भतीजे संजय शुक्ल* का आना हुआ। संजय जी नेपाल पुलिस में *वरिष्ठ सई (सब इंस्पेक्टर)* हैं। चूंकि हमे अपनी ही गाड़ी से आगे की यात्रा करनी थी तो सबसे पहले *भन्सार* बनवाया हमलोगों ने जोकि आप प्रवेश अनुमति पत्र जैसा समझ लें। *प्रतिदिन 453 रुपये (नेपाली)* की दर से भन्सार बना। इसके बाद संजय जी हमलोगों को लेकर पास के ही एक बेहतरीन *होटल रेड सन* गए। कमरा बुकिंग की औपचारिकता के बाद संजय ने इस वादे संग विदा ली कि वो अपने अनुज और हमारे छोटे भतीजे अंतिम शुक्ल को तुरंत हमतक भेजेगा क्योंकि अभी भी दो महत्वपूर्ण कार्य शेष थे एक तो *पहाड़ पर गाड़ी ले जाने हेतु एक अतिरिक्त परमिट* का बनवाना और दूसरा सम्पर्क साधन हेतु *लोकल सिम* की व्यवस्था का। कमरा बेहतरीन था। कितने का था, बताना मुश्किल होगा क्योंकि संजय जी की होटल मालिक से मित्रता के कारण हमें *निःशुल्क सेवा* प्रदान की गई। होटल के मैनेजर अमृत जी बहुत मिलनसार थे।
होटल के कमरे में हाथ-मुंह धोकर हम सबने पीठ सीधी की, चाय पी। तब तक हमारे छोटे भतीजे जो नेपाल पुलिस में ही हेड कांस्टेबल हैं, आ गए। अब लोकल नेपाली नम्बर था हमारे मोबाइल में। थोड़ी देर में हम सब निकले और परमिट बनवाया। शाम के छह बजे चुके थे अतः लुम्बिनी भ्रमण का विचार त्याग सबने मार्किट में ही घूमने का मन बनाया। तय हुआ कि मैं भतीजे संग जाकर बुआ जी, भैया-भाभी, दीदी आदि से मिल आऊं। तो अन्य लोगों को मार्किट में छोड़कर मैं भतीजे संग परिवार जनों से मिलने निकल पड़ा। सबसे मिलन के पश्चात छोटे भांजे (वो भी नेपाल पुलिस में) ने वापिस हमें *होटल रेड सन* छोड़ा। जहाँ होटल के *शानदार रेस्टोरेंट* में मेरे मित्र मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे।
कुछ समय वहीं के *कैसिनो, स्विमिंग पूल* आदि में समय बिताकर भोजन उपरांत कमरे में आ गए। तय हुआ कि सुबह जल्दी उठकर (जो कि हमारे डॉक्टर साहब के लिये अति दुष्कर था) पोखरा की तरफ कूच करना है। सब लोग बिस्तर में कैद थे। लेकिन पोखरा की रोमांचक यात्रा का पूर्वानुमान नींद में खलल डाल रहा थी। देर रात तक हम सब जगते रहे। योजनाएं बनती रहीं। लेकिन कब थकान हमसब पर हावी होकर नींद तक ले गयी, पता नहीं चला।
-द्वितीय दिवस-
सुबह तड़के उठकर स्नान ध्यान पश्चात साढ़े छह बजे हम सब ने *180 किमी* दूर पोखरा की तरफ कूच किया। होटल के मैनेजर अमृत जी ने आश्वस्त किया कि हमारे पोखरा पहुंचने तक वहां भी एक अच्छे होटल की व्यवस्था की सूचना हम तक आ जायेगी। हाइवे पर ही पेट्रोल पंप से गाड़ी का टैंक फुल कराया। आप भी कभी जाएं तो *पेट्रोल नेपाल से ही ले*। कीमत नेपाली 99 रुपये थी, मल्लब लगभग 60 भारतीय रुपये। *भारत से लगभग 13 रुपये सस्ता*। बुटवल की तरफ बढ़ते ही सड़क के दोनों किनारों की प्राकृतिक छटा ने मन मोहना प्रारम्भ कर दिया।
पहाड़ों के बीच बलखाती सड़कें, हरे पेड़ों से ढके पहाड़ों से गलबहियां करते काले-सफेद बादल, एक तरफ रोमांचित करती गहरी खाई, सैकड़ों फिट नीचे बहती नदी की कल-कल ध्वनि, पहाड़ों से लिपटकर नीचे गिरते झरने, उमंग जी की सधी हुई ड्राइविंग और गाड़ी में बजते बेहतरीन बॉलीवुड गाने। मल्लब   शानदार, जबरजस्त, जिन्दाबाद।।।।
लेकिन एक अनुभव साझा करना चाहूंगा कभी भी पहाड़ी रास्तों के मनमोहक छटाओं के वशीभूत होकर दाएं-बाएं नजारे देखने का अति प्रयास न करें। जितना सम्भव हो आंखों की पुतलियों को सीधी दिशा में रखने का प्रयास करें। अन्यथा जी मचलाना, उल्टी आदि की दिक्कत हो जाएगी। जैसा कि हमारे विवेक जी के संग हुआ। फिर तो pan40 और evomine का ही सहारा लेना पड़ेगा। रुकते-रुकाते, चाय-पानी करते, फोटू-शोटू लेते हुए जाइये। जहां ज्यादा अच्छा लगे रुक कर अनुभव करें प्रकृति की चित्रकारी को। हमने भी यही किया। दोपहर का एक बजा और हम सब पोखरा में थे।
बताते चलें कि *पोखरा* मुख्यतः दो भागों *डैमसाइड* और *लेकसाइड* में बंटा है। पहले डैमसाइड ही पड़ेगा। लेकिन किसी जमाने का समृद्ध डैमसाइड अब इतना रुचिकर नहीं रह। तो हम सब लेकसाइड की ओर बढ़ चले। थोड़ी ही देर में अमृत जी के सम्पर्की सरोज जी आये और हमे अपने *होटल सुईट इन* मे ले गए। आलीशान होटल और शानदार कमरा। दो क्वीन साइज डबल बेड, टीवी, सोफे आदि से सजा हुआ बेहतरीन कमरा हम चारों के लिये सर्वथा उपयुक्त था। मूल्य तय हुआ *3500 रुपए नेपाली* प्रतिदिन की दर से।
दोपहर का खाना माया रेस्टोरेंट में करके हम सब थकान मिटाने होटल के कमरे में आ गए। शाम को तरोताजा होकर मार्किट घूमने निकल गए। एक तरफ विशालकाय फेवा लेक और उसके सामने बेहतरीन मार्किट। सड़क पर घूमते बिंदास विदेशी सैलानी। कुल मिलाकर समय पंख लगाकर कैसे उड़ता है, स्पष्ट महसूस हुआ। अबकी माया रेस्टोरेंट की दूसरी ब्रांच में खाना खाया और वापस कमरे पर आ गए।
अब तक तो समझ चुके थे कि भोजन में आटे की रोटी मिलना काफी मुश्किल था। फ्लोर मिल का आटा मैदे जैसा ही फील देता रहा। हाँ, मांसाहार और मदिरा की उपलब्धता प्रचुरता में थी। चूंकि ट्रिप लक्जिरियस करनी थी अतः भोजन आदि के लिये खूबसूरत एंबिएंस वाले रेस्टोरेंट ही तलाशते रहे। एक बात और बता दूं आजकल की इन्टरनेट की दुनिया की आत्मा हर रेस्टोरेंट/होटल में थी। मल्लब ऑर्डर देने के पहले हम सब wifi का पासवर्ड पूछते थे। खैर...अगला कार्यक्रम सूर्योदय दर्शन का था अतः जल्दी ही हम सब बिस्तर में घुस गए। लेकिन कमबख्त नींद,,,हमेशा की तरह देर रात में ही आयी।
-तृतीय दिवस-
सुबह 4.45 बजे ही *सूर्योदय* देखने के रोमांच को मन में लिये विवेक जी की मारुति बलीनो में बैठ हम सब *सारँगकोट* की तरफ बढ़ चले। पूर्व की ही भांति *गूगल मैप का नेविगेशन* ही हम सबका पथ प्रदर्शन कर रहा था। टेढ़े मेढ़े रास्तों से होते हुए 11 किमी की दूरी तय कर *आधे घण्टे* में हम 60 रुपये नेपाली प्रतिव्यक्ति की दर से प्रवेश शुल्क देकर सारँगकोट पहुंचे। अंधेरा ही था अभी। पहली बार *बादलों के ऊपर* खुद को पाकर अजब सा रोमांच हो रहा था। सबने चाय पी, कुछ फोटोग्राफी के बाद व्यू पॉइंट तक पहुंचने के लिये सीढियां चढ़ना प्रारम्भ किया। ऐसे किसी भी शारीरिक टास्क में हमारे डॉक्टर साहब शरद अवस्थी जी की मनोदशा देखने लायक हुआ करती थी। खैर,,,
लगभग सौ सीधी सीढियां चढ़ हम पोखरा के *उच्चतम बिंदु* पर थे। बस प्रतीक्षा थी भुवन भास्कर के उदित होने की। अचानक दायीं तरफ का आकाश लाल होना प्रारम्भ हुआ। सबकी नजरें उधर टिकी हीं थी कि बाईं तरफ बादलों की ओट से *अन्नपूर्णा पहाड़ियों* की बर्फ से लदी श्वेत श्रेणियां प्रकट होने लगी। सूर्य की किरण पड़ने से सफेद चोटियां सुनहली होने लगी। एक के बाद एक धीरे धीरे *पर्वत श्रंखलाओं का उदय...अहा, अद्भुत अप्रतिम नजारा*। जो आंखों से दिख रहा था उसे कैमरे की कृत्रिम नेत्रों में कैद करना असंभव था फिर भी घण्टे भर फोटोग्राफी का प्रयास करते रहे हम सब। हमारे डॉक्टर साहब की थकान तो मानो छू मन्तर हो गयी। मन तो नहीं हो रहा था फिर भी उन नजारों को मन मस्तिष्क में बसा हम सबने वापस चलने का निर्णय किया।
होटल पहुंच कर स्नान जलपान पश्चात अब बारी थी अगले नजारों की।
इस क्रम में डैमसाइड की तरफ निकले और पहुंचना हुआ डेविस फॉल पे। बताते चले कि वर्षो पूर्व पर्यटन की दृष्टि से आये डेविस दम्पति की दुर्घटनावश वहां हुई मृत्यु के कारण इस पाताल छाँगो का नाम डेविस फॉल किया गया। रोमांचित कर देने के लिये उसकी आवाज ही काफी थी। उस फॉल के अद्भुत नजारे को अनुभव करने का यही वर्षा के बाद का सर्वाधिक उपयुक्त समय था। शायद गर्मियों में ऐसा अनुभव न हो पाए। सैकड़ों फिट नीचे दर्रे में गिरने की उसकी गति इतनी तीव्र थी कि टकराकर वापस उसकी बूंदे ऊपर के वातावरण में बारिश होने का आभास कराती थी। पता चला कि इसकी धारा ही सड़क की दूसरी तरफ स्थित गुप्तेश्वर महादेव के नीचे बने एक कुंड तक जाती हैं, जहां जाना सम्भव है। मन अति रोमांचित हुआ और हम सब गुप्तेश्वर महादेव पहुंचे। लेकिन चूंकि बारिश में गुप्तेश्वर महादेव कन्दरा का निचला हिस्सा जलमग्न हो जाता है तो वहां तक जाने की अनुमति नही थी। मन मसोस कर रह गए हम। तभी टिकट काउंटर पे बताया गया कि कल से कन्दरा पूरी तरह से खोल दी जाएगी। हम सबने त्वरित निर्णय किया कि अब कल ही गुप्तेश्वर महादेव और उसके नीचे डेविस फॉल से बने कुंड के दर्शन किये जायेंगे। अब हम सब उसी सड़क पर आगे वर्ल्ड पीस पगोडा देखने के लिये आगे बढ़े। कार पार्किंग करते ही सिर के ठीक ऊपर 180° पर वह जापानियों का स्थित बौद्घ धर्मस्थल दिखा। ऊंचाई और सीढ़ियों की संख्या के अनुमान से ही हिम्मत डोलने लगी। तभी आश्चर्यजनक तरीके से डॉक्टर साहब ने हिम्मत बंधाई और हम सबने चढ़ाई प्रारम्भ की। लगभग 450 सीढ़ियों को चढ़कर हम उस शांत सुरम्य बौद्ध स्थल पर पहुंचे। वहां की शांति और नीचे फैले खूबसूरत पोखरा की छवि अवर्णनीय है।
वापस आकर रास्ते में पंजाबी रेस्टोरेंट में खाना खाया और होटल के कमरे में निढाल होकर पड़ गए।
पुनः शाम के पांच बजे हम सब निकले। अबकी लक्ष्य था, पोखरा की आत्मा विशालकाय फेवा लेक में नौका विहार का।  टिकट काउंटर पर सैलानियों की भीड़ देख प्रतीक्षा करने का मन न हुआ। वापस मार्किट की तरफ लौटने लगे। रास्ते में कई और स्थान दिखे जहां से नौकाएं मिलती हैं। एक जगह रुक कर देखा तो नौकाएं उपलब्ध थी। फिर क्या था लाइफ जैकेट्स पहन हम सभी एक छोटी सी नौका पर सवार हो गए। शुल्क लगा 540 नेपाली मुद्रा। उस विशालकाय झील में छोटी सी नौका में विहार का भयमिश्रित जो रोमांच था उसे मैं शब्दों में लिख नहीं सकता। डॉक्टर साहब की स्थिति अति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में थी। नौका विहार के उस खूबसूरत अनुभव को कैमरे में कैद करते रहे हम सब, सिवाय डॉक्टर साहब के। बीच झील में मां दुर्गा का अद्भुत ताल बराही मन्दिर था। उनके दर्शनोपरांत नाव वापस किनारे पर लगी लेकिन उस एक घण्टे में हमारे डॉक्टर साहब की स्थिति देखने लायक थी। वैसे अगर आपके साथ पर्याप्त लोगों की संख्या हो तो 1200 नेपाली रुपये की दर से पैदल वाली बड़ी नौका लेना अधिक श्रेयष्कर होगा। हम सबसे यही चूक हुई। खैर...
    शनैः शनैः अंधेरा होने लगा और पोखरा जगने लगा। असल में दिन था दशहरे का और नेपाल में दशहरा बहुत ही उल्लास से मनाते हैं। स्पष्ट करता चलूं कि उल्लास से आशय रावण वध, रामलीला आदि से नहीं वरन नाच-गाने से भरी हुई न्यू ईयर ईव जैसे माहौल से है। हम भी माहौल में ढलने लगे। ओजोन पब और बिजी बी रेस्टोरेंट के लाइव म्यूजिक पर डांस फ्लोर पर थिरकने का प्रथम अनुभव मिला। पूरा पोखरा और विदेशी सैलानी अजब से उल्लास में रंगे हुए थे। देर रात तक धमाचौकड़ी कर हम सब होटल वापस आ गए।

-चतुर्थ दिवस-
पिछले दिवस की थकान ने उठते-उठते सुबह के आठ बजा दिए। होटल मैनेजर सरोज जी से हमने और विवेक जी ने *पैराग्लाइडिंग* की जानकारी ली। लेकिन दशहरे के कारण क्षेत्रीय निवासियों की छुट्टी और सैलानियों की संख्या के कारण सामान्य दर पर ग्लाइडर का उपलब्ध होना सम्भव नही हो पाया। *सामान्यतया 6000 नेपाली मुद्रा में मिलने वाले ग्लाइडर की माँग 11000 की थी*। अतः विचार बदलना पड़ा। फिर हम सबने सरोज जी के कहे के अनुसार *खोजी यायावरी* के क्रम में सेती नदी में स्नान का मन बनाया।
उमंग जी रात की थकान से उबर न पाए थे तो उन्हें कमरे में सोता हुआ छोड़कर हम तीन *गूगल मैप के सहारे* गाड़ी लेकर नदी के उचित स्थान की खोज में निकल पड़े। कार *पोखरा-बागलुंग हाइवे* पर दौड़ने लगी। दाहिनी तरफ गहराई में अद्भुत सेती नदी साथ-साथ थी और मेरी निगाहें गूगल मैप और बाईं तरफ स्नान की मंशा से किसी उचित फॉल या स्थान की खोज में। कुछ फॉल मिले लेकिन कार किसी चुम्बकीय शक्ति के वशीभूत हो *फ़ेदी की तरफ* बढ़ती जा रही थी। फ़ेदी से लगभग पांच किमी पहले बाईं तरफ नदी की एक धारा सड़क के साथ साथ बहती दिखने लगी। उचित स्थान देख कार बाईं तरफ मोड़ दी गयी और 200 मीटर चल हमसब नदी तक पहुंच गए। बगल में ऊंचे ऊंचे पहाड़, कल-कल करती नदी के शीतल स्वच्छ जल में घण्टे भर नहाने से सारी थकान काफूर हो गयी।
अब वापसी में गूगल मैप ने बताया कि *बैट केव, महेंद्रा केव, गोरखा म्यूजियम* देखे जा सकते हैं। चूंकि यह सभी स्थान उमंग जी पूर्व में देख चुके हैं अतः हम सबने तय किया कि वापसी में यह सारे स्थल देखते हुए ही जायेंगे।
दोनों केव्स का अनुभव शानदार रहा। दोनों केव्स में *80 नेपाली रुपये प्रति व्यक्ति की दर* से प्रवेश शुल्क लगा। छतों और दीवारों से टपकते पानी के कारण इन सुरंगों में चलने हेतु सावधानी बरतना आवश्यक है। महेंद्रा केव्स अपेक्षाकृत अधिक चौड़ी थी। नीचे रिद्धि, सिद्धि और सिद्धविनायक जी का मंदिर है। *बैट केव* में तो इतना अंधेरा कि *एलईडी लैम्प* की रोशनी के बगैर जाना सम्भव नहीं। अंधेरा और बैट्स जनित दुर्गंध से दो चार होना पड़ता है। निकास द्वार इतना सँकरा कि भीड़ के मद्देनजर यू टर्न लेकर प्रवेश द्वार से ही वापस आना पड़ा।
गोरखा म्यूजियम के बगल में ही *सेती रिवर स्थल* बनाया गया है। *पचास रुपये नेपाली* प्रति व्यक्ति का प्रवेश शुल्क और अंदर सैकड़ों फीट नीचे बहती नदी और ऊपर बनाई गई *10 फिट गहरी कृत्रिम कैनाल* में उस नदी का प्रवाह दर्शनीय है। दोपहर के दो बज चुके थे। होटल के पास ही झील के सामने बने *फेवा लेक रेस्टोरेंट* में उमंग जी हम सबकी प्रतीक्षा कर रहे थे। सबने खाना खाया। पोखरा में मिले अब तक के किसी भी रेस्तरां से यह *सर्वश्रेष्ठ* था। लजीज *शाकाहारी थाली* का लुत्फ उठा हम सब वापस होटल आ गए।
शाम को तैयार हो हम सब *गुप्तेश्वर महादेव* के दर्शन हेतु निकले। मन का रोमांच चरम पर था। एक दिन पूर्व से ही तरह तरह के अनुमान लगा रहे थे। *प्रवेश शुल्क था 100 रुपये नेपाली*। डैमसाइड पर डेविस फॉल के सामने है यह कन्दरा। दक्षिण एशिया की सबसे गहरी कन्दरा है ये। कन्दरा के *मध्य में ही गुप्तेश्वर महादेव स्थित हैं*। मन्दिर के पास फोटोग्राफी करना मना है। महादेव के दर्शन करके हम रोमांच के सजीव दर्शन करने नीचे उतरने लगे। जहां वो अद्भुत कुंड था। मेरे अनुमान से 50 फीट नीचे तो होगा ही, ज्यादा भी हो सकता है। हम सब कुंड तक पहुंचे। सामने दूर दर्रे से उसी डेविस फॉल से आती हुई भीषण जलधारा के दर्शन हुए जो एक दिन पूर्व हमने देखा था। सामने हाहाकार मचाती हुई जलधारा और बगल में शांत जलकुंड। कैमरे की कृत्रिम आंखें फिर से एक बार हथियार डाल चुकी थी। समझना मुश्किल था कि यहां से यह पानी पाताल में कहाँ चला जा रहा है, कहाँ गुप्त हो गया।
बाहर निकलते निकलते अंधेरा होना लगा।
शाम को बरसते पानी में मार्किट घूमते घामते फिर बिजी बी रेस्टोरेंट पहुंचकर लाइव म्यूजिक का आनन्द लिया। और हां, आज नहीं नाचे हम। अगले दिन तड़के वापसी करनी थी तो समय से हम सब वापस कमरे में आ गए।
लेकिन हमें क्या पता था कि अगले दिन की यात्रा (वापसी यात्रा) हेतु ईश्वर रोमांच की नई पटकथा लिख रहा था।
          -पंचम/अंतिम दिवस-
     रोमांचक यात्रा का रोमांचक अंत
सुबह तैयार होकर होटल की औपचारिकताएं पूरी करते करते 7.30 बज गए। निकलते समय अचानक उमंग जी ने आवाज लगाई कि छत पर आइये, कुछ अद्भुत दिखाते हैं। हम भागते हुए छत पर पहुंचे तो एक तरफ वही अन्नपूर्णा पहाड़ियों की रेंज पुनः दिखी। कुछेक फोटू-शोटू ले हम सब नीचे आये।
हम सबने होटल मैनेजर सरोज जी से इस वादे संग विदा ली कि पुनः शीघ्र आएंगे, पैराग्लाइडिंग जो करनी है अभी।
पोखरा की हसीं वादियों को अलविदा कहते हुए हमारी कार नीचे की तरफ ढलान पर चलने लगी। योजना थी कि बुटवल में लंच और भैरहवाँ में कुछ देर विश्रामोपरांत कानपुर वापसी करनी है। *लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। इस रोमांचक यात्रा के रोमांचक अंत की पटकथा भी ईश्वर लिख चुका था*। भैरहवाँ से 45 किमी पूर्व ही गाड़ियों को रोका जाने लगा। पता चला कि आगे 12-15 किमी पर तगड़ा *लैंड स्लाइड* हुआ है। राहत/बचाव कार्य प्रारंभ है। लेकिन समय लगेगा। प्रारम्भ में तो हम सबने इसे सामान्य तरीके से लिया किन्तु जैसे ही घड़ी ने एक के बाद एक घण्टे बजाने शुरू किए मन में आशंकाओं के बादल गहराने लगे। कुछ लोग कहने लगे कि कल से रास्ता बंद है, कुछ बोले आज नही निकल पाओगे, कुछ का कहना कि बाइक सवार शायद निकल पाएं आज। दुविधा तब और बढ़ी जब पचासों गाड़ियां वापस होने लगीं। हालांकि मैं अपने भतीजे संजय शुक्ल जी से बराबर सम्पर्क में था लेकिन तात्कालिक घटनाक्रम विचलित ही कर रहे थे। सैलानियों की भीषण भीड़ देखते हुए आस पास के होटल्स में कमरा मिलने की संभावना भी न्यून होती जा रही थी। एक बार तो उमंग जी भी बोले की वापस तानसेन तक चलते हैं, अभी कमरे मिल जायेंगे। लेकिन पंचो की राय न बनी। शाम के साढ़े पांच बज गए, अंधेरा बढ़ने लगा। हम सबने गाड़ी में रात बिताने की सबसे बुरी अवस्था के लिये भी स्वयं को तैयार कर लिया। आनन्द को भेजकर पानी की पांच-छह बोतलों समेत बिस्किट नमकीन आदि की व्यवस्था करवा ली। आसपास की दुकानों से कुछ और मिलने की संभावना भी न थी। पीछे वाली बस भी बैक होने लगी लेकिन मैं फिर भी अपने भतीजे की सूचना पर आश्वस्त था कि अंकल परेशान मत होइए, कार्य प्रगति पर है, दुबारा लैंड स्लाइड हो जाने के कारण समय लग रहा है। अचानक रास्ता खोले जाने की अनुमति मिली। उमंग जी ने तेजी से गाड़ी बढ़ाई और सैकड़ों कारों का काफिला चल निकला। कुछ दूर चलकर फिर से ट्रैफिक रुक गया, फिर से मन में वही सब विचार उमड़ने लगे। सभी गाड़ियों की हेडलाइट्स जल चुकी थी। पहाड़ पर गाड़ी की हेडलाइट जला कर ड्राइविंग का उमंग जी का पहला अनुभव था। लेकिन थोड़ी देर में ही पुनः गाड़ियां चल निकली। कुछ देर में हम उस लैंड स्लाइड वाले स्थान को पार कर रहे थे। सड़क पर सहायता दल, बुलडोजर और जेसीबी तैनात थी। बाईं तरफ मिट्टी का दरकता हुआ पहाड़ था, बूंदाबांदी हो रही थी। उस लैंड स्लाइड से प्रभावित हुआ ट्रक और एक कार घटनास्थल पर ही थे। कार की हालत देखकर कहना मुश्किल था कि कोई भी सवार जीवित बचा होगा। पहाड़ देख कर ही लग रहा था कि अब गिरा तो तब गिरा। *भतीजे ने पूर्व में ही सचेत किया था कि प्रभावित स्थल को तेजी से पार कर लीजियेगा* अतः उमंग जी तेजी से कार चलाते हुए बुटवल की ओर बढ़ते रहे। आठ बजते बजते हम सब भैरहवाँ पहुंच गए। *होटल लाकुल* में हम सबकी रुकने की व्यवस्था पहले ही संजय जी ने कर दी थी। कुछ देर पीठ सीधी करने के बाद हम सबको लेकर रात्रि भोजन हेतु संजय जी *भैरहवाँ के सर्वश्रेष्ठ तन्दूर रेस्टोरेंट* में ले गए। लजीज खाना खाकर दिन भर की थकान जाती रही। *पूरी यात्रा में सबसे लजीज भोजन* यहीं मिला। वापस होटल में आ गए। सुबह 6.30 बजे बॉर्डर क्रॉस करने का तय करके सो गए।
सुबह 7 बजे बॉर्डर क्रॉस किया और दोपहर 1 बजे कानपुर अपने निवास स्थान पर पहुंच गए। लगभग *1400 किमी* की दूरी हेतु लगभग *92 लीटर पेट्रोल (लगभग ₹ 6000 )* व्यय हुआ।
पोखरा तो पीछे छूट चुका था लेकिन एक अद्भुत अविस्मरणीय यात्रा सदा के लिये मानस पटल पर अंकित हो चुकी थी।
धन्यवाद पोखरा 😊😊

                            ✍ डॉ पवन मिश्र
होटल रेडसन, भैरहवाँ

अन्नपूर्णा पर्वत श्रंखला

सूर्योदय के समय हमारे सहयात्री

सारँगकोट से हम

वर्ल्ड पीस पगोड़ा जाते हुए

नौका विहार

नदी स्नान

बैट्स केव

महेंद्रा केव


अपने मित्रों संग


बरसते पानी में पोखरा मार्किट घूमते

बादलों के ऊपर से एक क्लिक

सूर्योदय

पर्वत शिखर पर सूर्यरश्मियाँ


अन्नपूर्णा पर्वतमाला

डेविस फॉल

वर्ल्ड पीस पगोड़ा, पोखरा

पोखरा, मेरे कैमरे की नजर से

होटल ग्रैंड, पोखरा

ओजोन पब, पोखरा

बिजी बी रेस्टोरेंट, पोखरा

गुप्तेश्वर महादेव केव



अलविदा पोखरा

पालपा के निकट निर्माणाधीन मन्दिर



भतीजे संजय शुक्ल के संग
ताल बराही मन्दिर
फेवा लेक

गुप्तेश्वर महादेव प्रवेश द्वार