Monday, 21 August 2017

नवगीत- तब राष्ट्र का निर्माण हो

एकात्म मानववाद की,
परिकल्पना का मान हो।
अंग्रेजियत की भीड़ में,
हिंदी का जब सम्मान हो।
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

वंचितों की भीड़ में जो,
अंत में बेबस खड़ा है।
वस्त्र वंचित देह भीतर,
भूख लेकर जो पड़ा है।।
बजबजाती नालियों से,
रात दिन जो जूझता है।
अश्रुपूरित नैन में जो,
स्वप्न लेकर घूमता है।।
उस मनुज का उत्थान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

चीथड़ों से तन लपेटे,
वक्ष पे नवजात बाँधे।
अनवरत जो चल रही है,
पीठ पर संसार साधे।।
जीवन थपेड़ों से यहाँ,
किंचित नहीं भयभीत जो।
नित कंटकों से लड़ रही,
साहस के गाती गीत जो।।
उस नार का सम्मान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

        ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 20 August 2017

ग़ज़ल- अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं


चलो तूफान से लड़ने का कुछ जज़्बा दिखाते हैं।
कि अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं।।

मेरे जुगनू के आगे क्या तेरी औकात है सूरज।
ये तब भी रोशनी देता अँधेरे जब चिढ़ाते हैं।।

नहीं परवाह मौजों की न तूफानों से घबराहट।
समंदर चीर कर यारों सफ़ीने हम चलाते हैं।।

न चल पाओगे मेरे साथ तुम इस राह पर हमदम।
*मुझे तो आजकल बेदारियों में ख़्वाब आते हैं।।*

फ़लक का चांद भी बेदम नजर आता है तब मुझको।
झुका कर वो कभी जब भी नज़र फिर से उठाते हैं।।

मेरे हाथों में आईना है ख़ंजर तो नहीं कोई।
भला फिर लोग क्यूँ इतना पवन से खौफ़ खाते हैं।।

                                  ✍ डॉ पवन मिश्र

*अहमद नदीम कासिमी साहब का मिसरा

Sunday, 6 August 2017

ग़ज़ल- मैं नहीं हूँ


तू ही तू दिख रहा है मैं नहीं हूँ।
ये सब कुछ ही तेरा है मैं नहीं हूँ।।

मेरे आईने में जो आजकल है।
यकीं मानो खुदा है मैं नहीं हूँ।।

उसी का ही कोई होगा करिश्मा।
*जो मुझमें बोलता है मैं नहीं हूँ*।।

चुरा कर दिल मेरा देखो जरा तो।
वो सबको बोलता है मैं नहीं हूँ।।

सुना लाखों हैं तेरी भीड़ में अब।
मुझे इतना पता है मैं नहीं हूँ।।

गलतफहमी उसे शायद कोई है।
जिसे वो ढूंढता है मैं नहीं हूँ।।

फ़दामत से उसे मंजिल मिली पर।
अकेला ही खड़ा है मैं नहीं हूँ।।

कचोटे है तुझे जो रात दिन वो।
तेरे दिल की सदा है मैं नहीं हूँ।।

           ✍ डॉ पवन मिश्र

फ़दामत= अन्याय, अनीति

*कबीर वारिस साहब का मिसरा

Sunday, 23 July 2017

कुण्डलिया- रम में बसते राम ?

*कुण्डलिया*

मदहोशी में श्वान को, रम में दिखते राम।
उसकी दूषित सोच है, कुत्सित सारे काम।।
कुत्सित सारे काम, अरे सुन रे ओ थेथर।
जरा पैग में देख, बोल दिखते पैगम्बर ?
सुनो पवन की बात, त्यागकर अब बेहोशी।
कुछ दिन की मेहमां, तुम्हारी ये मदहोशी।१।

जनता है सब देखती, इनके काले काम।
बड़े बड़े धूमिल हुए, लोकतंत्र यहि नाम।।
लोकतंत्र यहि नाम, चले ना कोई सिक्का।
जनता का विश्वास, तुरुप का होता इक्का।।
जितने नेता आज, हिंद हिन्दू के हन्ता।
उनको हरि का भजन, सिखायेगी ये जनता।२।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

Friday, 21 July 2017

ग़ज़ल- ये बारिश की बूंदें


ये बारिश की बूँदें सताती बहुत हैं।
न चाहूँ मैं फिर भी भिगाती बहुत हैं।।

ये गालों को छूके लबों पे थिरक के।
विरह वेदना को जगाती बहुत हैं।।

दबे पाँव सँग तेरी यादें भी आकर।
भिगाती बहुत हैं रुलाती बहुत हैं।।

फ़लक से ये गिरकर ज़मींदोज़ होतीं।
ये जीवन का दर्शन सिखाती बहुत हैं।।

हुईं जज़्ब मिट्टी में बारिश की बूँदें।
मगर फिर भी मुझको जलाती बहुत हैं।।

ज़मीं सींचती हैं फुहारें ये लेकिन।
टपकती छतों को चिढ़ाती बहुत हैं।।

                     ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 19 July 2017

ग़ज़ल- पिता


पसीना भी छुपाता है वो आंसू भी छुपाता है।
अरे वो बाप है जज़्बात कब खुल के जताता है।।

समंदर पार करने को वो बच्चों के लिये अपने।
कभी क़श्ती बनाता है कभी पतवार लाता है।।

परों पे अपने ढोता है वो नन्हें से परिंदे को।
लिये ख़्वाबों की नगरी में फ़लक के पार जाता है।।

उसे तूफ़ान बारिश कुछ नहीं दिखती मुहब्बत में।
थपेड़े सारे सह कर भी घरौंदा वो बनाता है।।

बहुत कम ज़र्फ़ है जो बाप को तकलीफ दे, लेकिन।
दुआओं में  कहां वालिद उसे भी भूल पाता है।।

कसीदे शान में उसकी मुझे पढ़ने की कूवत दे।
जो काँधे पे बिठा दुनिया का हर मेला घुमाता है।।

ज़मीं पे वो फरिश्ता है पवन की दीद में यारों।
खपा कर जिंदगी अपनी जो बच्चों को बनाता है।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 16 July 2017

ग़ज़ल- मेरे किरदार में वो है मेरे दिन रात में है


मेरे किरदार में वो है मेरे दिन रात में है।
याद कैसे न करूँ जज़्ब खयालात में है।।

मेरे आईने में इक अक़्स उभरने है लगा।
देख ये कैसा असर एक मुलाकात में है।।

लब पे मुस्कान लिये आ तो गया महफ़िल में।
*एक तूफ़ान सा लेकिन मेरे जज़्बात में है।।*

देगा फिर कौन जवाबों को मेरे, तू ही बता।
रहनुमा ही जो घिरा आज सवालात में है।।

बदहवासी में चरागों को बुझाने वाली।
ए हवा देख तो ले क्या मेरी औक़ात में है।।

                        ✍ डॉ पवन मिश्र

जज़्ब= समाया हुआ
*दाग देहलवी साहब का मिसरा