Sunday, 17 September 2017

ग़ज़ल- मुहब्बत का इरादा क्यूँ करें हम


वही गलती दुबारा क्यूँ करें हम।
मुहब्बत का इरादा क्यूँ करें हम।।

जिन्हें पर्वा नहीं कोई हमारी।
उन्हें आख़िर पुकारा क्यूँ करें हम।।

यकीं हो गर तुम्हे हमपे तो आओ।
वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम**।।

तेरी तस्वीर रख ली है रहल पे।
मुहब्बत इससे ज़्यादा क्यूँ करें हम।।

नहीं दिल से अगर उठती सदायें।
नवाज़िश का दिखावा क्यूँ करें हम।।

कज़ा के सामने देगी दगा वो।
भरोसा जिंदगी का क्यूँ करें हम।।

                    ✍ डॉ पवन मिश्र

रहल= लकड़ी का आधार जिसपर रखकर धर्मग्रन्थ पढ़ते हैं
सदायें= आवाजें
नवाज़िश= मेहरबानी, दया
कज़ा= मौत
**जॉन औलिया साहब का मिसरा

Friday, 1 September 2017

अतुकान्त- स्वयम्भू जगदीश


हे मनुपुत्र !
माना तुम समर्थ हो,
अति समर्थ
पौध रोपी है तुमने
झाड़-झंखाड़ भी उगाए
नरमुण्ड एकत्र कर
भीड़ को जन्मा है तुमने
जयकारों से गुंजित हैं दिशाएं
आकाश भी, वाणी भी
स्वयं को बताने लगे जगदीश
ऊँची शिला पर बैठ
देने लगे ज्ञान
नीचे बैठी भीड़ को
मैं-मैं करते करते
भूल गए हमें
बेशक
उस भीड़ में मैं भी हूँ
लेकिन हे स्वयम्भू जगदीश
तुम्हारी भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ।
क्या हुआ ? चुभ गया तुम्हे ?
लेकिन क्यों ?
ऊँची शिला पर
बैठे हो बस
जगदीश नहीं हो तुम
मनुपुत्र हो, मनुपुत्र।

✍ डॉ पवन मिश्र

मुक्तक


परशुराम की पुण्य धरा को वंदन है
हे वीर प्रसूता गाजीपुर अभिनन्दन है
सौ सौ बार लगा लूँ इसको माथे पर
अब्दुल हमीद की यह मिट्टी तो चंदन है

जाने कहाँ से वो मेरे करीब आ गया
लेकर हज़ार ख़्वाब वो हबीब आ गया
मंज़िल भी दिख रही थी राहे इश्क़ में मगर
कम्बख़्त बीच में मेरा नसीब आ गया

कली कमसिन को काँटों से बचा लाई,
वो मुझको हर अँधेरों से बचा लाई।
समंदर तो बहुत मगरूर था लेकिन,
मेरी माँ हर थपेड़ों से बचा लाई।।

✍डॉ पवन मिश्र

Saturday, 26 August 2017

आल्हा/वीर छन्द- रँगे सियार


अर्थमोह की इस आंधी में,
देखो कैसी चली बयार।
धर्म लबादा ओढ़े कितने,
घूम रहे हैं रँगे सियार।१।

भोले-भालों को छलते ये,
किया देश का बंटाधार।
अपनी झोली भरने को ही,
करें धर्म का ये व्यापार।२।

श्रद्धा की फसलें बस बोते,
नहीं दूसरा इनको काम।
धन वैभव के मद में रहते,
पैसा ही बस अल्लाराम।३।

कोई धारे कंठी माला,
कोई हाथ लिये कुरआन।
छद्मवेश में कुछ फादर तो,
ईसा से ही है अनजान।४।

राजनीति की शह पाकर ये,
भस्मासुर होते तैयार।
न्यायपालिका भी बेदम है,
इनके आगे नत सरकार।५।

टोपी, माला, क्रॉस पहन के,
धर्म चलाएं ठेकेदार।
इनसे मुक्ति दिला दो ईश्वर,
भारत माता करे पुकार।६।

                ✍ डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 16,15 मात्राभार पर यति तथा पदांत में गुरु लघु की अनिवार्यता।


Monday, 21 August 2017

नवगीत- तब राष्ट्र का निर्माण हो

एकात्म मानववाद की,
परिकल्पना का मान हो।
अंग्रेजियत की भीड़ में,
हिंदी का जब सम्मान हो।
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

वंचितों की भीड़ में जो,
अंत में बेबस खड़ा है।
वस्त्र वंचित देह भीतर,
भूख लेकर जो पड़ा है।।
बजबजाती नालियों से,
रात दिन जो जूझता है।
अश्रुपूरित नैन में जो,
स्वप्न लेकर घूमता है।।
उस मनुज का उत्थान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

चीथड़ों से तन लपेटे,
वक्ष पे नवजात बाँधे।
अनवरत जो चल रही है,
पीठ पर संसार साधे।।
जीवन थपेड़ों से यहाँ,
किंचित नहीं भयभीत जो।
नित कंटकों से लड़ रही,
साहस के गाती गीत जो।।
उस नार का सम्मान हो,
तब राष्ट्र का निर्माण हो।।

        ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 20 August 2017

ग़ज़ल- अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं


चलो तूफान से लड़ने का कुछ जज़्बा दिखाते हैं।
कि अपने हौसलों को आज फिर से आजमाते हैं।।

मेरे जुगनू के आगे क्या तेरी औकात है सूरज।
ये तब भी रोशनी देता अँधेरे जब चिढ़ाते हैं।।

नहीं परवाह मौजों की न तूफानों से घबराहट।
समंदर चीर कर यारों सफ़ीने हम चलाते हैं।।

न चल पाओगे मेरे साथ तुम इस राह पर हमदम।
*मुझे तो आजकल बेदारियों में ख़्वाब आते हैं।।*

फ़लक का चांद भी बेदम नजर आता है तब मुझको।
झुका कर वो कभी जब भी नज़र फिर से उठाते हैं।।

मेरे हाथों में आईना है ख़ंजर तो नहीं कोई।
भला फिर लोग क्यूँ इतना पवन से खौफ़ खाते हैं।।

                                  ✍ डॉ पवन मिश्र

*अहमद नदीम कासिमी साहब का मिसरा

Sunday, 6 August 2017

ग़ज़ल- मैं नहीं हूँ


तू ही तू दिख रहा है मैं नहीं हूँ।
ये सब कुछ ही तेरा है मैं नहीं हूँ।।

मेरे आईने में जो आजकल है।
यकीं मानो खुदा है मैं नहीं हूँ।।

उसी का ही कोई होगा करिश्मा।
*जो मुझमें बोलता है मैं नहीं हूँ*।।

चुरा कर दिल मेरा देखो जरा तो।
वो सबको बोलता है मैं नहीं हूँ।।

सुना लाखों हैं तेरी भीड़ में अब।
मुझे इतना पता है मैं नहीं हूँ।।

गलतफहमी उसे शायद कोई है।
जिसे वो ढूंढता है मैं नहीं हूँ।।

फ़दामत से उसे मंजिल मिली पर।
अकेला ही खड़ा है मैं नहीं हूँ।।

कचोटे है तुझे जो रात दिन वो।
तेरे दिल की सदा है मैं नहीं हूँ।।

           ✍ डॉ पवन मिश्र

फ़दामत= अन्याय, अनीति

*कबीर वारिस साहब का मिसरा

Sunday, 23 July 2017

कुण्डलिया- रम में बसते राम ?

*कुण्डलिया*

मदहोशी में श्वान को, रम में दिखते राम।
उसकी दूषित सोच है, कुत्सित सारे काम।।
कुत्सित सारे काम, अरे सुन रे ओ थेथर।
जरा पैग में देख, बोल दिखते पैगम्बर ?
सुनो पवन की बात, त्यागकर अब बेहोशी।
कुछ दिन की मेहमां, तुम्हारी ये मदहोशी।१।

जनता है सब देखती, इनके काले काम।
बड़े बड़े धूमिल हुए, लोकतंत्र यहि नाम।।
लोकतंत्र यहि नाम, चले ना कोई सिक्का।
जनता का विश्वास, तुरुप का होता इक्का।।
जितने नेता आज, हिंद हिन्दू के हन्ता।
उनको हरि का भजन, सिखायेगी ये जनता।२।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

Friday, 21 July 2017

ग़ज़ल- ये बारिश की बूंदें


ये बारिश की बूँदें सताती बहुत हैं।
न चाहूँ मैं फिर भी भिगाती बहुत हैं।।

ये गालों को छूके लबों पे थिरक के।
विरह वेदना को जगाती बहुत हैं।।

दबे पाँव सँग तेरी यादें भी आकर।
भिगाती बहुत हैं रुलाती बहुत हैं।।

फ़लक से ये गिरकर ज़मींदोज़ होतीं।
ये जीवन का दर्शन सिखाती बहुत हैं।।

हुईं जज़्ब मिट्टी में बारिश की बूँदें।
मगर फिर भी मुझको जलाती बहुत हैं।।

ज़मीं सींचती हैं फुहारें ये लेकिन।
टपकती छतों को चिढ़ाती बहुत हैं।।

                     ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 19 July 2017

ग़ज़ल- पिता


पसीना भी छुपाता है वो आंसू भी छुपाता है।
अरे वो बाप है जज़्बात कब खुल के जताता है।।

समंदर पार करने को वो बच्चों के लिये अपने।
कभी क़श्ती बनाता है कभी पतवार लाता है।।

परों पे अपने ढोता है वो नन्हें से परिंदे को।
लिये ख़्वाबों की नगरी में फ़लक के पार जाता है।।

उसे तूफ़ान बारिश कुछ नहीं दिखती मुहब्बत में।
थपेड़े सारे सह कर भी घरौंदा वो बनाता है।।

बहुत कम ज़र्फ़ है जो बाप को तकलीफ दे, लेकिन।
दुआओं में  कहां वालिद उसे भी भूल पाता है।।

कसीदे शान में उसकी मुझे पढ़ने की कूवत दे।
जो काँधे पे बिठा दुनिया का हर मेला घुमाता है।।

ज़मीं पे वो फरिश्ता है पवन की दीद में यारों।
खपा कर जिंदगी अपनी जो बच्चों को बनाता है।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 16 July 2017

ग़ज़ल- मेरे किरदार में वो है मेरे दिन रात में है


मेरे किरदार में वो है मेरे दिन रात में है।
याद कैसे न करूँ जज़्ब खयालात में है।।

मेरे आईने में इक अक़्स उभरने है लगा।
देख ये कैसा असर एक मुलाकात में है।।

लब पे मुस्कान लिये आ तो गया महफ़िल में।
*एक तूफ़ान सा लेकिन मेरे जज़्बात में है।।*

देगा फिर कौन जवाबों को मेरे, तू ही बता।
रहनुमा ही जो घिरा आज सवालात में है।।

बदहवासी में चरागों को बुझाने वाली।
ए हवा देख तो ले क्या मेरी औक़ात में है।।

                        ✍ डॉ पवन मिश्र

जज़्ब= समाया हुआ
*दाग देहलवी साहब का मिसरा

Tuesday, 11 July 2017

ताटंक छन्द- अमरनाथ श्रद्धालुओं पर हमले के संदर्भ में

(अमरनाथ श्रद्धालुओं पर 10/07/17 को हुए हमले के संदर्भ में)

दहशतगर्दी फिर चिल्लाई, भाड़े के हथियारों से।
देखो माँ की छाती फिर से, छलनी है गद्दारों से।।
गूंज रही थी सारी घाटी, हर हर के जयकारों से।
घात लगाकर गीदड़ आये, जेहादी दरबारों से।१।

शर्म जरा सी भी ना आई, उन श्वानों के ज़ायों को।
हरि भक्तों पर घात लगाया, मार दिया असहायों को।।
आखिर क्यूँ दिल्ली की अब भी, बंदूकों से दूरी है।
कुत्ते की दुम सीधी करने, की कैसी मजबूरी है।२।

गांधी के बन्दर जैसा ही, गर मोदी भी गायेगा।
छप्पन इंची सीने का फिर, मतलब क्या रह जायेगा।।
पकड़ गिरेबाँ खींच निकालों, उन कुत्सित हत्यारों को।
जीप छोड़ कर लटकाओ अब, फंदे से गद्दारों को।३।

चुन चुन कर हर छाती रौंदों, नृत्य करो अरिमुण्डों पे।
न्यायालय भी बन्द करे अब, दया दिखाना गुंडों पे।।
ये विषधर के वंशज सारे, अपना रंग दिखायेंगे।
दूध पिला लो चाहे जितना, इक दिन ये डस जाएंगे।४।

सेना को आदेश करो तुम, अब तो रण छिड़ जाने दो।
रौद्र रूप धर जगदम्बा को, अरि का रक्त बहाने दो।।
क्षत विक्षत पापी का तन जब, हिमखण्डों पर छायेगा।
फिर बाबा बर्फानी के घर, हत्यारा ना आयेगा।५।

                                            ✍ डॉ पवन मिश्र

(अमरनाथ श्रद्धालुओं पर 10/07/17 को हुए हमले के संदर्भ में)

Saturday, 8 July 2017

दोहे- गुरु की महिमा


सत्य सनातन श्रेष्ठ है, सकल सृष्टि का सार।
गुरु चरणों में स्वर्ग है, वंदन बारम्बार।१।

जीवन दुर्गम जलधि सम, भ्रमित फिरें नर-नार।
गुरु किरपा ही कर सके, भवसागर से पार।२।

मानव माटी मान लो, गुरु जानो कुमहार।
थाप-पीट औ तपन से, गढ़ता नव आकार।३।

गुरु की महिमा क्या कहूँ, गुरु से गुरुतर कोय।
गुरुवर के आशीष से, सुफल मनोरथ होय।४।

धन-मद में जो चूर हैं, सुनो पवन के बोल।
मात, पिता, गुरु तीन ये, जगती पर अनमोल।५।

                                   ✍ डॉ पवन मिश्र




Sunday, 2 July 2017

ग़ज़ल- नाम लेता है


खुदा का नाम ये बन्दा तो सुबहो शाम लेता है।
कोई पूछे खुदा है क्या तो तेरा नाम लेता है।।

जिसे तुम छोड़ आये थे ज़माने की रवायत में।
वो आशिक आज भी अक्सर तुम्हारा नाम लेता है।।

अगर मुझसे मुहब्बत है तो साहिल पे खड़ा है क्यूँ।
वो आकर क्यूँ नहीं पतवार, क़श्ती थाम लेता है।।

समझ पे ताले जड़ जाते बीमारी इश्क़ है ऐसी।
लगी जिसको भला कब अक्ल से वो काम लेता है।।

न साकी चाहिये मुझको न चाहत मैकदे की ही।
पवन मदहोश है ये बस नज़र के जाम लेता है।।

                                 ✍ डॉ पवन मिश्र

Monday, 5 June 2017

ग़ज़ल- कोई न आये


आप जैसा रहनुमा कोई न आये।
दिल दुखाने बेवफ़ा कोई न आये।।

जख़्म भरने की कवायद में लगा हूँ।
बस पुराना वाकिया कोई न आये।।

मुद्दतों के बाद गुल खिलने लगे हैं।
ऐ खुदा अब ज़लज़ला कोई न आये।।

हर गलतफहमी मिटा दूँगा मैं लेकिन।
*शर्त ये है तीसरा कोई न आये*।।

हूँ बहुत तन्हा अज़ब सी ख़ामुशी है।
दूर तक मुझको सदा कोई न आये।।

रोज तकता डाकिये की राह, लेकिन।
खत पवन के नाम का कोई न आये।।

                         ✍ डॉ पवन मिश्र
*समर साहब का मिसरा

Friday, 19 May 2017

ग़ज़ल- चलो इस जंग में तुम पर इनायत यार हो जाए


चलो इस जंग में तुम पर इनायत यार हो जाए।
कि जीतो तुम हमारा दिल हमारी हार हो जाए।।

इयादत के बहाने ही अगर दीदार हो जाए।
तो रोजेदार आँखों का सनम इफ़्तार हो जाए।।

न रोको अश्क़ आँखों में सदायें दिल की आने दो।
*बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए*।।

करीने से सजा लेना नज़र पे कोई चिलमन तुम।
कहीं ऐसा न हो नजरें मिलें और प्यार हो जाए।।

मनाएं ईद हम कैसे रिवाजों में वो उलझा है।
खुदा थोड़ी सी रहमत कर हमें दीदार हो जाए।।

हवस की नींद में डूबा है अपना राहबर यारों।
करो ऐसी बगावत रहनुमा बेदार हो जाए।।

लिये पत्थर खड़े हैं सब खियाबाँ रौंद डाला है।
पवन की इल्तिज़ा फिर से इरम गुलज़ार हो जाए।।

                                  ✍ डॉ पवन मिश्र

इयादत= रोगी का हाल पूछने और उसे दिलासा देने हेतु जाना
हवस= लोभ, लालच           राहबर= राह दिखाने वाला
बेदार= जागना।                 खियाबाँ= बाग
इल्तिज़ा= प्रार्थना।              इरम= स्वर्ग

*अर्श मलसियानी साहब का मिसरा

Sunday, 7 May 2017

ग़ज़ल- इक शमा रोशन करें


दरमियां बातों का फिर से सिलसिला रोशन करें।
आओ मिलकर इक घरौंदा प्यार का रोशन करें।।

रात गहरी है बहुत रानाइयाँ भी हैं ख़फ़ा।
जब तलक सूरज न आये इक शमा रोशन करें।।

दोष क़िस्मत पर लगाकर कोशिशें क्यूँ छोड़ना।
*इक दिया जब साथ छोड़े दूसरा रोशन करें*।।

ज़िंदगी की रहगुज़र में तीरगी ही तीरगी।
लौट आओ हमनशीं फिर रास्ता रोशन करें।।

कब तलक देखे सहम कर कश्तियों का डूबना।
थाम लें पतवार फिर से हौसला रोशन करें।।

गर हवा गुस्ताख़ है तो हम खड़े लेकर शमा।
वो बुझाये हर दफ़ा हम हर दफ़ा रोशन करें।।

                                 ✍ डॉ पवन मिश्र
तीरगी= अंधेरा
*जफ़र गोरखपुरी साहब का मिसरा

Saturday, 29 April 2017

ग़ज़ल- युँ दर्द अपना छुपा रहा था


युँ दर्द अपना छुपा रहा था।
हँसी लबों पे दिखा रहा था।।

छुपा के अश्कों की मोतियों को।
क्या हाल है क्या बता रहा था।।

वो जानता था हवा है बैरी।
*मगर दिये भी जला रहा था*।।

हमें दुआओं में करके शामिल।
वो इश्क़ हमसे निभा रहा था।।

चला गया जाने किस नगर में।
जो मेरी दुनिया बसा रहा था।।

मिटा दिया उसने खुद को लेकिन।
पवन को जीना सिखा रहा था।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 18 April 2017

मदिरा सवैया छन्द- रूपवती सखि प्राणप्रिये


रूपवती सखि प्राणप्रिये,
निज रूप अनूप दिखाय रही।

ओंठन से छलका मदिरा,
हिय को हर बार रिझाय रही।

बैठि सरोवर तीर प्रिये,
बस नैनन बान चलाय रही।

नैन मिले जब नैनन से,
तब लाजन क्यूँ सकुचाय रही।

                 ✍ डॉ पवन मिश्र

शिल्प- 7 भगण (२११×७)+१ गुरू, सामान्यतः 10,12 वर्णों पर यति।

Saturday, 15 April 2017

ग़ज़ल- क्या करें (हास्य ग़ज़ल)

२१२२   २१२२   २१२२

उनके आगे हम हैं बेदम क्या करें ?
बचने के आसार हैं कम क्या करें ?

आज घर आने में देरी हो गयी।
देखिये अब हाल बेगम क्या करें ?

बाल सर के रफ़्ता रफ़्ता जा रहे।
*जाने वाली चीज़ का गम क्या करें ?

ताश के किस खेल में हम आ गए।
सारे पत्ते उनके ही हम क्या करें ?

चाँद तारे फूल खुशबू कुछ नहीं।
खौफ़ में है दिल का मौसम क्या करें ?

युद्ध से डरता नहीं है ये पवन।
पर घरैतिन न्यूक्लियर बम क्या करें ?

                           ✍ डॉ पवन मिश्र
* दाग देहलवी साहब का मिसरा

ग़ज़ल- क्या करें


इल्तिज़ा उस दर पे पैहम क्या करें ?
वो ही जब सुनता नहीं हम क्या करें ?

लेके क़श्ती आ गए मझधार तक।
इससे ज्यादा हौसला हम क्या करें ?

जो गया वो था मुक़द्दर में नहीं।
*जाने वाली चीज़ का गम क्या करें*?

दूरियों ने दिल को पत्थर कर दिया।
आँख फिर भी हो रही नम, क्या करे ?

खुद ही काँटे राह में जब बो दिए।
तब चुभन का यार मातम क्या करें ?

आग जबसे गुलसिताँ में है लगी।
जल रहा है आबे झेलम क्या करें ?

दीद में मेरी पवन बस वो ही वो।
अलहदा है मेरा हमदम क्या करें ?

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

पैहम= लगातार, बार-बार
आबे झेलम= झेलम नदी का पानी
*दाग देहलवी साहब का मिसरा

ग़ज़ल- जल रही घाटी नज़ारे जल रहे हैं


जल रही घाटी नज़ारे जल रहे हैं।
सैनिकों पर आज पत्थर चल रहे हैं।।

बाढ़ आंधी से बचाते नस्ल उनकी।
और रक्षक ही उन्हें अब खल रहे हैं।।

फूल की देवी बताओ मौन क्यूँ हो ?
जब सपोले मेरी माँ को छल रहे हैं।।

क्यारियाँ केसर की मुरझाने लगीं अब।
हुक्मरां बस हाथ बैठे मल रहे हैं।।

आपसे उम्मीद थी माँ भारती को।
आप भी माहौल में अब ढल रहे हैं।।

छोड़ दो गीता उठाओ अब सुदर्शन।
ख़ाक मंसूबे करो जो पल रहे हैं।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 4 April 2017

ग़ज़ल- फिर आ जाओ रिमझिम सी बरसात लिये

मेरी छत पर पूनम की इक रात लिये।
फिर आ जाओ रिमझिम सी बरसात लिये।।

यादों की गलियाँ कब तक यूँ महकेंगी।
सूखे फूलों की तेरी सौगात लिये।।

शबे तार है वीरानी है तन्हाई है।
कब तक भटकूँ अफ़सुर्दा हालात लिये।।

अक़्सर आँसू आंखों में आ जाते हैं।
वही पुरानी तेरी कोई बात लिये।।

शबे वस्ल में माहताब के दरवाजे पर।
हम आये हैं तारों की बारात लिये।।

तुम आओगे फ़लक नूर बरसायेगा।
मैं बैठा हूँ कितने ही जज़्बात लिये।।

                        ✍ डॉ पवन मिश्र
शबे तार= अंधेरी रात
अफ़सुर्दा= खिन्न, उदास
शबे वस्ल= मिलन की रात
नूर= प्रकाश

Sunday, 19 March 2017

ग़ज़ल- और मैं हूँ


महज इक ख़ामुशी है और मैं हूँ।
कि आँखों में नमी है और मैं हूँ।।

बिना उनके कहाँ रानाइयाँ अब।
घनी ये तीरगी है और मैं हूँ।।

बिखर जाऊँ न मैं आकर सँभालो।
*बड़ी नाजुक घड़ी है और मैं हूँ*।।

गया जबसे पिलाकर वो नज़र से।
उसी की तिश्नगी है और मैं हूँ।।

सुनेगा कौन मेरे दिल की बातें।
फ़क़त तन्हाई ही है और मैं हूँ।।

चले आओ जहाँ भी तुम छुपे हो।
फिजा ये ढूँढती है और मैं हूँ।।

उधर धोखे ही धोखे हर कदम पर।
इधर बस आशिकी है और मैं हूँ।।

                       ✍ डॉ पवन मिश्र

तीरगी= अंधेरा      तिश्नगी= प्यास

*इंदिरा वर्मा जी का मिसरा

Saturday, 11 March 2017

दोहे- जोगीरा सा रा रा रा


इस होली में का कहें, जियरा का हम हाल।
भगवा हुइगा देश सब, क्या नीला क्या लाल।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

नमो नमो मनई रटें, अईस नाम में दम।
पूरा यू पी हिल गवा, मानो फटा हो बम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

चचा भतीजा सब सफा, बुआ खड़ी पगुराय।
का से का ई हुइ गवा, कछू समझ नहि आय।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

पप्पू जीव अजीब है, ओकिर किस्मत फूट।
टीपू का लई डारिस, गयी सायकिल टूट।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

हाथी गोबर कर दिहिस, हैण्डपम्प भी जाम।
कहे भैंसिया देख लो, ईवीयम के काम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

तपती दुपहरिया मिटी, आयी महकी शाम।
सब बोलो दिल खोल के, जय जय जय श्री राम।।
जोगीरा सा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा

                                      ✍ डॉ पवन मिश्र

Wednesday, 8 March 2017

ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ


नवजीवन की आशा हूँ।
दीप शिखा सा जलता हूँ।।

रक्त स्वेद सम्मिश्रण से।
लक्ष्य सुहाने गढ़ता हूँ।।

अंतस ज्योति जली जबसे।
अपनी धुन में रहता हूँ।।

जीवन के दुर्गम पथ पर।
अनथक चलता रहता हूँ।।

प्रभु पे है विश्वास अटल।
बाधाओं से लड़ता हूँ।।

घोर तिमिर के मस्तक पर।
अरुणोदय की आभा हूँ।।

भावों का सम्प्रेषण मैं।
शंखनाद हूँ कविता हूँ।।

      ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 5 March 2017

ग़ज़ल- किससे कहूँ ?


दर्द हद से बढ़ रहा है, आँख नम, किससे कहूँ ?
अपने ही जब ढा रहे, मुझ पे सितम, किससे कहूँ ?

आइना भी हो गया बेज़ार मुझसे अब यहाँ।
सुनने वाला कौन है मैं अपना ग़म किससे कहूँ ?*

चंद सिक्कों की चमक में ठूँठ जैसी हो गयी।
हे विधाता मौन जब कवि की कलम, किससे कहूँ ?

माना मंज़िल मुंतज़िर अब भी खड़ी है राह में।
छोड़ दें गर हौसला अपने कदम, किससे कहूँ ?

घोसलें तो मैं सजा दूँ फिर से सूनी शाख़ पे।
पर परिन्दे ही न माने तो सनम किससे कहूँ ?

देश का अभिमान थे, सम्मान थे जो रहनुमा।
उनके चमचे अब करें नाकों में दम, किससे कहूँ ?

अम्न लाने की थी जिम्मेदारियां जिनपे पवन।
वो सियासतदार ही जब बेरहम, किससे कहूँ ?

                                   ✍ डॉ पवन मिश्र

* समर कबीर साहब, उज्जैन का मिसरा

Monday, 27 February 2017

ताटंक छन्द- आजाद

तम की काली रात लीलने, जो बिजली सा कौंधा था।
दम्भी अंग्रेजों को जिसने, मरते दम तक रौंदा था।।
लेकिन वो भी समझ न पाया, घात लगाए था भेदी।
क्रांति यज्ञ में आखिर उसने, आहुति प्राणों की दे दी।१।

भारत माँ का लाल अनोखा, अपनी धुन का मस्ताना।
आजाद नाम का वो शावक, आजादी का दीवाना।।
नमन उसे है आज हृदय से, नत है सम्मुख ये माथा।
भारत की धरती सदियों तक, गायेगी उसकी गाथा।२।
                               
                                              ✍डॉ पवन मिश्र
  

Sunday, 26 February 2017

ग़ज़ल- सिखा रहा चुनाव ये


मुफ़लिसों के चूल्हे भी जला रहा चुनाव ये।
बस्तियों में आग भी लगा रहा चुनाव ये।।

तिश्नगी में तख़्त के बदल रहे समीकरण।
दो ध्रुवों को देख लो मिला रहा चुनाव ये।।

अर्श वाले आ गये हैं वोट लेने फर्श पर।
गैरफ़ानी कुछ नहीं बता रहा चुनाव ये।।

मुन्कसिर वो हो गए जो चूर थे गुरूर में।
जाने क्या क्या और भी सिखा रहा चुनाव ये।।

अब गलेगी दाल यूँ न जातियों के नाम पर।
रहनुमा को आइना दिखा रहा चुनाव ये।।

                                   - डॉ पवन मिश्र

मुफ़लिस= गरीब          गैरफ़ानी= शाश्वत
मुन्कसिर= नम्र             रहनुमा= नेता

Saturday, 18 February 2017

ग़ज़ल- हमसे कितना प्यार करोगे


आँखों से ही वार करोगे।
या खुलकर इज़हार करोगे।।

अपने हुस्न के जलवों से तुम।
कितनों को बीमार करोगे।।

कोई तो हद, यार बता दो।
हमसे कितना प्यार करोगे।।

तरस रही है बगिया तुम बिन।
कब इसको गुलज़ार करोगे।।

स्वप्न अधूरे जो मेरे हैं।
तुम ही तो साकार करोगे।।

सारे शिक़वे यार भुला दो।
आख़िर कब तक रार करोगे।।

झूठे वादों के दम पर तुम।
कब तक ये व्यापार करोगे।।

            ✍ डॉ पवन मिश्र

Thursday, 16 February 2017

मुक्तक- कहीं जीवन मरुस्थल सा


कहीं जीवन मरुस्थल सा, कहीं शबनम बरसती है,
कहीं प्रियतम की हैं बाहें, कहीं तन्हाई डसती है।
कहीं तो कृष्ण आकर रुक्मणी की मांग भर देता,
मगर तड़पे कहीं राधा, कहीं मीरा तरसती है।।

Friday, 10 February 2017

ग़ज़ल- झुग्गियाँ


कौन कहता शह्र को बस लूटती हैं झुग्गियाँ।
मुफ़लिसी में हो बशर तो थामती हैं झुग्गियाँ।।

आग की वो हो लपट या भुखमरी या बारिशें।
हर थपेड़े यार हँस के झेलती हैं झुग्गियाँ।।

दिन कटा है मुश्किलों में रात भी भारी मगर।
ख्वाब कितने ही तरह के पालती हैं झुग्गियाँ।।

कब तलक यूँ नींद में ही गुम रहेगा रहनुमा।
डोलता है तख़्त भी जब बोलती हैं झुग्गियाँ।।

वो सियासी रोटियों को लेके आये हैं इधर।
अधपकी उन रोटियों को सेंकती हैं झुग्गियाँ।।

वायदों की टोकरी से है भरी हर इक गली।
हर चुनावी दौर में ये देखती हैं झुग्गियाँ।।

                                ✍ डॉ पवन मिश्र

मुफ़लिसी= गरीबी            बशर= आदमी

Saturday, 4 February 2017

भक्तिमय दोहे


गजमुख लम्बोदर सुनो, आह्वाहन है आज।
विघ्न हरो हे गणपति, पूर्ण करो हर काज।१।

देवों के हो देव तुम, महादेव चंद्रेश।
उमापति हे शिव शम्भू , हर लो मन के क्लेश।२।

जानकीवल्लभ राघव, दशरथ सुत श्रीराम।
हाथ जोरि विनती यही, पुनि आओ इस धाम।३।

अनघ अजर हे पवनसुत, हे अंजनि के लाल।
पिंगकेश कपिश्रेष्ठ हे, दनुजों के तुम काल।४।

मुरलीधर माधव सुनो, विनती बारम्बार।
इस दुखिया को अब करो, भव सागर से पार।५।

                                       ✍डॉ पवन मिश्र
🏻

नवगीत- आया जाड़ा हाड़ कँपाने


अँगड़ाई ले रही प्रात है,
कुहरे की चादर को ताने।
ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

तपन धरा की शान्त हो गयी,
धूप न जाने कहाँ खो गयी।
जिन रवि किरणों से डरते थे,
लपट देख आहें भरते थे।
भरी दुपहरी तन जलता था,
बड़ी मिन्नतों दिन ढलता था।
लेकिन देखो बदली ऋतु तो,
आज वही रवि लगा सुहाने।
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

गमझा भूले मफ़लर लाये,
हाथों में दस्ताने आये।
स्वेटर टोपी जूता मोजा,
हर आँखों ने इनको खोजा।
सैंडिल रख दी अब बक्से में,
हाफ शर्ट भी सब बक्से में।
अलमारी में टँगे हुए वो,
बाहर निकले कोट पुराने।
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

लइया पट्टी मूँगफली हो,
ताजे गुड़ की एक डली हो।
गजक बताशे तिल के लड्डू,
भूल गए सब लौकी कद्दू।
मटर टमाटर गोभी गाजर,
स्वाद भरें थाली में आकर।
कड़क चाय औ गरम पकौड़ी,
जाड़े के हैं यार सयाने।
ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

            ✍डॉ पवन मिश्र

Saturday, 28 January 2017

नवगीत- तेरी माँ का साकी नाका

जेहादी का ढोंग रचाते
सुन ले ऐ नापाकी आका
बहुत हुआ अब स्वांग तुम्हारा
तेरी माँ का साकी नाका

हमने छोटा भाई माना
धर्म पड़ोसी का पहचाना
दाना-पानी भी देते हैं
गम में तेरे रो लेते हैं
लेकिन तू तो निकला घाती
छलनी करता माँ की छाती
मदलोभी बन सोचे है बस
केशर क्यारी नोचे है बस
हम धरती को माता माने
तुम आते हो लहू बहाने
जिसकी हम पूजा करते हैं
उस माँ पर डाला है डाका
तेरी माँ का साकी नाका

अमरीका का दम्भ न पालो
पहले अपना संकट टालो
चीनी कब तक साथ रहेगी ?
पानी के वह साथ बहेगी
बार बार यू एन को जाते
पीट पीट छाती रो आते
फिर भी दुनिया थू-थू करती
जनता तेरी तिल तिल मरती
मुफ्त मिले गोली औ बम से
रण में अड़ जाते हो हम से
भाड़े के इन हथियारों से
कर पाओगे बाल न बांका
तेरी माँ का साकी नाका

अपना भेष नहीं दिखता है ?
बंग्ला देश नहीं दिखता है ?
हाथ कटा है अब तो जागो
पूँछ दबा घाटी से भागो
काश्मीर का स्वप्न हो पाले
बदबूदार गली के नाले
दिवास्वप्न में क्यों खोये हो ?
बारूदों पर तुम सोये हो
कुछ भी शेष नहीं पाओगे
टुकड़े गिनते रह जाओगे
अबकी अलग करेंगे गिलगित
तब जैसे काटा था ढाका
तेरी माँ का साकी नाका

         ✍डॉ पवन मिश्र

Tuesday, 17 January 2017

ग़ज़ल- रोज करता खेल शह औ मात का


रोज करता खेल शह औ मात का।
रहनुमा पक्का नहीं है बात का।।

कब पलट कर छेद डाले थालियाँ।
कुछ भरोसा है नहीं इस जात का।।

पत्थरों के शह्र में हम आ गए।
मोल कुछ भी है नहीं जज़्बात का।।

ख्वाहिशें जब रौंदनी ही थी तुम्हे।
क्यूँ दिखाया ख़्वाब महकी रात का।।

इंकलाबी हौसलें क्यों छोड़ दें।
अंत होगा ही कभी ज़ुल्मात का।।

मुल्क़ से अपने जो करता साजिशें।
जिक्र क्या करना है उस बदजात का।।

मेंढकों थोड़ा अदब तो सीख लो।
क्या भरोसा बेतुकी बरसात का।।

पीढ़ियों से तख़्त पर काबिज़ तुम्ही।
कौन दोषी आज के हालात का।।

बस बजाना गाल जिनका काम है।
क्या पता उनको पवन औकात का।।

                        ✍ डॉ पवन मिश्र

Sunday, 15 January 2017

ग़ज़ल- कोई भाया न बेवफा के सिवा


कोई भाया न बेवफा के सिवा।
अब नहीं आसरा दुआ के सिवा।।

और क्या दूँ मैं इश्क़ में तुमको।
पास कुछ भी नहीं वफ़ा के सिवा।।

तुम अगर साथ में नहीं हमदम।
जिंदगी कुछ नहीं सजा के सिवा।।

जीस्त भर झूठ में बशर जीते।
सच तो कुछ भी नहीं कज़ा के सिवा।।
   
दर्द किस को कहे पवन जाकर।
*कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा।।

                      ✍ डॉ पवन मिश्र
कज़ा= मौत
*हफ़ीज जालंधरी साहब का मिसरा

Sunday, 1 January 2017

ग़ज़ल- अच्छा है


नूर में डूबा हुआ तेरा जमाल अच्छा है।
हुस्नवाले तू जो कर दे वो कमाल अच्छा है।।

इन नजारों में नही बात कि खो जाऊँ मैं।
तेरी आँखों में जो होता वो कमाल अच्छा है।।

अब तलक दर्द में बीते हैं मेरे दिन लेकिन।
इक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है*।।

चाहते हो कि रहे फूल भी काँटों के सँग।
चुभना छोड़े जो ये काँटे तो खयाल अच्छा है।।

रहनुमा कुछ भी कहें बात बनाये कुछ भी।
मैं लिखूँ कैसे मेरे देश का हाल अच्छा है।।

कब तलक जुर्म सहोगे यूँ ही घुटते घुटते।
अब अगर आये लहू में तो उबाल अच्छा है।।

कब तलक खून बहेगा सियासत में तेरी।
रहनुमाओं से पूछूँगा, ये सुआल अच्छा है।।

                           ✍ डॉ पवन मिश्र
सुआल= सवाल
* ज़नाब ग़ालिब का मिसरा