Sunday, 19 November 2017

ग़ज़ल- ले जाएंगे


इश्क़ की हर रस्म हमदम हम निभा ले जाएंगे।
गर नहीं अब्बा जो माने हम भगा ले जाएंगे।।

डेढ़ पसली के थे लेकिन इश्क़ के मारे थे हम।
सोच थी चौहान बन संयोगिता ले जाएंगे।।

चैन दिल का ले गए और खोपड़ी के बाल भी।
ज़र ज़मीं भी ले गए वो और क्या ले जाएंगे ?

ख्वाब आंखों से मिटा के आंसुओं से भर दिया।
हम बहे तो देख लेना सब बहा ले जाएंगे।।

जुगनुओं से जीतना जिनकी नहीं औकात में।
कैद कर सूरज को मेरे वो भला ले जाएंगे ?

जो बहुत उम्मीद लेकर रहनुमा के साथ हैं।
और कुछ चाहे न पाएं रायता ले जाएंगे।।

साठ सालों तक तिजोरी की हिफाजत दी जिन्हें।
क्या पता था एक दिन वो सब चुरा ले जाएंगे।।

                                   ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 12 November 2017

कहूँ लेखनी से कैसे मैं, लिखो आज श्रंगार

(सरसी छन्द आधारित रचना)

गली-गली अब घूम रहे हैं, देखो रंगे सियार।
अर्थ काम तक ही सीमित है, इनका हर व्यवहार।।
सोन चिरइया लूट रहे जब, माटी के गद्दार।
कहूँ लेखनी से कैसे मैं, लिखो आज श्रंगार ?

बिलख रहे हैं भूखे बालक, रोटी की ले चाह।
वंचित बचपन भटक रहा है, कौन दिखाये राह।।
चुभती है सीने में मेरे, उनकी करुण पुकार।
कहूँ लेखनी से कैसे मैं, लिखो आज श्रंगार ?

माली ही जब पोषित करता, सारे खर-पतवार।
किससे जाकर पुष्प कहें तब, मन पर क्या है भार ?
अनदेखा कैसे मैं कर दूँ, काँटों का व्यभिचार।
कहूँ लेखनी से कैसे मैं, लिखो आज श्रंगार ?

नेताओं की कोरी बातें, झूठ मूठ बकवास।
नहीं इन्हें परवाह देश की, बस सत्ता की प्यास।।
जब शोषित जनता का स्वर बन, करना है प्रतिकार।
कहूँ लेखनी से कैसे मैं, लिखो आज श्रंगार ?

                               ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 5 November 2017

ग़ज़ल- ख़्वाब बाकी है इक दीवाने का


वक्त आया नहीं है जाने का।
ख़्वाब बाकी है इक दीवाने का।।

तोड़कर घोंसला दीवाने का।
क्या भला हो गया जमाने का।।

आओ बैठो जरा करीब मेरे।
ख़्वाब देखा है घर बसाने का।।

तैरते तैरते कहां जाऊँ।
अब इरादा है डूब जाने का।।

रूठ के अब जुदा न होना तुम।
हौसला अब नहीं मनाने का।।

मोल कुछ भी नहीं मिलेगा पवन।
आंसुओं को यहां बहाने का।।
           
             ✍ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 17 October 2017

ग़ज़ल- वो ताजिर है, तिजारत ढूँढ लेता है


वो ताजिर है, तिज़ारत ढूँढ लेता है।
वो मतलब की सियासत ढूँढ लेता है।।
ताजिर= व्यापारी     तिजारत= व्यापार

जली झुग्गी की बिखरी राख में देखो।
वो वोटों की अमानत ढूँढ लेता है।।

बड़ा शातिर है देखो रहनुमा यारों।
वो लाशों में सियासत ढूँढ लेता है।।

लगा दे लाख पहरे ये जमाना पर।
जवां दिल अपनी आफ़त ढूँढ लेता है।।

ज़रा सी ज़िन्दगी में आदमी देखो।
बिना मतलब अदावत ढूँढ लेता है।।

खुदा की रहमतों पे है यकीं जिसको।
वबा में भी वो राहत ढूँढ लेता है।।
वबा= महामारी

                ✍ डॉ पवन मिश्र

ग़ज़ल- ये समझ लो जो हुआ अच्छा हुआ


क्या कहें किससे कहें कैसा हुआ।
ये समझ लो जो हुआ अच्छा हुआ।।

कौन सुन पायेगा अब मेरी सदा।
जब खुदा ही आज वो बहरा हुआ।।
सदा= आवाज

लाख वो इनकार करता है मगर।
अश्क़ में इक अक्स है उभरा हुआ।।

चाँद उतरा है या वो हैं बाम पर ?
आज मेरे दिल को फिर धोखा हुआ।।
बाम= छत

गर कज़ा ही है सदाकत जीस्त की।
जी रहा क्यूँ आदमी सहमा हुआ।।
कज़ा= मृत्यु,  सदाकत=सत्य,   जीस्त=जीवन

तीरगी को मुँह चिढ़ाने में पवन।
जुगनुओं से पूछ लो क्या क्या हुआ।।
तीरगी= अंधेरा
                  ✍ डॉ पवन मिश्र

Monday, 16 October 2017

ग़ज़ल- गुलों को सदा खार ने ही छला है


जमाने का दस्तूर ये ही रहा है।
गुलों को सदा खार ने ही छला है।।
खार= कांटा

बहुत कीमती है ये मोती सँभालो।
पलक पे जो आके तुम्हारी रुका है।।

जमाना क्या समझेगा अपनी मुहब्बत।
ये तुझको पता है ये मुझको पता है।।

खुदा से मिलेगा वो इंसान कैसे।
ज़माने की राहों में जो गुमशुदा है।।

उसी को सलामी है देती ये दुनिया।
यहाँ शख़्स तप के जो कुंदन बना है।।

मुकद्दर में जो था मिला है पवन को।
नहीं जिंदगी से कोई भी गिला है।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 15 October 2017

ग़ज़ल- तुम आ गए हो तो कोई जवाब दे जाओ


नहीं जो आब मिले तो सराब दे जाओ।
तुम आ गए हो तो कोई जवाब दे जाओ।।
आब= पानी    सराब= मृगतृष्णा

अभी न बात करो ज़ख्म की न आंसू की।
सुहाग रात है कोई गुलाब दे जाओ।।

बहुत अजीब हैं दस्तूर तेरी महफ़िल के।
मुझे भी रहना है कोई नक़ाब दे जाओ।।

कई दफ़ा वो मुझे अजनबी से लगते हैं।
समझ सकूँ उन्हें ऐसी किताब दे जाओ।।

अगर है जाना तुम्हे तो करो इनायत ये।
यहां जो खोया जो पाया हिसाब दे जाओ।।

ये माहताब भी ढलका हुआ सा लगता है।
*उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ*।।
माहताब= चन्द्रमा

कहाँ छुपी मेरी मंजिल किधर हैं राहें गुम।
ये तीरगी है घनी, आफ़ताब दे जाओ।।
तीरगी= अंधेरा    आफ़ताब=सूरज

जो लड़खड़ा के गिरूंगा तो थाम लेंगे वो।
सुनो हुजूर पवन को शराब दे जाओ।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

**बशीर बद्र साहब का मिसरा

Saturday, 14 October 2017

ग़ज़ल- अधूरी ख्वाहिशों का बोझ


अधूरी ख्वाहिशों का बोझ मेरे दिल पे है अब तक।
कि समझेगा वो बातें कब जो ठहरी हैं मेरे लब तक।।

मनाकर हार बैठे हैं लो अब तकदीर पर छोड़ा।
चलो अब देखते हैं आप रूठोगे भला कब तक।।

खुदा कब तक न आएगा हमारे सामने देखें।
कि हम भी दर न छोड़ेंगे दिखेगा वो नहीं जब तक।।

इबादत तब मेरी होगी मुकम्मल इस ज़माने में।
पहुंच जाएँगी जब दिल की सदायें मेरे उस रब तक।।

तुम्हे जाना है तो जाओ रहेगी याद इस दिल में।
रहेंगी मुन्तज़िर आँखे हमारी आखिरी शब तक।।

रगों में खून जब तक और धड़कन दिल की बाकी है।
भरोसा हौसलों का ही करेगा ये पवन तब तक।।

                                    ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 11 October 2017

ग़ज़ल- तुम्हारे बिन कहीं मधुबन नहीं है


तुम्हारे बिन कहीं मधुबन नहीं है।
घटायें हैं मगर सावन नहीं है।।

गए हो छोड़कर जिस दिन से हमको।
ये दिल तो है मगर धड़कन नहीं है।।

गलतफहमी उसी को हो गयी कुछ।
मेरी उससे कोई अनबन नहीं है।।

सुकूँ की नींद आ जाये हमे बस।
सिवा इसके कोई उलझन नहीं है।।

अभी तो दूर है मंज़िल हमारी।
युँ थकने के लिये जीवन नहीं है।।

सपोलों दूर रहना इस पवन से।
तेरी खाला का ये चन्दन नहीं है।।

                 ✍ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 5 October 2017

यात्रा वृत्तांत- पोखरा (नेपाल) यात्रा

पोखरा (नेपाल) यात्रा- ए लक्जिरियस एन्ड एडवेंचरस ट्रिप
-प्रथम दिवस-
अचानक ही कुछ परम मित्रों संग इस दशहरे अपनी ही गाड़ी से पोखरा (नेपाल) घूमने का प्लान बना। तय कार्यक्रम के अनुसार सुबह 7.30 बजे कानपुर से रवाना हुए। *गूगल मैप* की सहायता से तय हुआ कि *कानपुर-लखनऊ-फैजाबाद-बस्ती-कैम्पियर गंज- फरेंदा होते हुए सोनौली बॉर्डर* पार करेंगे। आप सब भी इसी मार्ग का प्रयोग करें। गोरखपुर जाने की आवश्यकता नहीं है।
इस यात्रा को *डॉक्टर्स ट्रिप* का नाम दिया हमलोगों ने। मल्लब हम सब के सब डॉक्टर उपाधि धारक थे।
पहले आपको अपने सहयात्री/मित्रों का संक्षिप्त परिचय देता चलूं। आगे के संस्मरण में आसानी रहेगी।
सबसे पहले *डॉ उमंग गोयल जी*, आप कर्वी (चित्रकूट) में एक उच्च कोटि के विद्यालय का प्रबंधन और संचालन देखते हैं। विशुद्ध खोजी यायावर हैं। ड्राइविंग में आपका कोई सानी नहीं है। ड्राइवर के होते हुए भी स्वयं ही गाड़ी चलाते हैं। पूरी यात्रा में स्वयं ही गाड़ी चलाई।
दूसरे *डॉ विवेक यादव जी*, आप गणित विषय के प्राध्यापक हैं। कानपुर के जाने माने इंजीनियरिंग प्रतिष्ठानों में शिक्षण कार्य का अनुभव है आपको। एडवेन्चरस टूर और फ्रोटोग्राफी इनके शौक हैं।
तीसरे थे *डॉ शरद अवस्थी (डॉक्टर साहब)*। आप एक अनुभवी दन्त चिकित्सक हैं। कानपुर व फतेहपुर में अपनी सेवाएं देते हैं। मस्त मौला स्वभाव के हमारे डॉक्टर साहब। पंचो की राय को अपनी राय मानने वाले डॉक्टर साहब। यात्रा में इनके होने की भी एक अलग कहानी है। आप दो दिवसीय मेडिकल सेमिनार के लिये गोरखपुर गए थे। हमलोगों ने सेमिनार खत्म होते ही वहीं से आपको उठा लिया। बेचारे इत्ते सीधे की ज्यादा प्रतिरोध भी न कर सके।
इनके अलावा आनन्द भाई साथ थे। कहने को तो ड्राइवर लेकिन पूरी यात्रा में परछाई की तरह साथ रहे।
डॉक्टर साहब को रास्ते में से उठाते हुए हम सब दोपहर लगभग 3 बजे सोनौली-भैरहवाँ बॉर्डर पहुंचे।
मेरी बुआ जी चूंकि भैरहवाँ (नेपाल) में ही रहती हैं और मेरे दो भतीजे और दो भांजे नेपाल पुलिस में कार्यरत हैं इसलिये हमारे लिये किसी समस्या के होने की सम्भावना शून्य थी।
बॉर्डर पर पहुंचते ही कुछ देर में मेरे *बड़े भतीजे संजय शुक्ल* का आना हुआ। संजय जी नेपाल पुलिस में *वरिष्ठ सई (सब इंस्पेक्टर)* हैं। चूंकि हमे अपनी ही गाड़ी से आगे की यात्रा करनी थी तो सबसे पहले *भन्सार* बनवाया हमलोगों ने जोकि आप प्रवेश अनुमति पत्र जैसा समझ लें। *प्रतिदिन 453 रुपये (नेपाली)* की दर से भन्सार बना। इसके बाद संजय जी हमलोगों को लेकर पास के ही एक बेहतरीन *होटल रेड सन* गए। कमरा बुकिंग की औपचारिकता के बाद संजय ने इस वादे संग विदा ली कि वो अपने अनुज और हमारे छोटे भतीजे अंतिम शुक्ल को तुरंत हमतक भेजेगा क्योंकि अभी भी दो महत्वपूर्ण कार्य शेष थे एक तो *पहाड़ पर गाड़ी ले जाने हेतु एक अतिरिक्त परमिट* का बनवाना और दूसरा सम्पर्क साधन हेतु *लोकल सिम* की व्यवस्था का। कमरा बेहतरीन था। कितने का था, बताना मुश्किल होगा क्योंकि संजय जी की होटल मालिक से मित्रता के कारण हमें *निःशुल्क सेवा* प्रदान की गई। होटल के मैनेजर अमृत जी बहुत मिलनसार थे।
होटल के कमरे में हाथ-मुंह धोकर हम सबने पीठ सीधी की, चाय पी। तब तक हमारे छोटे भतीजे जो नेपाल पुलिस में ही हेड कांस्टेबल हैं, आ गए। अब लोकल नेपाली नम्बर था हमारे मोबाइल में। थोड़ी देर में हम सब निकले और परमिट बनवाया। शाम के छह बजे चुके थे अतः लुम्बिनी भ्रमण का विचार त्याग सबने मार्किट में ही घूमने का मन बनाया। तय हुआ कि मैं भतीजे संग जाकर बुआ जी, भैया-भाभी, दीदी आदि से मिल आऊं। तो अन्य लोगों को मार्किट में छोड़कर मैं भतीजे संग परिवार जनों से मिलने निकल पड़ा। सबसे मिलन के पश्चात छोटे भांजे (वो भी नेपाल पुलिस में) ने वापिस हमें *होटल रेड सन* छोड़ा। जहाँ होटल के *शानदार रेस्टोरेंट* में मेरे मित्र मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे।
कुछ समय वहीं के *कैसिनो, स्विमिंग पूल* आदि में समय बिताकर भोजन उपरांत कमरे में आ गए। तय हुआ कि सुबह जल्दी उठकर (जो कि हमारे डॉक्टर साहब के लिये अति दुष्कर था) पोखरा की तरफ कूच करना है। सब लोग बिस्तर में कैद थे। लेकिन पोखरा की रोमांचक यात्रा का पूर्वानुमान नींद में खलल डाल रहा थी। देर रात तक हम सब जगते रहे। योजनाएं बनती रहीं। लेकिन कब थकान हमसब पर हावी होकर नींद तक ले गयी, पता नहीं चला।
-द्वितीय दिवस-
सुबह तड़के उठकर स्नान ध्यान पश्चात साढ़े छह बजे हम सब ने *180 किमी* दूर पोखरा की तरफ कूच किया। होटल के मैनेजर अमृत जी ने आश्वस्त किया कि हमारे पोखरा पहुंचने तक वहां भी एक अच्छे होटल की व्यवस्था की सूचना हम तक आ जायेगी। हाइवे पर ही पेट्रोल पंप से गाड़ी का टैंक फुल कराया। आप भी कभी जाएं तो *पेट्रोल नेपाल से ही ले*। कीमत नेपाली 99 रुपये थी, मल्लब लगभग 60 भारतीय रुपये। *भारत से लगभग 13 रुपये सस्ता*। बुटवल की तरफ बढ़ते ही सड़क के दोनों किनारों की प्राकृतिक छटा ने मन मोहना प्रारम्भ कर दिया।
पहाड़ों के बीच बलखाती सड़कें, हरे पेड़ों से ढके पहाड़ों से गलबहियां करते काले-सफेद बादल, एक तरफ रोमांचित करती गहरी खाई, सैकड़ों फिट नीचे बहती नदी की कल-कल ध्वनि, पहाड़ों से लिपटकर नीचे गिरते झरने, उमंग जी की सधी हुई ड्राइविंग और गाड़ी में बजते बेहतरीन बॉलीवुड गाने। मल्लब   शानदार, जबरजस्त, जिन्दाबाद।।।।
लेकिन एक अनुभव साझा करना चाहूंगा कभी भी पहाड़ी रास्तों के मनमोहक छटाओं के वशीभूत होकर दाएं-बाएं नजारे देखने का अति प्रयास न करें। जितना सम्भव हो आंखों की पुतलियों को सीधी दिशा में रखने का प्रयास करें। अन्यथा जी मचलाना, उल्टी आदि की दिक्कत हो जाएगी। जैसा कि हमारे विवेक जी के संग हुआ। फिर तो pan40 और evomine का ही सहारा लेना पड़ेगा। रुकते-रुकाते, चाय-पानी करते, फोटू-शोटू लेते हुए जाइये। जहां ज्यादा अच्छा लगे रुक कर अनुभव करें प्रकृति की चित्रकारी को। हमने भी यही किया। दोपहर का एक बजा और हम सब पोखरा में थे।
बताते चलें कि *पोखरा* मुख्यतः दो भागों *डैमसाइड* और *लेकसाइड* में बंटा है। पहले डैमसाइड ही पड़ेगा। लेकिन किसी जमाने का समृद्ध डैमसाइड अब इतना रुचिकर नहीं रह। तो हम सब लेकसाइड की ओर बढ़ चले। थोड़ी ही देर में अमृत जी के सम्पर्की सरोज जी आये और हमे अपने *होटल सुईट इन* मे ले गए। आलीशान होटल और शानदार कमरा। दो क्वीन साइज डबल बेड, टीवी, सोफे आदि से सजा हुआ बेहतरीन कमरा हम चारों के लिये सर्वथा उपयुक्त था। मूल्य तय हुआ *3500 रुपए नेपाली* प्रतिदिन की दर से।
दोपहर का खाना माया रेस्टोरेंट में करके हम सब थकान मिटाने होटल के कमरे में आ गए। शाम को तरोताजा होकर मार्किट घूमने निकल गए। एक तरफ विशालकाय फेवा लेक और उसके सामने बेहतरीन मार्किट। सड़क पर घूमते बिंदास विदेशी सैलानी। कुल मिलाकर समय पंख लगाकर कैसे उड़ता है, स्पष्ट महसूस हुआ। अबकी माया रेस्टोरेंट की दूसरी ब्रांच में खाना खाया और वापस कमरे पर आ गए।
अब तक तो समझ चुके थे कि भोजन में आटे की रोटी मिलना काफी मुश्किल था। फ्लोर मिल का आटा मैदे जैसा ही फील देता रहा। हाँ, मांसाहार और मदिरा की उपलब्धता प्रचुरता में थी। चूंकि ट्रिप लक्जिरियस करनी थी अतः भोजन आदि के लिये खूबसूरत एंबिएंस वाले रेस्टोरेंट ही तलाशते रहे। एक बात और बता दूं आजकल की इन्टरनेट की दुनिया की आत्मा हर रेस्टोरेंट/होटल में थी। मल्लब ऑर्डर देने के पहले हम सब wifi का पासवर्ड पूछते थे। खैर...अगला कार्यक्रम सूर्योदय दर्शन का था अतः जल्दी ही हम सब बिस्तर में घुस गए। लेकिन कमबख्त नींद,,,हमेशा की तरह देर रात में ही आयी।
-तृतीय दिवस-
सुबह 4.45 बजे ही *सूर्योदय* देखने के रोमांच को मन में लिये विवेक जी की मारुति बलीनो में बैठ हम सब *सारँगकोट* की तरफ बढ़ चले। पूर्व की ही भांति *गूगल मैप का नेविगेशन* ही हम सबका पथ प्रदर्शन कर रहा था। टेढ़े मेढ़े रास्तों से होते हुए 11 किमी की दूरी तय कर *आधे घण्टे* में हम 60 रुपये नेपाली प्रतिव्यक्ति की दर से प्रवेश शुल्क देकर सारँगकोट पहुंचे। अंधेरा ही था अभी। पहली बार *बादलों के ऊपर* खुद को पाकर अजब सा रोमांच हो रहा था। सबने चाय पी, कुछ फोटोग्राफी के बाद व्यू पॉइंट तक पहुंचने के लिये सीढियां चढ़ना प्रारम्भ किया। ऐसे किसी भी शारीरिक टास्क में हमारे डॉक्टर साहब शरद अवस्थी जी की मनोदशा देखने लायक हुआ करती थी। खैर,,,
लगभग सौ सीधी सीढियां चढ़ हम पोखरा के *उच्चतम बिंदु* पर थे। बस प्रतीक्षा थी भुवन भास्कर के उदित होने की। अचानक दायीं तरफ का आकाश लाल होना प्रारम्भ हुआ। सबकी नजरें उधर टिकी हीं थी कि बाईं तरफ बादलों की ओट से *अन्नपूर्णा पहाड़ियों* की बर्फ से लदी श्वेत श्रेणियां प्रकट होने लगी। सूर्य की किरण पड़ने से सफेद चोटियां सुनहली होने लगी। एक के बाद एक धीरे धीरे *पर्वत श्रंखलाओं का उदय...अहा, अद्भुत अप्रतिम नजारा*। जो आंखों से दिख रहा था उसे कैमरे की कृत्रिम नेत्रों में कैद करना असंभव था फिर भी घण्टे भर फोटोग्राफी का प्रयास करते रहे हम सब। हमारे डॉक्टर साहब की थकान तो मानो छू मन्तर हो गयी। मन तो नहीं हो रहा था फिर भी उन नजारों को मन मस्तिष्क में बसा हम सबने वापस चलने का निर्णय किया।
होटल पहुंच कर स्नान जलपान पश्चात अब बारी थी अगले नजारों की।
इस क्रम में डैमसाइड की तरफ निकले और पहुंचना हुआ डेविस फॉल पे। बताते चले कि वर्षो पूर्व पर्यटन की दृष्टि से आये डेविस दम्पति की दुर्घटनावश वहां हुई मृत्यु के कारण इस पाताल छाँगो का नाम डेविस फॉल किया गया। रोमांचित कर देने के लिये उसकी आवाज ही काफी थी। उस फॉल के अद्भुत नजारे को अनुभव करने का यही वर्षा के बाद का सर्वाधिक उपयुक्त समय था। शायद गर्मियों में ऐसा अनुभव न हो पाए। सैकड़ों फिट नीचे दर्रे में गिरने की उसकी गति इतनी तीव्र थी कि टकराकर वापस उसकी बूंदे ऊपर के वातावरण में बारिश होने का आभास कराती थी। पता चला कि इसकी धारा ही सड़क की दूसरी तरफ स्थित गुप्तेश्वर महादेव के नीचे बने एक कुंड तक जाती हैं, जहां जाना सम्भव है। मन अति रोमांचित हुआ और हम सब गुप्तेश्वर महादेव पहुंचे। लेकिन चूंकि बारिश में गुप्तेश्वर महादेव कन्दरा का निचला हिस्सा जलमग्न हो जाता है तो वहां तक जाने की अनुमति नही थी। मन मसोस कर रह गए हम। तभी टिकट काउंटर पे बताया गया कि कल से कन्दरा पूरी तरह से खोल दी जाएगी। हम सबने त्वरित निर्णय किया कि अब कल ही गुप्तेश्वर महादेव और उसके नीचे डेविस फॉल से बने कुंड के दर्शन किये जायेंगे। अब हम सब उसी सड़क पर आगे वर्ल्ड पीस पगोडा देखने के लिये आगे बढ़े। कार पार्किंग करते ही सिर के ठीक ऊपर 180° पर वह जापानियों का स्थित बौद्घ धर्मस्थल दिखा। ऊंचाई और सीढ़ियों की संख्या के अनुमान से ही हिम्मत डोलने लगी। तभी आश्चर्यजनक तरीके से डॉक्टर साहब ने हिम्मत बंधाई और हम सबने चढ़ाई प्रारम्भ की। लगभग 450 सीढ़ियों को चढ़कर हम उस शांत सुरम्य बौद्ध स्थल पर पहुंचे। वहां की शांति और नीचे फैले खूबसूरत पोखरा की छवि अवर्णनीय है।
वापस आकर रास्ते में पंजाबी रेस्टोरेंट में खाना खाया और होटल के कमरे में निढाल होकर पड़ गए।
पुनः शाम के पांच बजे हम सब निकले। अबकी लक्ष्य था, पोखरा की आत्मा विशालकाय फेवा लेक में नौका विहार का।  टिकट काउंटर पर सैलानियों की भीड़ देख प्रतीक्षा करने का मन न हुआ। वापस मार्किट की तरफ लौटने लगे। रास्ते में कई और स्थान दिखे जहां से नौकाएं मिलती हैं। एक जगह रुक कर देखा तो नौकाएं उपलब्ध थी। फिर क्या था लाइफ जैकेट्स पहन हम सभी एक छोटी सी नौका पर सवार हो गए। शुल्क लगा 540 नेपाली मुद्रा। उस विशालकाय झील में छोटी सी नौका में विहार का भयमिश्रित जो रोमांच था उसे मैं शब्दों में लिख नहीं सकता। डॉक्टर साहब की स्थिति अति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में थी। नौका विहार के उस खूबसूरत अनुभव को कैमरे में कैद करते रहे हम सब, सिवाय डॉक्टर साहब के। बीच झील में मां दुर्गा का अद्भुत ताल बराही मन्दिर था। उनके दर्शनोपरांत नाव वापस किनारे पर लगी लेकिन उस एक घण्टे में हमारे डॉक्टर साहब की स्थिति देखने लायक थी। वैसे अगर आपके साथ पर्याप्त लोगों की संख्या हो तो 1200 नेपाली रुपये की दर से पैदल वाली बड़ी नौका लेना अधिक श्रेयष्कर होगा। हम सबसे यही चूक हुई। खैर...
    शनैः शनैः अंधेरा होने लगा और पोखरा जगने लगा। असल में दिन था दशहरे का और नेपाल में दशहरा बहुत ही उल्लास से मनाते हैं। स्पष्ट करता चलूं कि उल्लास से आशय रावण वध, रामलीला आदि से नहीं वरन नाच-गाने से भरी हुई न्यू ईयर ईव जैसे माहौल से है। हम भी माहौल में ढलने लगे। ओजोन पब और बिजी बी रेस्टोरेंट के लाइव म्यूजिक पर डांस फ्लोर पर थिरकने का प्रथम अनुभव मिला। पूरा पोखरा और विदेशी सैलानी अजब से उल्लास में रंगे हुए थे। देर रात तक धमाचौकड़ी कर हम सब होटल वापस आ गए।

-चतुर्थ दिवस-
पिछले दिवस की थकान ने उठते-उठते सुबह के आठ बजा दिए। होटल मैनेजर सरोज जी से हमने और विवेक जी ने *पैराग्लाइडिंग* की जानकारी ली। लेकिन दशहरे के कारण क्षेत्रीय निवासियों की छुट्टी और सैलानियों की संख्या के कारण सामान्य दर पर ग्लाइडर का उपलब्ध होना सम्भव नही हो पाया। *सामान्यतया 6000 नेपाली मुद्रा में मिलने वाले ग्लाइडर की माँग 11000 की थी*। अतः विचार बदलना पड़ा। फिर हम सबने सरोज जी के कहे के अनुसार *खोजी यायावरी* के क्रम में सेती नदी में स्नान का मन बनाया।
उमंग जी रात की थकान से उबर न पाए थे तो उन्हें कमरे में सोता हुआ छोड़कर हम तीन *गूगल मैप के सहारे* गाड़ी लेकर नदी के उचित स्थान की खोज में निकल पड़े। कार *पोखरा-बागलुंग हाइवे* पर दौड़ने लगी। दाहिनी तरफ गहराई में अद्भुत सेती नदी साथ-साथ थी और मेरी निगाहें गूगल मैप और बाईं तरफ स्नान की मंशा से किसी उचित फॉल या स्थान की खोज में। कुछ फॉल मिले लेकिन कार किसी चुम्बकीय शक्ति के वशीभूत हो *फ़ेदी की तरफ* बढ़ती जा रही थी। फ़ेदी से लगभग पांच किमी पहले बाईं तरफ नदी की एक धारा सड़क के साथ साथ बहती दिखने लगी। उचित स्थान देख कार बाईं तरफ मोड़ दी गयी और 200 मीटर चल हमसब नदी तक पहुंच गए। बगल में ऊंचे ऊंचे पहाड़, कल-कल करती नदी के शीतल स्वच्छ जल में घण्टे भर नहाने से सारी थकान काफूर हो गयी।
अब वापसी में गूगल मैप ने बताया कि *बैट केव, महेंद्रा केव, गोरखा म्यूजियम* देखे जा सकते हैं। चूंकि यह सभी स्थान उमंग जी पूर्व में देख चुके हैं अतः हम सबने तय किया कि वापसी में यह सारे स्थल देखते हुए ही जायेंगे।
दोनों केव्स का अनुभव शानदार रहा। दोनों केव्स में *80 नेपाली रुपये प्रति व्यक्ति की दर* से प्रवेश शुल्क लगा। छतों और दीवारों से टपकते पानी के कारण इन सुरंगों में चलने हेतु सावधानी बरतना आवश्यक है। महेंद्रा केव्स अपेक्षाकृत अधिक चौड़ी थी। नीचे रिद्धि, सिद्धि और सिद्धविनायक जी का मंदिर है। *बैट केव* में तो इतना अंधेरा कि *एलईडी लैम्प* की रोशनी के बगैर जाना सम्भव नहीं। अंधेरा और बैट्स जनित दुर्गंध से दो चार होना पड़ता है। निकास द्वार इतना सँकरा कि भीड़ के मद्देनजर यू टर्न लेकर प्रवेश द्वार से ही वापस आना पड़ा।
गोरखा म्यूजियम के बगल में ही *सेती रिवर स्थल* बनाया गया है। *पचास रुपये नेपाली* प्रति व्यक्ति का प्रवेश शुल्क और अंदर सैकड़ों फीट नीचे बहती नदी और ऊपर बनाई गई *10 फिट गहरी कृत्रिम कैनाल* में उस नदी का प्रवाह दर्शनीय है। दोपहर के दो बज चुके थे। होटल के पास ही झील के सामने बने *फेवा लेक रेस्टोरेंट* में उमंग जी हम सबकी प्रतीक्षा कर रहे थे। सबने खाना खाया। पोखरा में मिले अब तक के किसी भी रेस्तरां से यह *सर्वश्रेष्ठ* था। लजीज *शाकाहारी थाली* का लुत्फ उठा हम सब वापस होटल आ गए।
शाम को तैयार हो हम सब *गुप्तेश्वर महादेव* के दर्शन हेतु निकले। मन का रोमांच चरम पर था। एक दिन पूर्व से ही तरह तरह के अनुमान लगा रहे थे। *प्रवेश शुल्क था 100 रुपये नेपाली*। डैमसाइड पर डेविस फॉल के सामने है यह कन्दरा। दक्षिण एशिया की सबसे गहरी कन्दरा है ये। कन्दरा के *मध्य में ही गुप्तेश्वर महादेव स्थित हैं*। मन्दिर के पास फोटोग्राफी करना मना है। महादेव के दर्शन करके हम रोमांच के सजीव दर्शन करने नीचे उतरने लगे। जहां वो अद्भुत कुंड था। मेरे अनुमान से 50 फीट नीचे तो होगा ही, ज्यादा भी हो सकता है। हम सब कुंड तक पहुंचे। सामने दूर दर्रे से उसी डेविस फॉल से आती हुई भीषण जलधारा के दर्शन हुए जो एक दिन पूर्व हमने देखा था। सामने हाहाकार मचाती हुई जलधारा और बगल में शांत जलकुंड। कैमरे की कृत्रिम आंखें फिर से एक बार हथियार डाल चुकी थी। समझना मुश्किल था कि यहां से यह पानी पाताल में कहाँ चला जा रहा है, कहाँ गुप्त हो गया।
बाहर निकलते निकलते अंधेरा होना लगा।
शाम को बरसते पानी में मार्किट घूमते घामते फिर बिजी बी रेस्टोरेंट पहुंचकर लाइव म्यूजिक का आनन्द लिया। और हां, आज नहीं नाचे हम। अगले दिन तड़के वापसी करनी थी तो समय से हम सब वापस कमरे में आ गए।
लेकिन हमें क्या पता था कि अगले दिन की यात्रा (वापसी यात्रा) हेतु ईश्वर रोमांच की नई पटकथा लिख रहा था।
          -पंचम/अंतिम दिवस-
     रोमांचक यात्रा का रोमांचक अंत
सुबह तैयार होकर होटल की औपचारिकताएं पूरी करते करते 7.30 बज गए। निकलते समय अचानक उमंग जी ने आवाज लगाई कि छत पर आइये, कुछ अद्भुत दिखाते हैं। हम भागते हुए छत पर पहुंचे तो एक तरफ वही अन्नपूर्णा पहाड़ियों की रेंज पुनः दिखी। कुछेक फोटू-शोटू ले हम सब नीचे आये।
हम सबने होटल मैनेजर सरोज जी से इस वादे संग विदा ली कि पुनः शीघ्र आएंगे, पैराग्लाइडिंग जो करनी है अभी।
पोखरा की हसीं वादियों को अलविदा कहते हुए हमारी कार नीचे की तरफ ढलान पर चलने लगी। योजना थी कि बुटवल में लंच और भैरहवाँ में कुछ देर विश्रामोपरांत कानपुर वापसी करनी है। *लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। इस रोमांचक यात्रा के रोमांचक अंत की पटकथा भी ईश्वर लिख चुका था*। भैरहवाँ से 45 किमी पूर्व ही गाड़ियों को रोका जाने लगा। पता चला कि आगे 12-15 किमी पर तगड़ा *लैंड स्लाइड* हुआ है। राहत/बचाव कार्य प्रारंभ है। लेकिन समय लगेगा। प्रारम्भ में तो हम सबने इसे सामान्य तरीके से लिया किन्तु जैसे ही घड़ी ने एक के बाद एक घण्टे बजाने शुरू किए मन में आशंकाओं के बादल गहराने लगे। कुछ लोग कहने लगे कि कल से रास्ता बंद है, कुछ बोले आज नही निकल पाओगे, कुछ का कहना कि बाइक सवार शायद निकल पाएं आज। दुविधा तब और बढ़ी जब पचासों गाड़ियां वापस होने लगीं। हालांकि मैं अपने भतीजे संजय शुक्ल जी से बराबर सम्पर्क में था लेकिन तात्कालिक घटनाक्रम विचलित ही कर रहे थे। सैलानियों की भीषण भीड़ देखते हुए आस पास के होटल्स में कमरा मिलने की संभावना भी न्यून होती जा रही थी। एक बार तो उमंग जी भी बोले की वापस तानसेन तक चलते हैं, अभी कमरे मिल जायेंगे। लेकिन पंचो की राय न बनी। शाम के साढ़े पांच बज गए, अंधेरा बढ़ने लगा। हम सबने गाड़ी में रात बिताने की सबसे बुरी अवस्था के लिये भी स्वयं को तैयार कर लिया। आनन्द को भेजकर पानी की पांच-छह बोतलों समेत बिस्किट नमकीन आदि की व्यवस्था करवा ली। आसपास की दुकानों से कुछ और मिलने की संभावना भी न थी। पीछे वाली बस भी बैक होने लगी लेकिन मैं फिर भी अपने भतीजे की सूचना पर आश्वस्त था कि अंकल परेशान मत होइए, कार्य प्रगति पर है, दुबारा लैंड स्लाइड हो जाने के कारण समय लग रहा है। अचानक रास्ता खोले जाने की अनुमति मिली। उमंग जी ने तेजी से गाड़ी बढ़ाई और सैकड़ों कारों का काफिला चल निकला। कुछ दूर चलकर फिर से ट्रैफिक रुक गया, फिर से मन में वही सब विचार उमड़ने लगे। सभी गाड़ियों की हेडलाइट्स जल चुकी थी। पहाड़ पर गाड़ी की हेडलाइट जला कर ड्राइविंग का उमंग जी का पहला अनुभव था। लेकिन थोड़ी देर में ही पुनः गाड़ियां चल निकली। कुछ देर में हम उस लैंड स्लाइड वाले स्थान को पार कर रहे थे। सड़क पर सहायता दल, बुलडोजर और जेसीबी तैनात थी। बाईं तरफ मिट्टी का दरकता हुआ पहाड़ था, बूंदाबांदी हो रही थी। उस लैंड स्लाइड से प्रभावित हुआ ट्रक और एक कार घटनास्थल पर ही थे। कार की हालत देखकर कहना मुश्किल था कि कोई भी सवार जीवित बचा होगा। पहाड़ देख कर ही लग रहा था कि अब गिरा तो तब गिरा। *भतीजे ने पूर्व में ही सचेत किया था कि प्रभावित स्थल को तेजी से पार कर लीजियेगा* अतः उमंग जी तेजी से कार चलाते हुए बुटवल की ओर बढ़ते रहे। आठ बजते बजते हम सब भैरहवाँ पहुंच गए। *होटल लाकुल* में हम सबकी रुकने की व्यवस्था पहले ही संजय जी ने कर दी थी। कुछ देर पीठ सीधी करने के बाद हम सबको लेकर रात्रि भोजन हेतु संजय जी *भैरहवाँ के सर्वश्रेष्ठ तन्दूर रेस्टोरेंट* में ले गए। लजीज खाना खाकर दिन भर की थकान जाती रही। *पूरी यात्रा में सबसे लजीज भोजन* यहीं मिला। वापस होटल में आ गए। सुबह 6.30 बजे बॉर्डर क्रॉस करने का तय करके सो गए।
सुबह 7 बजे बॉर्डर क्रॉस किया और दोपहर 1 बजे कानपुर अपने निवास स्थान पर पहुंच गए। लगभग *1400 किमी* की दूरी हेतु लगभग *92 लीटर पेट्रोल (लगभग ₹ 6000 )* व्यय हुआ।
पोखरा तो पीछे छूट चुका था लेकिन एक अद्भुत अविस्मरणीय यात्रा सदा के लिये मानस पटल पर अंकित हो चुकी थी।
धन्यवाद पोखरा 😊😊

                            ✍ डॉ पवन मिश्र
होटल रेडसन, भैरहवाँ

अन्नपूर्णा पर्वत श्रंखला

सूर्योदय के समय हमारे सहयात्री

सारँगकोट से हम

वर्ल्ड पीस पगोड़ा जाते हुए

नौका विहार

नदी स्नान

बैट्स केव

महेंद्रा केव


अपने मित्रों संग


बरसते पानी में पोखरा मार्किट घूमते

बादलों के ऊपर से एक क्लिक

सूर्योदय

पर्वत शिखर पर सूर्यरश्मियाँ


अन्नपूर्णा पर्वतमाला

डेविस फॉल

वर्ल्ड पीस पगोड़ा, पोखरा

पोखरा, मेरे कैमरे की नजर से

होटल ग्रैंड, पोखरा

ओजोन पब, पोखरा

बिजी बी रेस्टोरेंट, पोखरा

गुप्तेश्वर महादेव केव



अलविदा पोखरा

पालपा के निकट निर्माणाधीन मन्दिर



भतीजे संजय शुक्ल के संग
ताल बराही मन्दिर
फेवा लेक

गुप्तेश्वर महादेव प्रवेश द्वार

Tuesday, 3 October 2017

ग़ज़ल- जिंदगी का यार मेरे आसरा कुछ भी नहीं


जिंदगी का यार मेरे आसरा कुछ भी नहीं।
मौत को सच मान लो इसके सिवा कुछ भी नहीं।।

भाग्य का लिक्खा हुआ भी बाअमल को ही मिला।
हाथ बांधे जो रहा उसको मिला कुछ भी नहीं।।
बाअमल= कर्मशील

लाश है या आदमी है रहनुमा के पा-तले ?
घुट रहा है दम मगर वो बोलता कुछ भी नहीं।।
पा-तले= पैरों के नीचे

भूख लाचारी गरीबी सब मिला इस मुल्क को।
कौन कहता साठ सालों में मिला कुछ भी नहीं।।

इश्क़ के सब फ़लसफ़े जिसने पढ़ाये थे मुझे।
कल मिला इस क़द्र जैसे जानता कुछ भी नहीं।।

तुमको जाना है तो जाओ ओढ़ कर मजबूरियाँ।
सच कहूं ? इस बात से मुझको गिला कुछ भी नहीं।।

क्या करेगा जोड़ कर दुनियावी चीजों को पवन।
साथ जब तुम ही नहीं तो अब मेरा कुछ भी नहीं।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

Saturday, 23 September 2017

ग़ज़ल- मुझे मालूम न था


उनकी झूठी है अदावत मुझे मालूम न था।
यूँ भी होती है सियासत मुझे मालूम न था।।

मेरे हुजरे में चले आये हिजाबों के बिना।
*यूँ भी आती है कयामत मुझे मालूम न था*।।

बेजुबाँ दिल भी लगा चीखने उनकी ख़ातिर।
इसको कहते हैं मुहब्बत मुझे मालूम न था।।

अब तलक दिल की ही सुनता मैं रहा लेकिन।
वो भी कर देगा बगावत मुझे मालूम न था।।

छोड़ जाएंगे अकेला युँ जमाने में मुझे।
होगी इस दर्जा शिकायत मुझे मालूम न था।।
                             ✍ डॉ पवन मिश्र

हुजरा= व्यक्तिगत कक्ष
हिजाब= नकाब, पर्दा

**फ़िराक गोरखपुरी साहब का मिसरा

ग़ज़ल- सजा ये है दिवाने की


नहीं पर्वा कभी की यार हमने इस जमाने की।
मुहब्बत हो गयी तुमसे सजा ये है दिवाने की।।

मुबारक हो तुम्हे मजबूरियां जो भी तुम्हारी हैं।
चले जाओ जरूरत क्या तुम्हे बातें बनाने की।।

बिखरना ख़्वाब का हमने चलो तकदीर कह डाला।
करेंगे आज से कोशिश तुम्हे दिल से भुलाने की।।

तुम्हे हक है कुरेदो लाख चाहें जख़्म तुम मेरे।
*मुझे आदत नहीं है दूसरों का दिल दुखाने की*।।

अभी तो रो रहा हूँ मैं, जनाजे में तो आओगे ?
वहीं बारी तुम्हारी आएगी आँसू बहाने की।।

पवन का इश्क़ तुमको बेवफ़ा कह पायेगा कैसे ?
मिलें खुशियां सभी तुमको दुआ है ये दिवाने की।।

                             ✍ डॉ पवन मिश्र

**मनीष सिंह 'आवारा' जी का मिसरा

Sunday, 17 September 2017

ग़ज़ल- मुहब्बत का इरादा क्यूँ करें हम


वही गलती दुबारा क्यूँ करें हम।
मुहब्बत का इरादा क्यूँ करें हम।।

जिन्हें पर्वा नहीं कोई हमारी।
उन्हें आख़िर पुकारा क्यूँ करें हम।।

यकीं हो गर तुम्हे हमपे तो आओ।
वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम**।।

तेरी तस्वीर रख ली है रहल पे।
मुहब्बत इससे ज़्यादा क्यूँ करें हम।।

नहीं दिल से अगर उठती सदायें।
नवाज़िश का दिखावा क्यूँ करें हम।।

कज़ा के सामने देगी दगा वो।
भरोसा जिंदगी का क्यूँ करें हम।।

                    ✍ डॉ पवन मिश्र

रहल= लकड़ी का आधार जिसपर रखकर धर्मग्रन्थ पढ़ते हैं
सदायें= आवाजें
नवाज़िश= मेहरबानी, दया
कज़ा= मौत
**जॉन औलिया साहब का मिसरा

Friday, 1 September 2017

अतुकान्त- स्वयम्भू जगदीश


हे मनुपुत्र !
माना तुम समर्थ हो,
अति समर्थ
पौध रोपी है तुमने
झाड़-झंखाड़ भी उगाए
नरमुण्ड एकत्र कर
भीड़ को जन्मा है तुमने
जयकारों से गुंजित हैं दिशाएं
आकाश भी, वाणी भी
स्वयं को बताने लगे जगदीश
ऊँची शिला पर बैठ
देने लगे ज्ञान
नीचे बैठी भीड़ को
मैं-मैं करते करते
भूल गए हमें
बेशक
उस भीड़ में मैं भी हूँ
लेकिन हे स्वयम्भू जगदीश
तुम्हारी भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ।
क्या हुआ ? चुभ गया तुम्हे ?
लेकिन क्यों ?
ऊँची शिला पर
बैठे हो बस
जगदीश नहीं हो तुम
मनुपुत्र हो, मनुपुत्र।

✍ डॉ पवन मिश्र

मुक्तक


परशुराम की पुण्य धरा को वंदन है
हे वीर प्रसूता गाजीपुर अभिनन्दन है
सौ सौ बार लगा लूँ इसको माथे पर
अब्दुल हमीद की यह मिट्टी तो चंदन है

जाने कहाँ से वो मेरे करीब आ गया
लेकर हज़ार ख़्वाब वो हबीब आ गया
मंज़िल भी दिख रही थी राहे इश्क़ में मगर
कम्बख़्त बीच में मेरा नसीब आ गया

कली कमसिन को काँटों से बचा लाई,
वो मुझको हर अँधेरों से बचा लाई।
समंदर तो बहुत मगरूर था लेकिन,
मेरी माँ हर थपेड़ों से बचा लाई।।

✍डॉ पवन मिश्र

Saturday, 26 August 2017

आल्हा/वीर छन्द- रँगे सियार


अर्थमोह की इस आंधी में,
देखो कैसी चली बयार।
धर्म लबादा ओढ़े कितने,
घूम रहे हैं रँगे सियार।१।

भोले-भालों को छलते ये,
किया देश का बंटाधार।
अपनी झोली भरने को ही,
करें धर्म का ये व्यापार।२।

श्रद्धा की फसलें बस बोते,
नहीं दूसरा इनको काम।
धन वैभव के मद में रहते,
पैसा ही बस अल्लाराम।३।

कोई धारे कंठी माला,
कोई हाथ लिये कुरआन।
छद्मवेश में कुछ फादर तो,
ईसा से ही है अनजान।४।

राजनीति की शह पाकर ये,
भस्मासुर होते तैयार।
न्यायपालिका भी बेदम है,
इनके आगे नत सरकार।५।

टोपी, माला, क्रॉस पहन के,
धर्म चलाएं ठेकेदार।
इनसे मुक्ति दिला दो ईश्वर,
भारत माता करे पुकार।६।

                ✍ डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 16,15 मात्राभार पर यति तथा पदांत में गुरु लघु की अनिवार्यता।


Monday, 21 August 2017

नवगीत- तब राष्ट्र का निर्माण हो

एकात्म मानववाद की,
परिकल्पना का मान हो।
अंग्रेजियत की भीड़ में,
हिंदी का जब सम्मान हो।
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

वंचितों की भीड़ में जो,
अंत में बेबस खड़ा है।
वस्त्र वंचित देह भीतर,
भूख लेकर जो पड़ा है।।
बजबजाती नालियों से,
रात दिन जो जूझता है।
अश्रुपूरित नैन में जो,
स्वप्न लेकर घूमता है।।
उस मनुज का उत्थान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

चीथड़ों से तन लपेटे,
वक्ष पे नवजात बाँधे।
अनवरत जो चल रही है,
पीठ पर संसार साधे।।
जीवन थपेड़ों से यहाँ,
किंचित नहीं भयभीत जो।
नित कंटकों से लड़ रही,
साहस के गाती गीत जो।।
उस नार का सम्मान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

        ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 20 August 2017

ग़ज़ल- अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं


चलो तूफान से लड़ने का कुछ जज़्बा दिखाते हैं।
कि अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं।।

मेरे जुगनू के आगे क्या तेरी औकात है सूरज।
ये तब भी रोशनी देता अँधेरे जब चिढ़ाते हैं।।

नहीं परवाह मौजों की न तूफानों से घबराहट।
समंदर चीर कर यारों सफ़ीने हम चलाते हैं।।

न चल पाओगे मेरे साथ तुम इस राह पर हमदम।
*मुझे तो आजकल बेदारियों में ख़्वाब आते हैं।।*

फ़लक का चांद भी बेदम नजर आता है तब मुझको।
झुका कर वो कभी जब भी नज़र फिर से उठाते हैं।।

मेरे हाथों में आईना है ख़ंजर तो नहीं कोई।
भला फिर लोग क्यूँ इतना पवन से खौफ़ खाते हैं।।

                                  ✍ डॉ पवन मिश्र

*अहमद नदीम कासिमी साहब का मिसरा

Sunday, 6 August 2017

ग़ज़ल- मैं नहीं हूँ


तू ही तू दिख रहा है मैं नहीं हूँ।
ये सब कुछ ही तेरा है मैं नहीं हूँ।।

मेरे आईने में जो आजकल है।
यकीं मानो खुदा है मैं नहीं हूँ।।

उसी का ही कोई होगा करिश्मा।
*जो मुझमें बोलता है मैं नहीं हूँ*।।

चुरा कर दिल मेरा देखो जरा तो।
वो सबको बोलता है मैं नहीं हूँ।।

सुना लाखों हैं तेरी भीड़ में अब।
मुझे इतना पता है मैं नहीं हूँ।।

गलतफहमी उसे शायद कोई है।
जिसे वो ढूंढता है मैं नहीं हूँ।।

फ़दामत से उसे मंजिल मिली पर।
अकेला ही खड़ा है मैं नहीं हूँ।।

कचोटे है तुझे जो रात दिन वो।
तेरे दिल की सदा है मैं नहीं हूँ।।

           ✍ डॉ पवन मिश्र

फ़दामत= अन्याय, अनीति

*कबीर वारिस साहब का मिसरा

Sunday, 23 July 2017

कुण्डलिया- रम में बसते राम ?

*कुण्डलिया*

मदहोशी में श्वान को, रम में दिखते राम।
उसकी दूषित सोच है, कुत्सित सारे काम।।
कुत्सित सारे काम, अरे सुन रे ओ थेथर।
जरा पैग में देख, बोल दिखते पैगम्बर ?
सुनो पवन की बात, त्यागकर अब बेहोशी।
कुछ दिन की मेहमां, तुम्हारी ये मदहोशी।१।

जनता है सब देखती, इनके काले काम।
बड़े बड़े धूमिल हुए, लोकतंत्र यहि नाम।।
लोकतंत्र यहि नाम, चले ना कोई सिक्का।
जनता का विश्वास, तुरुप का होता इक्का।।
जितने नेता आज, हिंद हिन्दू के हन्ता।
उनको हरि का भजन, सिखायेगी ये जनता।२।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

Friday, 21 July 2017

ग़ज़ल- ये बारिश की बूंदें


ये बारिश की बूँदें सताती बहुत हैं।
न चाहूँ मैं फिर भी भिगाती बहुत हैं।।

ये गालों को छूके लबों पे थिरक के।
विरह वेदना को जगाती बहुत हैं।।

दबे पाँव सँग तेरी यादें भी आकर।
भिगाती बहुत हैं रुलाती बहुत हैं।।

फ़लक से ये गिरकर ज़मींदोज़ होतीं।
ये जीवन का दर्शन सिखाती बहुत हैं।।

हुईं जज़्ब मिट्टी में बारिश की बूँदें।
मगर फिर भी मुझको जलाती बहुत हैं।।

ज़मीं सींचती हैं फुहारें ये लेकिन।
टपकती छतों को चिढ़ाती बहुत हैं।।

                     ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 19 July 2017

ग़ज़ल- पिता


पसीना भी छुपाता है वो आंसू भी छुपाता है।
अरे वो बाप है जज़्बात कब खुल के जताता है।।

समंदर पार करने को वो बच्चों के लिये अपने।
कभी क़श्ती बनाता है कभी पतवार लाता है।।

परों पे अपने ढोता है वो नन्हें से परिंदे को।
लिये ख़्वाबों की नगरी में फ़लक के पार जाता है।।

उसे तूफ़ान बारिश कुछ नहीं दिखती मुहब्बत में।
थपेड़े सारे सह कर भी घरौंदा वो बनाता है।।

बहुत कम ज़र्फ़ है जो बाप को तकलीफ दे, लेकिन।
दुआओं में  कहां वालिद उसे भी भूल पाता है।।

कसीदे शान में उसकी मुझे पढ़ने की कूवत दे।
जो काँधे पे बिठा दुनिया का हर मेला घुमाता है।।

ज़मीं पे वो फरिश्ता है पवन की दीद में यारों।
खपा कर जिंदगी अपनी जो बच्चों को बनाता है।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 16 July 2017

ग़ज़ल- मेरे किरदार में वो है मेरे दिन रात में है


मेरे किरदार में वो है मेरे दिन रात में है।
याद कैसे न करूँ जज़्ब खयालात में है।।

मेरे आईने में इक अक़्स उभरने है लगा।
देख ये कैसा असर एक मुलाकात में है।।

लब पे मुस्कान लिये आ तो गया महफ़िल में।
*एक तूफ़ान सा लेकिन मेरे जज़्बात में है।।*

देगा फिर कौन जवाबों को मेरे, तू ही बता।
रहनुमा ही जो घिरा आज सवालात में है।।

बदहवासी में चरागों को बुझाने वाली।
ए हवा देख तो ले क्या मेरी औक़ात में है।।

                        ✍ डॉ पवन मिश्र

जज़्ब= समाया हुआ
*दाग देहलवी साहब का मिसरा

Tuesday, 11 July 2017

ताटंक छन्द- अमरनाथ श्रद्धालुओं पर हमले के संदर्भ में

(अमरनाथ श्रद्धालुओं पर 10/07/17 को हुए हमले के संदर्भ में)

दहशतगर्दी फिर चिल्लाई, भाड़े के हथियारों से।
देखो माँ की छाती फिर से, छलनी है गद्दारों से।।
गूंज रही थी सारी घाटी, हर हर के जयकारों से।
घात लगाकर गीदड़ आये, जेहादी दरबारों से।१।

शर्म जरा सी भी ना आई, उन श्वानों के ज़ायों को।
हरि भक्तों पर घात लगाया, मार दिया असहायों को।।
आखिर क्यूँ दिल्ली की अब भी, बंदूकों से दूरी है।
कुत्ते की दुम सीधी करने, की कैसी मजबूरी है।२।

गांधी के बन्दर जैसा ही, गर मोदी भी गायेगा।
छप्पन इंची सीने का फिर, मतलब क्या रह जायेगा।।
पकड़ गिरेबाँ खींच निकालों, उन कुत्सित हत्यारों को।
जीप छोड़ कर लटकाओ अब, फंदे से गद्दारों को।३।

चुन चुन कर हर छाती रौंदों, नृत्य करो अरिमुण्डों पे।
न्यायालय भी बन्द करे अब, दया दिखाना गुंडों पे।।
ये विषधर के वंशज सारे, अपना रंग दिखायेंगे।
दूध पिला लो चाहे जितना, इक दिन ये डस जाएंगे।४।

सेना को आदेश करो तुम, अब तो रण छिड़ जाने दो।
रौद्र रूप धर जगदम्बा को, अरि का रक्त बहाने दो।।
क्षत विक्षत पापी का तन जब, हिमखण्डों पर छायेगा।
फिर बाबा बर्फानी के घर, हत्यारा ना आयेगा।५।

                                            ✍ डॉ पवन मिश्र

(अमरनाथ श्रद्धालुओं पर 10/07/17 को हुए हमले के संदर्भ में)

Saturday, 8 July 2017

दोहे- गुरु की महिमा


सत्य सनातन श्रेष्ठ है, सकल सृष्टि का सार।
गुरु चरणों में स्वर्ग है, वंदन बारम्बार।१।

जीवन दुर्गम जलधि सम, भ्रमित फिरें नर-नार।
गुरु किरपा ही कर सके, भवसागर से पार।२।

मानव माटी मान लो, गुरु जानो कुमहार।
थाप-पीट औ तपन से, गढ़ता नव आकार।३।

गुरु की महिमा क्या कहूँ, गुरु से गुरुतर कोय।
गुरुवर के आशीष से, सुफल मनोरथ होय।४।

धन-मद में जो चूर हैं, सुनो पवन के बोल।
मात, पिता, गुरु तीन ये, जगती पर अनमोल।५।

                                   ✍ डॉ पवन मिश्र




Sunday, 2 July 2017

ग़ज़ल- नाम लेता है


खुदा का नाम ये बन्दा तो सुबहो शाम लेता है।
कोई पूछे खुदा है क्या तो तेरा नाम लेता है।।

जिसे तुम छोड़ आये थे ज़माने की रवायत में।
वो आशिक आज भी अक्सर तुम्हारा नाम लेता है।।

अगर मुझसे मुहब्बत है तो साहिल पे खड़ा है क्यूँ।
वो आकर क्यूँ नहीं पतवार, क़श्ती थाम लेता है।।

समझ पे ताले जड़ जाते बीमारी इश्क़ है ऐसी।
लगी जिसको भला कब अक्ल से वो काम लेता है।।

न साकी चाहिये मुझको न चाहत मैकदे की ही।
पवन मदहोश है ये बस नज़र के जाम लेता है।।

                                 ✍ डॉ पवन मिश्र

Monday, 5 June 2017

ग़ज़ल- कोई न आये


आप जैसा रहनुमा कोई न आये।
दिल दुखाने बेवफ़ा कोई न आये।।

जख़्म भरने की कवायद में लगा हूँ।
बस पुराना वाकिया कोई न आये।।

मुद्दतों के बाद गुल खिलने लगे हैं।
ऐ खुदा अब ज़लज़ला कोई न आये।।

हर गलतफहमी मिटा दूँगा मैं लेकिन।
*शर्त ये है तीसरा कोई न आये*।।

हूँ बहुत तन्हा अज़ब सी ख़ामुशी है।
दूर तक मुझको सदा कोई न आये।।

रोज तकता डाकिये की राह, लेकिन।
खत पवन के नाम का कोई न आये।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र
*समर साहब का मिसरा

Friday, 19 May 2017

ग़ज़ल- चलो इस जंग में तुम पर इनायत यार हो जाए


चलो इस जंग में तुम पर इनायत यार हो जाए।
कि जीतो तुम हमारा दिल हमारी हार हो जाए।।

इयादत के बहाने ही अगर दीदार हो जाए।
तो रोजेदार आँखों का सनम इफ़्तार हो जाए।।

न रोको अश्क़ आँखों में सदायें दिल की आने दो।
*बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए*।।

करीने से सजा लेना नज़र पे कोई चिलमन तुम।
कहीं ऐसा न हो नजरें मिलें और प्यार हो जाए।।

मनाएं ईद हम कैसे रिवाजों में वो उलझा है।
खुदा थोड़ी सी रहमत कर हमें दीदार हो जाए।।

हवस की नींद में डूबा है अपना राहबर यारों।
करो ऐसी बगावत रहनुमा बेदार हो जाए।।

लिये पत्थर खड़े हैं सब खियाबाँ रौंद डाला है।
पवन की इल्तिज़ा फिर से इरम गुलज़ार हो जाए।।

                                  ✍ डॉ पवन मिश्र

इयादत= रोगी का हाल पूछने और उसे दिलासा देने हेतु जाना
हवस= लोभ, लालच           राहबर= राह दिखाने वाला
बेदार= जागना।                 खियाबाँ= बाग
इल्तिज़ा= प्रार्थना।              इरम= स्वर्ग

*अर्श मलसियानी साहब का मिसरा

Sunday, 7 May 2017

ग़ज़ल- इक शमा रोशन करें


दरमियां बातों का फिर से सिलसिला रोशन करें।
आओ मिलकर इक घरौंदा प्यार का रोशन करें।।

रात गहरी है बहुत रानाइयाँ भी हैं ख़फ़ा।
जब तलक सूरज न आये इक शमा रोशन करें।।

दोष क़िस्मत पर लगाकर कोशिशें क्यूँ छोड़ना।
*इक दिया जब साथ छोड़े दूसरा रोशन करें*।।

ज़िंदगी की रहगुज़र में तीरगी ही तीरगी।
लौट आओ हमनशीं फिर रास्ता रोशन करें।।

कब तलक देखे सहम कर कश्तियों का डूबना।
थाम लें पतवार फिर से हौसला रोशन करें।।

गर हवा गुस्ताख़ है तो हम खड़े लेकर शमा।
वो बुझाये हर दफ़ा हम हर दफ़ा रोशन करें।।

                                 ✍ डॉ पवन मिश्र
तीरगी= अंधेरा
*जफ़र गोरखपुरी साहब का मिसरा

Saturday, 29 April 2017

ग़ज़ल- युँ दर्द अपना छुपा रहा था


युँ दर्द अपना छुपा रहा था।
हँसी लबों पे दिखा रहा था।।

छुपा के अश्कों की मोतियों को।
क्या हाल है क्या बता रहा था।।

वो जानता था हवा है बैरी।
*मगर दिये भी जला रहा था*।।

हमें दुआओं में करके शामिल।
वो इश्क़ हमसे निभा रहा था।।

चला गया जाने किस नगर में।
जो मेरी दुनिया बसा रहा था।।

मिटा दिया उसने खुद को लेकिन।
पवन को जीना सिखा रहा था।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 18 April 2017

मदिरा सवैया छन्द- रूपवती सखि प्राणप्रिये


रूपवती सखि प्राणप्रिये,
निज रूप अनूप दिखाय रही।

ओंठन से छलका मदिरा,
हिय को हर बार रिझाय रही।

बैठि सरोवर तीर प्रिये,
बस नैनन बान चलाय रही।

नैन मिले जब नैनन से,
तब लाजन क्यूँ सकुचाय रही।

                 ✍ डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 7 भगण (२११×७)+१ गुरू, सामान्यतः 10,12 वर्णों पर यति।

Saturday, 15 April 2017

ग़ज़ल- क्या करें (हास्य ग़ज़ल)

२१२२   २१२२   २१२२

उनके आगे हम हैं बेदम क्या करें ?
बचने के आसार हैं कम क्या करें ?

आज घर आने में देरी हो गयी।
देखिये अब हाल बेगम क्या करें ?

बाल सर के रफ़्ता रफ़्ता जा रहे।
*जाने वाली चीज़ का गम क्या करें ?

ताश के किस खेल में हम आ गए।
सारे पत्ते उनके ही हम क्या करें ?

चाँद तारे फूल खुशबू कुछ नहीं।
खौफ़ में है दिल का मौसम क्या करें ?

युद्ध से डरता नहीं है ये पवन।
पर घरैतिन न्यूक्लियर बम क्या करें ?

                           ✍ डॉ पवन मिश्र
* दाग देहलवी साहब का मिसरा

ग़ज़ल- क्या करें


इल्तिज़ा उस दर पे पैहम क्या करें ?
वो ही जब सुनता नहीं हम क्या करें ?

लेके क़श्ती आ गए मझधार तक।
इससे ज्यादा हौसला हम क्या करें ?

जो गया वो था मुक़द्दर में नहीं।
*जाने वाली चीज़ का गम क्या करें*?

दूरियों ने दिल को पत्थर कर दिया।
आँख फिर भी हो रही नम, क्या करे ?

खुद ही काँटे राह में जब बो दिए।
तब चुभन का यार मातम क्या करें ?

आग जबसे गुलसिताँ में है लगी।
जल रहा है आबे झेलम क्या करें ?

दीद में मेरी पवन बस वो ही वो।
अलहदा है मेरा हमदम क्या करें ?

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

पैहम= लगातार, बार-बार
आबे झेलम= झेलम नदी का पानी
*दाग देहलवी साहब का मिसरा

ग़ज़ल- जल रही घाटी नज़ारे जल रहे हैं


जल रही घाटी नज़ारे जल रहे हैं।
सैनिकों पर आज पत्थर चल रहे हैं।।

बाढ़ आंधी से बचाते नस्ल उनकी।
और रक्षक ही उन्हें अब खल रहे हैं।।

फूल की देवी बताओ मौन क्यूँ हो ?
जब सपोले मेरी माँ को छल रहे हैं।।

क्यारियाँ केसर की मुरझाने लगीं अब।
हुक्मरां बस हाथ बैठे मल रहे हैं।।

आपसे उम्मीद थी माँ भारती को।
आप भी माहौल में अब ढल रहे हैं।।

छोड़ दो गीता उठाओ अब सुदर्शन।
ख़ाक मंसूबे करो जो पल रहे हैं।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 4 April 2017

ग़ज़ल- फिर आ जाओ रिमझिम सी बरसात लिये

मेरी छत पर पूनम की इक रात लिये।
फिर आ जाओ रिमझिम सी बरसात लिये।।

यादों की गलियाँ कब तक यूँ महकेंगी।
सूखे फूलों की तेरी सौगात लिये।।

शबे तार है वीरानी है तन्हाई है।
कब तक भटकूँ अफ़सुर्दा हालात लिये।।

अक़्सर आँसू आंखों में आ जाते हैं।
वही पुरानी तेरी कोई बात लिये।।

शबे वस्ल में माहताब के दरवाजे पर।
हम आये हैं तारों की बारात लिये।।

तुम आओगे फ़लक नूर बरसायेगा।
मैं बैठा हूँ कितने ही जज़्बात लिये।।

                        ✍ डॉ पवन मिश्र
शबे तार= अंधेरी रात
अफ़सुर्दा= खिन्न, उदास
शबे वस्ल= मिलन की रात
नूर= प्रकाश

Sunday, 19 March 2017

ग़ज़ल- और मैं हूँ


महज इक ख़ामुशी है और मैं हूँ।
कि आँखों में नमी है और मैं हूँ।।

बिना उनके कहाँ रानाइयाँ अब।
घनी ये तीरगी है और मैं हूँ।।

बिखर जाऊँ न मैं आकर सँभालो।
*बड़ी नाजुक घड़ी है और मैं हूँ*।।

गया जबसे पिलाकर वो नज़र से।
उसी की तिश्नगी है और मैं हूँ।।

सुनेगा कौन मेरे दिल की बातें।
फ़क़त तन्हाई ही है और मैं हूँ।।

चले आओ जहाँ भी तुम छुपे हो।
फिजा ये ढूँढती है और मैं हूँ।।

उधर धोखे ही धोखे हर कदम पर।
इधर बस आशिकी है और मैं हूँ।।

                       ✍ डॉ पवन मिश्र

तीरगी= अंधेरा      तिश्नगी= प्यास

*इंदिरा वर्मा जी का मिसरा

Saturday, 11 March 2017

दोहे- जोगीरा सा रा रा रा


इस होली में का कहें, जियरा का हम हाल।
भगवा हुइगा देश सब, क्या नीला क्या लाल।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

नमो नमो मनई रटें, अईस नाम में दम।
पूरा यू पी हिल गवा, मानो फटा हो बम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

चचा भतीजा सब सफा, बुआ खड़ी पगुराय।
का से का ई हुइ गवा, कछू समझ नहि आय।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

पप्पू जीव अजीब है, ओकिर किस्मत फूट।
टीपू का लई डारिस, गयी सायकिल टूट।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

हाथी गोबर कर दिहिस, हैण्डपम्प भी जाम।
कहे भैंसिया देख लो, ईवीयम के काम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

तपती दुपहरिया मिटी, आयी महकी शाम।
सब बोलो दिल खोल के, जय जय जय श्री राम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

                                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 8 March 2017

ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ


नवजीवन की आशा हूँ।
दीप शिखा सा जलता हूँ।।

रक्त स्वेद सम्मिश्रण से।
लक्ष्य सुहाने गढ़ता हूँ।।

अंतस ज्योति जली जबसे।
अपनी धुन में रहता हूँ।।

जीवन के दुर्गम पथ पर।
अनथक चलता रहता हूँ।।

प्रभु पे है विश्वास अटल।
बाधाओं से लड़ता हूँ।।

घोर तिमिर के मस्तक पर।
अरुणोदय की आभा हूँ।।

भावों का सम्प्रेषण मैं।
शंखनाद हूँ कविता हूँ।।

      ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 5 March 2017

ग़ज़ल- किससे कहूँ ?


दर्द हद से बढ़ रहा है, आँख नम, किससे कहूँ ?
अपने ही जब ढा रहे, मुझ पे सितम, किससे कहूँ ?

आइना भी हो गया बेज़ार मुझसे अब यहाँ।
सुनने वाला कौन है मैं अपना ग़म किससे कहूँ ?*

चंद सिक्कों की चमक में ठूँठ जैसी हो गयी।
हे विधाता मौन जब कवि की कलम, किससे कहूँ ?

माना मंज़िल मुंतज़िर अब भी खड़ी है राह में।
छोड़ दें गर हौसला अपने कदम, किससे कहूँ ?

घोसलें तो मैं सजा दूँ फिर से सूनी शाख़ पे।
पर परिन्दे ही न माने तो सनम किससे कहूँ ?

देश का अभिमान थे, सम्मान थे जो रहनुमा।
उनके चमचे अब करें नाकों में दम, किससे कहूँ ?

अम्न लाने की थी जिम्मेदारियां जिनपे पवन।
वो सियासतदार ही जब बेरहम, किससे कहूँ ?

                                   ✍ डॉ पवन मिश्र

* समर कबीर साहब, उज्जैन का मिसरा

Monday, 27 February 2017

ताटंक छन्द- आजाद

तम की काली रात लीलने, जो बिजली सा कौंधा था।
दम्भी अंग्रेजों को जिसने, मरते दम तक रौंदा था।।
लेकिन वो भी समझ न पाया, घात लगाए था भेदी।
क्रांति यज्ञ में आखिर उसने, आहुति प्राणों की दे दी।१।

भारत माँ का लाल अनोखा, अपनी धुन का मस्ताना।
आजाद नाम का वो शावक, आजादी का दीवाना।।
नमन उसे है आज हृदय से, नत है सम्मुख ये माथा।
भारत की धरती सदियों तक, गायेगी उसकी गाथा।२।
                               
                                              ✍डॉ पवन मिश्र
  

Sunday, 26 February 2017

ग़ज़ल- सिखा रहा चुनाव ये


मुफ़लिसों के चूल्हे भी जला रहा चुनाव ये।
बस्तियों में आग भी लगा रहा चुनाव ये।।

तिश्नगी में तख़्त के बदल रहे समीकरण।
दो ध्रुवों को देख लो मिला रहा चुनाव ये।।

अर्श वाले आ गये हैं वोट लेने फर्श पर।
गैरफ़ानी कुछ नहीं बता रहा चुनाव ये।।

मुन्कसिर वो हो गए जो चूर थे गुरूर में।
जाने क्या क्या और भी सिखा रहा चुनाव ये।।

अब गलेगी दाल यूँ न जातियों के नाम पर।
रहनुमा को आइना दिखा रहा चुनाव ये।।

                                   - डॉ पवन मिश्र

मुफ़लिस= गरीब          गैरफ़ानी= शाश्वत
मुन्कसिर= नम्र             रहनुमा= नेता

Saturday, 18 February 2017

ग़ज़ल- हमसे कितना प्यार करोगे


आँखों से ही वार करोगे।
या खुलकर इज़हार करोगे।।

अपने हुस्न के जलवों से तुम।
कितनों को बीमार करोगे।।

कोई तो हद, यार बता दो।
हमसे कितना प्यार करोगे।।

तरस रही है बगिया तुम बिन।
कब इसको गुलज़ार करोगे।।

स्वप्न अधूरे जो मेरे हैं।
तुम ही तो साकार करोगे।।

सारे शिक़वे यार भुला दो।
आख़िर कब तक रार करोगे।।

झूठे वादों के दम पर तुम।
कब तक ये व्यापार करोगे।।

            ✍ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 16 February 2017

मुक्तक- कहीं जीवन मरुस्थल सा


कहीं जीवन मरुस्थल सा, कहीं शबनम बरसती है,
कहीं प्रियतम की हैं बाहें, कहीं तन्हाई डसती है।
कहीं तो कृष्ण आकर रुक्मणी की मांग भर देता,
मगर तड़पे कहीं राधा, कहीं मीरा तरसती है।।

Friday, 10 February 2017

ग़ज़ल- झुग्गियाँ


कौन कहता शह्र को बस लूटती हैं झुग्गियाँ।
मुफ़लिसी में हो बशर तो थामती हैं झुग्गियाँ।।

आग की वो हो लपट या भुखमरी या बारिशें।
हर थपेड़े यार हँस के झेलती हैं झुग्गियाँ।।

दिन कटा है मुश्किलों में रात भी भारी मगर।
ख्वाब कितने ही तरह के पालती हैं झुग्गियाँ।।

कब तलक यूँ नींद में ही गुम रहेगा रहनुमा।
डोलता है तख़्त भी जब बोलती हैं झुग्गियाँ।।

वो सियासी रोटियों को लेके आये हैं इधर।
अधपकी उन रोटियों को सेंकती हैं झुग्गियाँ।।

वायदों की टोकरी से है भरी हर इक गली।
हर चुनावी दौर में ये देखती हैं झुग्गियाँ।।

                                ✍ डॉ पवन मिश्र

मुफ़लिसी= गरीबी            बशर= आदमी

Saturday, 4 February 2017

भक्तिमय दोहे


गजमुख लम्बोदर सुनो, आह्वाहन है आज।
विघ्न हरो हे गणपति, पूर्ण करो हर काज।१।

देवों के हो देव तुम, महादेव चंद्रेश।
उमापति हे शिव शम्भू , हर लो मन के क्लेश।२।

जानकीवल्लभ राघव, दशरथ सुत श्रीराम।
हाथ जोरि विनती यही, पुनि आओ इस धाम।३।

अनघ अजर हे पवनसुत, हे अंजनि के लाल।
पिंगकेश कपिश्रेष्ठ हे, दनुजों के तुम काल।४।

मुरलीधर माधव सुनो, विनती बारम्बार।
इस दुखिया को अब करो, भव सागर से पार।५।

                                       ✍डॉ पवन मिश्र
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नवगीत- आया जाड़ा हाड़ कँपाने


अँगड़ाई ले रही प्रात है,
कुहरे की चादर को ताने।
ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

तपन धरा की शान्त हो गयी,
धूप न जाने कहाँ खो गयी।
जिन रवि किरणों से डरते थे,
लपट देख आहें भरते थे।
भरी दुपहरी तन जलता था,
बड़ी मिन्नतों दिन ढलता था।
लेकिन देखो बदली ऋतु तो,
आज वही रवि लगा सुहाने।
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

गमझा भूले मफ़लर लाये,
हाथों में दस्ताने आये।
स्वेटर टोपी जूता मोजा,
हर आँखों ने इनको खोजा।
सैंडिल रख दी अब बक्से में,
हाफ शर्ट भी सब बक्से में।
अलमारी में टँगे हुए वो,
बाहर निकले कोट पुराने।
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

लइया पट्टी मूँगफली हो,
ताजे गुड़ की एक डली हो।
गजक बताशे तिल के लड्डू,
भूल गए सब लौकी कद्दू।
मटर टमाटर गोभी गाजर,
स्वाद भरें थाली में आकर।
कड़क चाय औ गरम पकौड़ी,
जाड़े के हैं यार सयाने।
ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

            ✍डॉ पवन मिश्र

Saturday, 28 January 2017

नवगीत- तेरी माँ का साकी नाका

जेहादी का ढोंग रचाते
सुन ले ऐ नापाकी आका
बहुत हुआ अब स्वांग तुम्हारा
तेरी माँ का साकी नाका

हमने छोटा भाई माना
धर्म पड़ोसी का पहचाना
दाना-पानी भी देते हैं
गम में तेरे रो लेते हैं
लेकिन तू तो निकला घाती
छलनी करता माँ की छाती
मदलोभी बन सोचे है बस
केशर क्यारी नोचे है बस
हम धरती को माता माने
तुम आते हो लहू बहाने
जिसकी हम पूजा करते हैं
उस माँ पर डाला है डाका
तेरी माँ का साकी नाका

अमरीका का दम्भ न पालो
पहले अपना संकट टालो
चीनी कब तक साथ रहेगी ?
पानी के वह साथ बहेगी
बार बार यू एन को जाते
पीट पीट छाती रो आते
फिर भी दुनिया थू-थू करती
जनता तेरी तिल तिल मरती
मुफ्त मिले गोली औ बम से
रण में अड़ जाते हो हम से
भाड़े के इन हथियारों से
कर पाओगे बाल न बांका
तेरी माँ का साकी नाका

अपना भेष नहीं दिखता है ?
बंग्ला देश नहीं दिखता है ?
हाथ कटा है अब तो जागो
पूँछ दबा घाटी से भागो
काश्मीर का स्वप्न हो पाले
बदबूदार गली के नाले
दिवास्वप्न में क्यों खोये हो ?
बारूदों पर तुम सोये हो
कुछ भी शेष नहीं पाओगे
टुकड़े गिनते रह जाओगे
अबकी अलग करेंगे गिलगित
तब जैसे काटा था ढाका
तेरी माँ का साकी नाका

         ✍डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 17 January 2017

ग़ज़ल- रोज करता खेल शह औ मात का


रोज करता खेल शह औ मात का।
रहनुमा पक्का नहीं है बात का।।

कब पलट कर छेद डाले थालियाँ।
कुछ भरोसा है नहीं इस जात का।।

पत्थरों के शह्र में हम आ गए।
मोल कुछ भी है नहीं जज़्बात का।।

ख्वाहिशें जब रौंदनी ही थी तुम्हे।
क्यूँ दिखाया ख़्वाब महकी रात का।।

इंकलाबी हौसलें क्यों छोड़ दें।
अंत होगा ही कभी ज़ुल्मात का।।

मुल्क़ से अपने जो करता साजिशें।
जिक्र क्या करना है उस बदजात का।।

मेंढकों थोड़ा अदब तो सीख लो।
क्या भरोसा बेतुकी बरसात का।।

पीढ़ियों से तख़्त पर काबिज़ तुम्ही।
कौन दोषी आज के हालात का।।

बस बजाना गाल जिनका काम है।
क्या पता उनको पवन औकात का।।

                        ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 15 January 2017

ग़ज़ल- कोई भाया न बेवफा के सिवा


कोई भाया न बेवफा के सिवा।
अब नहीं आसरा दुआ के सिवा।।

और क्या दूँ मैं इश्क़ में तुमको।
पास कुछ भी नहीं वफ़ा के सिवा।।

तुम अगर साथ में नहीं हमदम।
जिंदगी कुछ नहीं सजा के सिवा।।

जीस्त भर झूठ में बशर जीते।
सच तो कुछ भी नहीं कज़ा के सिवा।।
   
दर्द किस को कहे पवन जाकर।
*कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र
कज़ा= मौत
*हफ़ीज जालंधरी साहब का मिसरा

Sunday, 1 January 2017

ग़ज़ल- अच्छा है


नूर में डूबा हुआ तेरा जमाल अच्छा है।
हुस्नवाले तू जो कर दे वो कमाल अच्छा है।।

इन नजारों में नही बात कि खो जाऊँ मैं।
तेरी आँखों में जो होता वो कमाल अच्छा है।।

अब तलक दर्द में बीते हैं मेरे दिन लेकिन।
इक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है*।।

चाहते हो कि रहे फूल भी काँटों के सँग।
चुभना छोड़े जो ये काँटे तो खयाल अच्छा है।।

रहनुमा कुछ भी कहें बात बनाये कुछ भी।
मैं लिखूँ कैसे मेरे देश का हाल अच्छा है।।

कब तलक जुर्म सहोगे यूँ ही घुटते घुटते।
अब अगर आये लहू में तो उबाल अच्छा है।।

कब तलक खून बहेगा सियासत में तेरी।
रहनुमाओं से पूछूँगा, ये सुआल अच्छा है।।

                           ✍ डॉ पवन मिश्र
सुआल= सवाल
* ज़नाब ग़ालिब का मिसरा